Allahabad High Court ने शुरू किया Mediation अभियान, 31 दिसंबर तक सुलझेंगे लंबित केस
रजिस्ट्रार (मध्यस्थता) भागीरथ वर्मा ने गुरुवार को कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट, उसकी लखनऊ बेंच और निचली अदालतों में लंबित मामलों वाले पक्षकार, चल रहे मीडिएशन फॉर द नेशन 3.0 अभियान के तहत मध्यस्थता के ज़रिए अपने विवाद सुलझा सकते हैं। यह अभियान 1 अक्टूबर को शुरू हुआ और 31 दिसंबर तक चलेगा। इससे पक्षकारों को लंबी कानूनी लड़ाई में पड़े बिना आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का मौका मिलेगा। वर्मा ने कहा कि पक्षकार मध्यस्थता के लिए आगे आ सकते हैं और समझौते की संभावना तलाश सकते हैं। निचली अदालतों में चल रहे मामलों से जुड़े लोग संबंधित जिले के सिविल कोर्ट परिसर में काम करने वाली 'डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी' से संपर्क कर सकते हैं। वर्मा ने बताया कि जिन लोगों के मामले प्रयागराज में इलाहाबाद हाई कोर्ट या उसकी लखनऊ बेंच में चल रहे हैं, वे प्रयागराज में 'हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज़ कमिटी' या लखनऊ में उसकी सब-कमिटी से संपर्क कर सकते हैं।
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मुकदमे से जुड़े लोग अपने वकीलों से यह भी पता करने के लिए कह सकते हैं कि क्या उनके मामलों को मध्यस्थता (mediation) के लिए भेजा जा सकता है। उपयुक्त मामलों में अदालत विवाद को मध्यस्थता के लिए भेज सकती है। एक बार मामला भेजे जाने के बाद, एक निष्पक्ष मध्यस्थ दोनों पक्षों को बातचीत करने और आपसी सहमति से समाधान तक पहुँचने में मदद करता है। वर्मा ने बताया, मध्यस्थ विवाद का फैसला नहीं करता है और न ही पक्षों पर कोई समाधान थोपता है। वर्मा ने बताया कि मध्यस्थता का काम ट्रेंड और पैनल में शामिल मध्यस्थ करते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट के मध्यस्थता और सुलह केंद्र में ऐसे अनुभवी वकील मध्यस्थ के तौर पर शामिल हैं, जिन्होंने मध्यस्थता में खास ट्रेनिंग ली है। मध्यस्थता अधिनियम, 2023 के तहत, संबंधित मध्यस्थता केंद्र तय प्रक्रिया के ज़रिए अपने पैनल से किसी मध्यस्थ को नियुक्त करता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट में 255 और इसकी लखनऊ बेंच में 68 ट्रेंड मध्यस्थ हैं। उन्होंने आगे बताया कि इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के अलग-अलग ज़िलों में लगभग 1,700 ट्रेंड मध्यस्थ काम कर रहे हैं।
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इस कैंपेन में मध्यस्थता (mediation) के लिए उपयुक्त माने जाने वाले विवादों की 15 कैटेगरी शामिल हैं। इनमें शादी और परिवार से जुड़े विवाद, मोटर दुर्घटना के क्लेम केस, चेक-बाउंस के मामले, समझौता-योग्य आपराधिक मामले, कंज्यूमर विवाद, कर्ज वसूली और SARFAESI मामले, फैसले को लागू करने की कार्यवाही, आर्बिट्रेशन विवाद, कमर्शियल विवाद, सर्विस से जुड़े मामले, बंटवारे के केस, बेदखली के मामले, जमीन अधिग्रहण के केस और लेबर विवाद शामिल हैं। साथ ही, इसमें ऐसे अन्य सिविल मामले भी शामिल हैं जिनमें कानूनी तौर पर समझौता किया जा सकता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में मध्यस्थता समिति के चेयरमैन जस्टिस राजन रॉय ने बताया कि मध्यस्थता से विवादों के नतीजे पर पक्षकारों का ज्यादा कंट्रोल रहता है। पारंपरिक अदालती कार्यवाही