Explainer: पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों से जंग लड़ना इतना मुश्किल क्यों है?
पाकिस्तान के लिए हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई सिर्फ एक सामान्य सैन्य अभियान नहीं होगी. यमन के हूती संगठन से मुकाबला करने की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यहां पारंपरिक युद्ध के बजाय मिसाइल, ड्रोन, समुद्री हमले, सुरंगों और असममित युद्ध की रणनीति काम करती है. पाकिस्तान के पास बड़ी सेना और आधुनिक हथियार जरूर हैं, लेकिन यमन का भौगोलिक वातावरण और हूतियों की युद्ध शैली किसी भी बाहरी सेना के लिए अभियान को बेहद जटिल बना देती है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य मोर्चे पर उतरता है तो उसके सामने सबसे बड़ी मुश्किलें क्या होंगी? आखिर क्यों हूतियों के खिलाफ लड़ाई पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगी?
कौन हैं हूती और क्यों हैं इतने मजबूत?
हूती का आधिकारिक तौर पर अंसार अल्लाह कहा जाता है. यमन का एक सशस्त्र और राजनीतिक संगठन है. इसका प्रभाव यमन के बड़े हिस्से पर है और इसकी सैन्य क्षमता सालों के संघर्ष के दौरान विकसित हुई है. संगठन के पास बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ ड्रोन और समुद्री हमले करने की क्षमता भी है.
सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष किया
हूतियों ने लंबे समय तक सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के खिलाफ संघर्ष किया है. इस दौरान उन्होंने ऐसी रणनीति विकसित की जिसमें अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों के जरिए अधिक महंगे सैन्य ठिकानों और जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है.
यही वजह है कि हूतियों से लड़ाई में सिर्फ बड़ी सेना होना पर्याप्त नहीं है. विरोधी की लोकेशन का पता लगाना, उसके हथियारों को नष्ट करना और लगातार बदलते लॉन्च प्वाइंट्स को ट्रैक करना कहीं अधिक अहम हो जाता है.
1. यमन का पहाड़ी इलाका खास चुनौती
पाकिस्तान की सेना पारंपरिक युद्ध और आतंकवाद विरोधी अभियानों में व्यापक अनुभव रखती है, लेकिन यमन का भूगोल अलग तरह की चुनौती पेश करता है. हूती प्रभाव वाले कई इलाकों में पहाड़, घाटियां, गुफाएं और दुर्गम क्षेत्र हैं. ऐसे इलाकों में किसी सैन्य संगठन के ठिकानों की सही पहचान करना आसान नहीं होता. हूती अपने हथियारों और सैन्य ढांचे को अलग-अलग जगहों पर छिपाकर रखने की रणनीति अपना सकते हैं. अगर कोई बाहरी सेना हवाई हमले करती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि लक्ष्य वास्तव में सैन्य ठिकाना है या नहीं. गलत खुफिया जानकारी के आधार पर हमला होने पर नागरिकों के मारे जाने का जोखिम भी बढ़ जाता है.
2. हूतियों की 'हिट एंड रन' रणनीति
पारंपरिक युद्ध में सेना के पास स्पष्ट मोर्चा, सैन्य अड्डे और सैनिकों की तैनाती होती है. हूतियों के खिलाफ ऐसी स्थिति नहीं है. वे छोटे मोबाइल लॉन्च सिस्टम का इस्तेमाल कर सकते हैं. मिसाइल या ड्रोन लॉन्च करने के बाद लॉन्च साइट बदल दी जाती है. इस वजह से हमलावर सेना के लिए जवाबी कार्रवाई करना कठिन हो जाता है.
यही असममित युद्ध की खासियत है. एक तरफ अरबों डॉलर के सैन्य विमान और मिसाइल डिफेंस सिस्टम हो सकते हैं, दूसरी तरफ अपेक्षाकृत कम लागत वाला ड्रोन या मिसाइल बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है. पाकिस्तान के लिए यह आर्थिक और सैन्य दोनों स्तरों पर चुनौती होगी.
3. लाल सागर और समुद्री मोर्चा
हूती चुनौती सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है. लाल सागर और आसपास के समुद्री क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाने की उनकी क्षमता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बना दिया है. यदि पाकिस्तान किसी सैन्य अभियान में शामिल होता है और उसे समुद्री मार्गों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी लेनी पड़ती है तो उसके सामने एक अलग चुनौती खड़ी होगी. समुद्र में किसी मिसाइल या ड्रोन हमले का समय बेहद कम हो सकता है. जहाजों को बचाने के लिए रडार, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और लगातार निगरानी की जरूरत होती है. पाकिस्तान की नौसेना के पास समुद्री युद्ध का अनुभव है, लेकिन लाल सागर में लंबे समय तक ऑपरेशन चलाना उसके लिए अतिरिक्त लॉजिस्टिक और राजनीतिक चुनौती बन सकता है.
