Guru Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत में क्यों जरूरी है कथा का पाठ? जानें पौराणिक कहानी
Guru Pradosh Vrat Katha: आज यानी 8 अक्टूबर 2026 को गुरु प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. माना जाता है कि प्रदोष व्रत के दिन प्रदोष काल में पूजा करनी चाहिए. इस समय शिव जी की पूजा करने से देवो के देव महादेव की असीम कृपा प्राप्त होती है. वे साधकों को मनचाहा वरदान देते हैं. बता दे कि हर महीने प्रदोष का व्रत किया जाता है. यह कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन पड़ता है. गुरुवार के दिन पड़ने से इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जा रहा है. यह व्रत विवाह की इच्छा रखने वाले, संतान की इच्छा रखने वाले और विद्यार्थियों के लिए शुभ माना जाता है.
आज पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 59 मिनट से लेकर 8 बजकर 27 मिनट तक रहने वाला है. चलिए अब यहां पढ़ते हैं गुरु प्रदोष व्रत की कथा.
गुरु प्रदोष व्रत कथा (Read Guru Pradosh Vrat Katha)
कथा के अनुसार, शौनक आदि अट्ठासी हजार ऋषियों के समक्ष बृहस्पति त्रयोदशी प्रदोष व्रत की कथा का वर्णन करते हुए सूतजी कहते हैं- "एक समय देवराज इन्द्र एवं वृत्र नामक राक्षस के मध्य भीषण युद्ध हुआ. उस समय देवताओं ने अपने पराक्रम से दैत्यों की सेना को परास्त कर दिया. विशाल संख्या में अपने सैनिकों को मृत देखकर वृत्रासुर क्रोधित हो उठा तथा वह स्वयं युद्ध के लिये तत्पर हो गए.
देवताओं और वृत्रासुर के बीच हुआ भयंकर युद्ध
वृत्रासुर के भयंकर रूप को युद्धभूमि में देखते ही इन्द्रादि सभी देवगण भयभीत हो उठे तथा उन्होंने सहायता हेतु देवगुरु बृहस्पति का आवाहन किया. देवताओं की प्रार्थना सुनकर देवगुरु वहां प्रकट हुये तथा देवताओं से उनकी चिन्ता का कारण पूछा.
वृत्रासुर के विकराल रूप से भयभीत हुए देवता
इन्द्रादि देवताओं ने कहा- 'हे गुरुदेव! वृत्र नामक भयंकर दैत्य ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया है, वह अत्यन्त शक्तिशाली है, कृपया हमारी सहायता करें एवं इस संकट के निवारण का मार्ग बताएं.'
कौन था वृत्रासुर? पूर्व जन्म में था चित्ररथ राजा
देवगुरु बृहस्पति ने कहा - 'हे देवेन्द्र! यह वृत्रासुर अत्यन्त मायावी है, मैं तुम्हें उसकी कथा सुनाता हूं, ध्यानपूर्वक सुनो - वृत्रासुर अति तपस्वी एवं निष्ठावान था, उसने गन्धमादन पर्वत पर कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न कर लिया था. पूर्व जन्म में वह राक्षस चित्ररथ नामक राजा था. तुम्हारे राज्य के समीप स्थित सुन्दर वन में इसका साम्राज्य था. उस वन में अनेक साधु, सन्त, महात्मा आदि तप एवं साधना करते थे. भगवत्प्राप्ति हेतु वह स्थान अत्यन्त अनुकूल माना जाता है.
कैलाश पहुंचे चित्ररथ, भगवान शिव का किया उपहास
एक समय चित्ररथ भ्रमण करते हुये कैलाश पर्वत पर पहुंच गया. कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपनी अर्धांगिनी देवी पार्वती सहित विराजमान होकर एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे. चित्ररथ उनके स्वरूप का तथा उनके समीप विराजमान देवी पार्वती का दर्शन करके हाथ जोड़कर उपहास करते हुये भगवान शिव से बोला - 'हे भगवन्! हम तो साधारण जीव हैं, इसीलिये माया के वशीभूत होकर स्त्रियों के मोह में फंसे रहते हैं, किन्तु देवलोक में तो कहीं भी मैंने किसी को स्त्री सहित सभा में विराजमान नहीं देखा.'
