Prakash Singh केस के उल्लंघन पर Supreme Court सख्त, Jharkhand सरकार को DGP नियम पर 1 हफ्ते की मोहलत
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को झारखंड के उस नियम की वैधता पर सवाल उठाया, जिसके तहत रिटायरमेंट में छह महीने से कम समय बचे होने पर भी किसी अधिकारी को DGP पद पर नियुक्ति के लिए विचार किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान पहली नज़र में प्रकाश सिंह मामले में दिए गए उसके निर्देशों के खिलाफ है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने कहा कि अगर यह प्रावधान पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति और कार्यकाल पर कोर्ट के आदेश को कमज़ोर करता है, तो इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता। शीर्ष अदालत ने झारखंड की DGP तदाशा मिश्रा को नोटिस जारी किया, क्योंकि इस नियम को रद्द करने का कोई भी फ़ैसला उनकी नियुक्ति पर असर डाल सकता है। कोर्ट ने राज्य को एक हफ़्ते का समय दिया कि वह या तो इस प्रावधान पर पुनर्विचार करे या अपना जवाब दाखिल करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा एक अधिकारी को राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) के पद पर नियुक्ति के लिए विचार किए जाने के योग्य माना गया है, भले ही रिटायरमेंट से पहले उनकी बची हुई सेवा छह महीने से कम हो।
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पहली नज़र में ऐसा प्रावधान प्रकाश सिंह मामले में इस कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून के सीधे खिलाफ लगता है। बेंच ने आगे कहा उनके पक्ष में पहले ही एक अधिकार बन चुका है। अगर हम इस नियम को रद्द करते हैं, तो इससे उनकी नियुक्ति पर असर पड़ सकता है। या फिर, हम नियम को भविष्य के लिए रद्द कर सकते हैं और कह सकते हैं कि अधिकारी पद पर बने रहेंगे।" सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार की उस अर्जी पर सुनवाई कर रहा था जिसमें झारखंड के पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक (पुलिस बल के प्रमुख) के चयन और नियुक्ति से जुड़े नियमों (2025) और इसके तहत की गई सभी DGP नियुक्तियों को चुनौती दी गई थी। झारखंड की ओर से पेश सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्य को नियमों पर दोबारा विचार करने में कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब दूसरे राज्यों में भी ऐसे ही प्रावधान मौजूद हैं, तो केंद्र ने झारखंड को ही क्यों निशाना बनाया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र किसी भी ऐसे राज्य कानून का विरोध करेगा जो 'प्रकाश सिंह' मामले में दिए गए निर्देशों के खिलाफ हो, चाहे सत्ता में कोई भी राजनीतिक पार्टी हो।
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बेंच ने कहा कि उसका काम यह सुनिश्चित करना है कि राज्य 'प्रकाश सिंह' मामले में तय सुरक्षा उपायों को कमजोर न करें। कोर्ट ने 'एमिकस क्यूरी' (न्याय मित्र) से राय मांगी कि क्या भारत के सभी राज्यों में DGP की नियुक्ति से जुड़े कानून 'प्रकाश सिंह' मामले में तय सिद्धांतों के अनुरूप हैं या नहीं। केंद्र ने झारखंड की DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को चुनौती देते हुए एक अर्जी दाखिल की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि यह नियुक्ति राज्य पुलिस प्रमुख के चयन के लिए केंद्र द्वारा तय प्रक्रिया का उल्लंघन करके की गई थी। केंद्र सरकार ने झारखंड से मांग की है कि वह DGP की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का पालन करे और यह घोषित करे कि राज्य के 2025 के नियम के तहत की गई नियुक्तियां गैर-कानूनी हैं। यह चुनौती "झारखंड में पुलिस महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक (पुलिस बल के प्रमुख) के चयन और नियुक्ति संबंधी नियम, 2025" के खिलाफ है, जिसे 8 जनवरी, 2025 को अधिसूचित किया गया था।
विरोध-प्रदर्शन की आड़ में गुंडागर्दी और अराजकता फैलाने की कोशिश, राहुल-प्रियंका पर BJP का वार
गुरुवार को चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ INDIA गठबंधन का विरोध-प्रदर्शन तीसरे दिन में प्रवेश कर गया, जिसमें विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची के 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) में कथित अनियमितताओं को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष के सांसदों को पिछले दो दिनों से विरोध प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है। उन्होंने कहा कि करीब 300 सांसद शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना चाहते हैं, लेकिन आरोप है कि उनके लोगों के साथ मारपीट की गई। गांधी ने आगे कहा कि जिन्होंने "भारत पर कब्ज़ा" कर लिया है, उन्हें सज़ा दी जाएगी।
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इस बीच भाजपा की ओर से भी पलटवार किया गया है। बीजेपी नेता प्रदीप भंडारी ने कहा कि क्या सड़कों पर हंगामा करके राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट में भरोसा न होने का संकेत दे रहे हैं? क्या उन्हें डर है कि सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला तथ्यों के आधार पर इतना कमज़ोर है कि उन्हें लोगों के बीच एक खास नैरेटिव बनाने की ज़रूरत महसूस हो रही है? क्या राहुल गांधी सड़कों पर अराजकता फैलाकर भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक तंत्र को डराने की कोशिश कर रहे हैं? आखिर, सुप्रीम कोर्ट सड़कों पर भीड़ जमा होने के आधार पर अपना फ़ैसला नहीं सुनाता; वह तथ्यों के आधार पर मामले तय करता है।
उन्होंने कहा कि इस सच्चाई से निराश होकर, देश के 40 से ज़्यादा पूर्व जजों ने आज एक खुला पत्र लिखा है, जिसमें बताया गया है कि कैसे कांग्रेस पार्टी देश के संवैधानिक तंत्र के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश कर रही है... अगर उन्हें लोकतंत्र के बारे में थोड़ी भी समझ है, तो उन्हें इसका जवाब देना चाहिए: जब कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हो, तो क्या उन्हें—राहुल गांधी को—कोर्ट पर भरोसा नहीं है? क्या उनका मामला इतना कमज़ोर है? या फिर वे सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन के ज़रिए कोर्ट पर दबाव बनाने और अविश्वास दिखाने की कोशिश कर रहे हैं? इससे पता चलता है कि पिछले तीन दिनों से राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा की अगुवाई में कांग्रेस कार्यकर्ता विरोध-प्रदर्शन की आड़ में गुंडागर्दी और अराजकता फैलाने की कोशिश क्यों कर रहे हैं।
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धानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर ‘‘आपराधिक साजिश’’ के तहत देश को ‘‘हाईजैक’’ करने का आरोप लगाते हुये लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि इन लोगों को न्याय के कटघरे में लाना हमारी गारंटी है। राहुल ने जोर देकर कहा, ‘‘इन लोगों को न्याय के कटघरे में लाया जाएगा और यह इंडिया गठबंधन की गारंटी है।’’ राजघाट की ओर विपक्षी नेताओं के मार्च से पहले राहुल गांधी ने कहा कि करीब 300 सांसद शांतिपूर्ण धरना देना चाहते हैं, लेकिन उन्हें प्रदर्शन के लिए आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन के पहले दिन उन्हें निर्वाचन आयोग के कार्यालय के पास रोक दिया गया, जबकि दूसरे दिन जंतर-मंतर जाने से रोका गया और ‘‘हमारे लोगों को मारा गया।’’
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