4. लंबी दूरी की लॉजिस्टिक्स
पाकिस्तान और यमन के बीच बड़ी दूरी है. किसी भी सैन्य अभियान के लिए सैनिकों, ईंधन, गोला-बारूद, स्पेयर पार्ट्स, मेडिकल सुविधाओं और हथियारों की लगातार आपूर्ति करनी होगी. यही वह क्षेत्र है जहां किसी अभियान की लागत तेजी से बढ़ सकती है.
अगर पाकिस्तान को अपने लड़ाकू विमानों या नौसैनिक जहाजों को लंबे समय तक तैनात रखना पड़ता है तो इसके लिए सहयोगी देशों के सैन्य अड्डों और हवाई क्षेत्र की जरूरत पड़ सकती है. इसका मतलब है कि अभियान सिर्फ सैन्य फैसला नहीं रहेगा, बल्कि कई देशों के साथ कूटनीतिक समझौतों पर भी निर्भर करेगा.
5. मिसाइल और ड्रोन का खतरा
हूतियों के पास ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल करने का लंबा अनुभव है. पाकिस्तान को अगर उनके खिलाफ अभियान चलाना पड़ता है तो उसे सिर्फ आक्रामक क्षमता नहीं, बल्कि मजबूत एयर डिफेंस की भी जरूरत होगी. किसी सैन्य अभियान में लड़ाकू विमान दुश्मन के ठिकानों पर हमला कर सकते हैं, लेकिन लौटते समय उन्हें मिसाइल या ड्रोन हमलों से भी बचना होगा. इसके अलावा ड्रोन की बड़ी संख्या में तैनाती किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए चुनौती बन सकती है. हर ड्रोन को महंगी इंटरसेप्टर मिसाइल से रोकना आर्थिक रूप से भी टिकाऊ नहीं होता.
6. हूतियों को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि सैन्य हमले के बाद लक्ष्य क्या होगा? अगर उद्देश्य सिर्फ हूतियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को कमजोर करना है तो सीमित हवाई अभियान संभव हो सकता है. लेकिन अगर लक्ष्य संगठन को पूरी तरह खत्म करना है तो मामला काफी अलग होगा. हूतियों के पास जमीनी नेटवर्क और स्थानीय समर्थन का आधार है. किसी सशस्त्र संगठन को केवल हवाई हमलों से खत्म करना मुश्किल होता है. इसके लिए लंबे समय तक जमीन पर मौजूदगी और स्थानीय राजनीतिक व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है. पाकिस्तान के लिए यह सबसे बड़ा रणनीतिक जोखिम होगा, क्योंकि एक सीमित सैन्य मिशन धीरे-धीरे लंबे अभियान में बदल सकता है.
7. ईरान का फैक्टर भी अहम
हूती संघर्ष को समझने के लिए ईरान के साथ उसके संबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ईरान हूतियों को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देने के लिए जाना जाता है, हालांकि हूतियों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक और सैन्य निर्णय लेने की क्षमता भी है. अगर पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ किसी बड़े सैन्य अभियान में उतरता है तो उसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का भी ध्यान रखना होगा. पाकिस्तान के ईरान के साथ अपने महत्वपूर्ण भौगोलिक और कूटनीतिक संबंध हैं. इसलिए यमन में सैन्य कार्रवाई का असर सिर्फ यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान-ईरान संबंधों पर भी पड़ सकता है.
8. पाकिस्तान के सामने घरेलू चुनौती भी
पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और रक्षा बजट भी इस तरह के अभियान को प्रभावित करेंगे. किसी दूरदराज के क्षेत्र में लंबे समय तक सैन्य ऑपरेशन चलाना बेहद महंगा होता है. इसके अलावा पाकिस्तान पहले से अपने आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों का सामना करता है. ऐसे में बड़ी संख्या में संसाधन यमन की ओर भेजने का मतलब देश के दूसरे सुरक्षा मोर्चों पर उपलब्ध संसाधनों पर असर पड़ना भी हो सकता है.
क्या पाकिस्तान अकेले हूतियों से लड़ सकता है?
व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो पाकिस्तान के लिए अकेले बड़े पैमाने पर हूतियों के खिलाफ अभियान चलाना कठिन होगा. उसे खुफिया जानकारी, सैटेलाइट निगरानी, एयर डिफेंस, समुद्री सुरक्षा और लॉजिस्टिक सपोर्ट के लिए सहयोगी देशों की आवश्यकता पड़ सकती है. यही वजह है कि हूतियों के खिलाफ किसी भी सैन्य गठबंधन में पाकिस्तान की भूमिका सिर्फ सैनिक भेजने तक सीमित नहीं होगी. वह नौसैनिक सुरक्षा, खुफिया सहयोग, एयर डिफेंस या लॉजिस्टिक सहायता जैसे विकल्पों पर भी विचार कर सकता है.
