कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला करते हुए दावा किया कि उन्होंने गुरुवार को राज्यसभा में बोलते हुए विपक्ष के नेता (एलओपी) द्वारा उठाए गए किसी भी गंभीर प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। X पर एक पोस्ट में, रमेश ने प्रधानमंत्री के भाषण को असुरक्षाओं का विशाल पुलिंदा और झूठ का घुमक्कड़ बताया। रमेश ने पोस्ट में लिखा कि प्रधानमंत्री ने कल शाम राज्यसभा में एक बार फिर यह उजागर कर दिया कि वे कितने असुरक्षाओं के पुलिंदे हैं, कितने झूठ के घुमक्कड़ हैं, पूर्वाग्रहों का भंडार हैं और कितनी घृणा और जहर के स्रोत हैं।
भाषण की और निंदा करते हुए रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री की घोषणाएं उन्हें अच्छा इंसान होने से और दूर ले जाती हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का 97 मिनट का भाषण दयनीय से भी बदतर था और उन्हें अपनी ही नफरतों का कैदी बताया। कांग्रेस सांसद ने लिखा कि एक बात तो स्पष्ट है। वे खुद को महान व्यक्ति बताते रह सकते हैं। लेकिन जितना अधिक वे ऐसा कहेंगे, उतना ही यह स्पष्ट होता जाएगा कि वे अच्छे व्यक्ति नहीं हैं और कभी हो भी नहीं सकते। उनके 97 मिनट के भाषण को दयनीय कहना भी कम होगा। वे अपनी ही नफरतों के कैदी हैं। उन्होंने राज्यसभा में विपक्ष के प्रतिनिधि द्वारा उठाए गए किसी भी गंभीर प्रश्न का उत्तर नहीं दिया।
रमेश ने आगे प्रधानमंत्री पर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दावे पर प्रतिक्रिया न देने का आरोप लगाया। जनरल एमएम नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के अनुसार, लोकसभा में विपक्ष के प्रतिनिधि राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री पर लगाए गए आरोपों को दोहराते हुए, रमेश ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने 19 जून, 2020 को चीन को क्लीन चिट भी दे दी थी।
रमेश ने आरोप लगाया कि वाशिंगटन डीसी में उनके करीबी दोस्त 10 मई, 2025 को ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने की बात को सौ साल से दोहरा रहे हैं। फिर भी प्रधानमंत्री इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप हैं - ठीक वैसे ही जैसे उन्होंने 19 जून, 2020 को पूर्वी लद्दाख में बीस से अधिक जवानों के शहीद होने के बाद चीन को दी गई अपनी कुख्यात क्लीन चिट पर चुप्पी साधे रखी थी। उनकी यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुरुवार को कांग्रेस पर तीखा हमला करने के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा कि कांग्रेस 'मोहब्बत की दुकान' की बात करती है, लेकिन वह उनसे नफरत करती है और उसकी नीतियां नागरिकों की क्षमता को साकार करने में विफल रही हैं।
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वेब सीरीज घूसखोर पंडत को लेकर बढ़ते विवाद के बीच लखनऊ के हजरतगंज थाने में एक प्राथमिकी दर्ज की गयी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर इस वेब सीरीज के निर्देशक और निर्माण दल के कई सदस्यों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गयी है। शिकायत में कहा गया है कि वेब सीरीज की विषयवस्तु और विशेषकर उसका नाम जन भावनाओं को आहत करता है और सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है। प्रशासन ने सीधे कानूनी कदम उठाकर साफ कर दिया है कि जन असंतोष को नजरअंदाज नहीं किया जायेगा।
पुलिस के अनुसार बीते दिनों वेब सीरीज के नाम को लेकर कई शिकायतें मिलीं। कुछ वर्गों ने कहा कि घूसखोर शब्द को पंडत जैसे शब्द के साथ जोड़ना पूरे पंडित समाज पर कीचड़ उछालने जैसा है। इससे रोष और अशांति फैल सकती है। इन शिकायतों के बाद हजरतगंज के निरीक्षक विक्रम सिंह ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराते हुए मामला आगे बढ़ाया। प्राथमिकी में निर्देशक और निर्माण से जुडे कई लोगों के नाम शामिल किये गये हैं।
हम आपको बता दें कि इस मामले ने तब और जोर पकड़ा जब यह जानकारी सामने आयी कि मुख्यमंत्री ने खुद कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिये। शासन का संदेश साफ है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर समाज को भड़काने की छूट नहीं दी जा सकती।
उधर, विवाद बढ़ने पर निर्देशक नीरज पांडे ने बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि यह एक काल्पनिक पुलिस कथा है और पंडत शब्द केवल एक काल्पनिक चरित्र का बोली में प्रचलित नाम है। उनका दावा है कि कहानी किसी जाति, धर्म या समुदाय पर टिप्पणी नहीं करती, बल्कि एक व्यक्ति के कर्म पर केंद्रित है। उन्होंने यह भी कहा कि एक रचनाकार के रूप में वह जिम्मेदारी और सम्मान का ध्यान रखते हैं।
इस बीच, लगातार बढ़ते विरोध के बीच निर्माण दल ने फिलहाल सारी प्रचार सामग्री हटा लेने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि वेब सीरीज को पूरी कहानी के संदर्भ में समझा जाना चाहिये, न कि छोटी झलक के आधार पर परखा जाना चाहिये। उन्होंने भरोसा जताया कि शीघ्र ही दर्शकों के सामने पूरी वेब सीरीज पेश की जायेगी। इस बीच वेब सीरिज निर्माता संघ ने भी आपत्ति जताते हुए सूचना जारी की है कि शीर्षक के लिये जरूरी अनुमति नहीं ली गयी। संघ के अनुसार उद्योग के नियमों के तहत नाम की स्वीकृति अनिवार्य है और उसका पालन नहीं किया गया।
हम आपको बता दें कि यह वेब सीरीज अभिनेता मनोज बाजपेयी को अजय दीक्षित नाम के एक भ्रष्ट और नैतिक रूप से गिर चुके पुलिस अधिकारी के रूप में दिखाता है, जिसे उपनाम पंडत से पुकारा जाता है। यह कहानी एक ही रात में घटती घटनाओं पर आधारित है। इसमें नुसरत भरुचा और साकिब सलीम भी प्रमुख भूमिका में हैं।
बहरहाल, देखा जाये तो यह प्रकरण केवल एक वेब सीरीज का विवाद नहीं, बल्कि हमारे समय का आईना है। रचनाकार जब समाज से विषय लेते हैं तो उन्हें यह भी समझना होगा कि शब्दों की चोट तलवार से गहरी होती है। यदि नाम ही ऐसा हो जो किसी समुदाय को कटघरे में खड़ा कर दे, तो रोष स्वाभाविक है। कला को आजादी चाहिये, पर आजादी का अर्थ बेलगाम उकसावा नहीं हो सकता।
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