चित्ररथ की बात सुनकर क्रोधित हुईं माता पार्वती
चित्ररथ के मुख से इन व्यंगपूर्ण वचनों को श्रवण करके भगवान शिव हंसते हुये बोले - 'हे राजन्! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण अन्य सभी से भिन्न है. मैंने कालकूट जैसे सृष्टि-संहारक महाविष का पान किया है. इसके पश्चात् भी तुम अल्पज्ञानियों के समान मुझ पर व्यंग कर रहे हो.
माता पार्वती ने चित्ररथ को दिया श्राप
देवी पार्वती भी चित्ररथ पर अत्यंत कुपित हो उठीं तथा उसकी ओर दृष्टिपात करते हुए माता ने कहा - 'अरे दुष्ट प्राणी! तूने मेरे समक्ष मेरे स्वामी एवं समस्त चराचर जगत् में व्याप्त महादेव का उपहास किया है, अतः तुझे अपने इस पाप कर्म का दण्ड अवश्य भोगना होगा. इस सभा में उपस्थित सभी ज्ञानीजन समस्त शास्त्रों के तत्व को जानने वाले हैं. यहां उपस्थित सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत्कुमार समस्त प्रकार के अज्ञान का नाश होने के उपरान्त शिव भक्ति में लीन हैं. अरे मूर्ख! तू स्वयं को अत्यन्त चतुर समझता है, अतः तुझे यह सीख मिलनी ही चाहिये ताकि तू भविष्य में पुनः कभी सन्तों एवं विद्वानों की सभा का उपहास करने का दुस्साहस न कर सके. मैं तुझे शाप देती हूं कि तत्क्षण ही तू अपने इस विमान से पतित होकर भूलोक पर जायेगा तथा राक्षस योनि में तेरा जन्म होगा.
श्राप के बाद राक्षस योनि में हुआ चित्ररथ का जन्म
देवी जगदम्बा द्वारा शाप मिलते ही चित्ररथ अपने विमान से भूलोक पर जा गिरा एवं राक्षस योनि को प्राप्त हुआ तथा महासुर के नाम से कुख्यात हुआ. त्वष्टा नामक एक तपस्वी ऋषि ने अपने तपोबल से उस असुर को वृत्रासुर के रूप में प्रकट किया.'
तपस्या के बल पर शक्तिशाली बना वृत्रासुर
बृहस्पति जी आगे कहते हैं- वृत्रासुर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुये भगवान शिव की भक्ति करने लगा. शिव भक्ति के फलस्वरूप उसे अथाह बल एवं पराक्रम प्राप्त हुआ है. अतः शिवभक्त होने के कारण तुम उसे परास्त नहीं कर सकते. मेरा यही सुझाव है कि यदि तुम उस महापराक्रमी दैत्य पर विजय प्राप्त करना चाहते हो तो बृहस्पति प्रदोष व्रत का भक्तिपूर्वक पालन करो.
शिव भक्ति के कारण वृत्रासुर को मिला अपार बल
सूतजी कहते हैं- "देवगुरु बृहस्पति के परामर्श के अनुसार देवताओं ने सम्पूर्ण विधि-विधान से गुरु प्रदोष व्रत का पालन किया, जिसके फलस्वरूप वृत्रासुर की पराजय हुयी एवं देवलोक पर आये भीषण संकट का निवारण हुआ. इस प्रकार जो भी इस परम पुण्य प्रदायक व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करता है, उसके समस्त कष्टों का शमन होता है तथा मनोवाञ्छित कामनाओं की पूर्ति होती है.
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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