के उलट, जिसमें कोर्ट दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद उनके अधिकारों पर फैसला करता है, मध्यस्थता में पक्षकारों को एक निष्पक्ष मध्यस्थ की मदद से समझौते की शर्तों पर बातचीत करने का मौका मिलता है। जस्टिस रॉय ने कहा कि इससे काफी समय, पैसा और तनाव बच सकता है, साथ ही अदालतों पर बोझ भी कम हो सकता है। उन्होंने कहा कि आपसी सहमति से हुआ समझौता रिश्तों को बनाए रखने और उससे जुड़े अन्य विवादों को सुलझाने में भी मदद कर सकता है।
पिता Murli Deora ने बदली थी US की नीति, Milind Deora ने याद किया किस्सा
कई दशकों तक पाकिस्तान खुद को वॉशिंगटन का बेहद ज़रूरी सहयोगी मानता रहा। फिर, कोल्ड वॉर, परमाणु हथियारों को लेकर चिंता और भारतीय उपमहाद्वीप के बारे में अमेरिका की बदलती सोच के बीच, यह रिश्ता कमज़ोर पड़ने लगा। कांग्रेस नेता मिलिंद देवरा के मुताबिक, उनके दिवंगत पिता मुरली देवरा भी उन लोगों में शामिल थे जो इस रिश्ते को कमज़ोर करने की कोशिश कर रहे थे। यह बात एक ऐसी जगह सामने आई जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के बारे में एक सोशल मीडिया पोस्ट के कमेंट सेक्शन में। एक इंटरव्यू में, मुशर्रफ ने अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्तों को धोखे की जानी-पहचानी भावना के साथ याद किया। मुशर्रफ ने कहा कि 1947 से 1989 तक, यानी 42 सालों तक हम अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी थे।" उन्होंने कोल्ड वॉर के दौरान पाकिस्तान की भूमिका और सोवियत संघ के खिलाफ वॉशिंगटन के साथ उसके सहयोग को याद किया। फिर हालात बदले।
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मुशर्रफ ने बताया कि 1989 से 2001 के बीच पाकिस्तान सबसे करीबी सहयोगी से बदलकर सबसे ज़्यादा प्रतिबंध झेलने वाला सहयोगी बन गया। उन्होंने F-16 विमानों की सप्लाई रुकने, लगातार लगे प्रतिबंधों और आखिर में अमेरिका के भारत की तरफ रणनीतिक झुकाव का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का "42 सालों तक इस्तेमाल किया गया और फिर उसे छोड़ दिया गया। इस बात ने एक एक्स यूज़र को बातचीत में मुरली देवरा का ज़िक्र करने के लिए प्रेरित किया। यूज़र ने देवरा की दोस्ती का ज़िक्र किया जो अमेरिका के दिवंगत कांग्रेसी स्टीफन सोलार्ज़ से थी। सोलार्ज़ एक डेमोक्रेट थे और वॉशिंगटन की दक्षिण एशिया नीति में उनकी अहम भूमिका थी। यूज़र का तर्क था कि अमेरिका के रुख में बदलाव लाने में सोलार्ज़ ने अहम भूमिका निभाई थी।
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यूज़र की बात साफ़ थी जनरल मुशर्रफ़ का दर्द समझा जा सकता है। मिलिंद देवरा का जवाब भी उतना ही साफ़ था। उन्होंने कहा बिल्कुल। इसके बाद उन्होंने इस कहानी में सीधे अपने पिता का ज़िक्र किया। देवरा ने लिखा मुझे गर्व है कि मेरे स्वर्गीय पिता मुरली देवरा ने अमेरिका-पाकिस्तान के पुराने नज़रिए को चुनौती देने और भारतीय उपमहाद्वीप के प्रति पश्चिमी देशों के ज़्यादा संतुलित नज़रिए को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका के दिवंगत कांग्रेसी स्टीफन सोलरज़ और सीनेटर लैरी प्रेसलर जैसे नेताओं के साथ मिलकर काम किया। यह एक छोटी सी पोस्ट थी, लेकिन इसने उस रिश्ते के बारे में बहुत कुछ उजागर किया जो कभी दक्षिण एशिया में अमेरिकी रणनीति का अहम हिस्सा हुआ करता था।
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