IND vs WI: दूसरे टी20 में बल्लेबाज मारेंगे बाजी या गेंदबाज मचाएंगे धमाल? जानें कैसी होगी रांची की पिच रिपोर्ट
IND vs WI 1st T20 Pitch Reports: भारत और वेस्टइंडीज के बीच खेली जा रही पांच मैचों की टी20 सीरीज का दूसरा मुकाबला शुक्रवार, 9 अक्टूबर को खेला जाएगा. दोनों टीमें रांची के JSCA इंटरनेशनल स्टेडियम कॉम्प्लेक्स में आमने-सामने होंगी. 3 साल बाद यहां टीम इंडिया टी20 मैच खेलेगी. लखनऊ में पहला मैच 8 विकेट से जीतकर टीम इंडिया सीरीज में 1-0 से आगे है. अब सभी की नजरें रांची के इस बड़े मुकाबले पर टिकी हैं. किसी भी टी20 मैच का रोमांच इस बात पर निर्भर करता है कि वहां की पिच कैसा व्यवहार करेगी. क्या इस मैदान पर चौके-छक्कों की बरसात होगी या फिर स्पिनर्स अपनी फिरकी से बल्लेबाजों को नचाएंगे? चलिए जानते हैं कि दूसरे टी20 मैच के दौरान रांची की पिच का मिजाज कैसा रहने वाला है.
कैसी रहेगी रांची की पिच?
रांची का जेएससीए स्टेडियम आमतौर पर एक ऐसी संतुलित पिच के लिए जाना जाता है, जहां बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों के लिए कुछ न कुछ मदद होती है. मैच की शुरुआत में नई सफेद गेंद से तेज गेंदबाजों को हवा में स्विंग और पिच से थोड़ी मूवमेंट मिल सकती है, इसलिए शुरुआती 6 ओवरों (पावरप्ले) में बल्लेबाजों को संभलकर खेलना होगा. जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ेगा, पिच थोड़ी धीमी हो जाएगी जिससे मिडिल ओवरों में स्पिन गेंदबाजों को अच्छी ग्रिप और टर्न मिलने लगेगा और वे मैच का रुख बदल सकते हैं. इसके अलावा, इस मैदान की बाउंड्री काफी बड़ी हैं, इसलिए बल्लेबाजों को सिर्फ अंधाधुंध चौके-छक्के लगाने के चक्कर में पड़ने के बजाय गैप ढूंढकर सिंगल-डबल चुराने और स्ट्राइक रोटेट करने पर ज्यादा ध्यान देना होगा.
टॉस की भूमिका और वेन्यू के खास आंकड़े
रांची के इस मैदान पर काफी समय बाद रात में कोई टी20 इंटरनेशनल मैच होने जा रहा है. अगर पुराने रिकॉर्ड्स की बात करें, तो यहां बाद में बल्लेबाजी करने वाली यानी चेज करने वाली टीमों का पलड़ा भारी रहा है. इस मैदान पर अब तक खेले गए कुल 7 टी20 मैचों में से 4 मैच दूसरी पारी में बैटिंग करने वाली टीम ने जीते हैं. पिच के इसी मिजाज को देखते हुए, जो भी कप्तान यहां टॉस जीतेगा, वह पहले गेंदबाजी करने का फैसला चुन सकता है ताकि बाद में बल्लेबाजी करना आसान रहे.
रांची में शानदार है टीम इंडिया का टी20 रिकॉर्ड
रांची का जेएससीए स्टेडियम भारतीय टीम के लिए एक अभेद्य किले जैसा रहा है, जहां टीम इंडिया को मात देना किसी भी विरोधी के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है. इस मैदान पर भारत का रिकॉर्ड बेहद शानदार है. यहां खेले गए कुल 4 टी20 मैचों में से टीम इंडिया ने 3 मुकाबलों में जीत हासिल की है. जबकि सिर्फ 1 मैच में उसे हार का सामना करना पड़ा है. इस मैदान पर भारत का जीत का प्रतिशत 75% का है, और इस दौरान टीम ने श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसी दिग्गज टीमों को चारों खाने चित किया है. इसी दमदार इतिहास और घरेलू मैदान के फायदे को देखते हुए वेस्टइंडीज के खिलाफ होने वाले दूसरे मैच में भी भारतीय टीम की जीत की उम्मीदें बहुत ज्यादा हैं.
• कुल खेले गए मैच (भारत): 4 मैच
• भारत की जीत: 3 मैच
• भारत की हार: 1 मैच
मौसम का हाल और ओस का असर
मैच के दिन रांची में मौसम थोड़ा करवट ले सकता है. दिन का अधिकतम तापमान 27 से 32 डिग्री सेल्सियस के बीच रहेगा, लेकिन शाम को यह गिरकर 21 डिग्री तक आ सकता है. मौसम विभाग के अनुसार, मैच के दौरान बारिश की 55% संभावना है, जिससे खेल में थोड़ी रुकावट आ सकती है. अगर बारिश नहीं होती है, तो खेल के दूसरे हाफ में ओस एक बहुत बड़ा फैक्टर साबित होगी. ओस आने के बाद गेंदबाजों के लिए गेंद को ग्रिप करना मुश्किल हो जाएगा और चेज करने वाली टीम को इसका सीधा फायदा मिलेगा.
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