Smit Machchhar पर ट्रंप ने इधर किया बड़ा ऐलान, उधर ओमानी पायलट को मिलेगी बड़ी सजा, 9 लोग गोलियों से भूनेंगे? तैयारी शुरू
अमेरिकी संसद ने आतंकी हमले को नाकाम करने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मिथ मछार को बहादुर बोलते हुए उनके लिए अपनी संसद में सम्मान प्रस्ताव पारित कर दिया। वहीं दुबई से इजराइल जा रहे प्लेन को क्रैश करने की कोशिश करने वाले जिहादी पायलट पर एक के बाद एक खुलासे हो रहे हैं। हमले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे ही उसके नापाक मंसूबे दुनिया के सामने आ रहे हैं और दुनिया भर में उसकी हरकत को लेकर इतना भयंकर गुस्सा है कि उसे मौत की सजा देने की मांग की जा रही है। कट्टरपंथी पायलट अलमामी इस वक्त यूएई की हिरासत में है। जिस वक्त दुनिया भर के मुस्लिम देश ओमानी पायलट को आतंकी कहने से बच रहे थे तो उस दौरान यूएई ने यह साफ किया था कि वह आतंकी का धर्म देखकर उसे बचाने की कोशिश कतई नहीं करेगा। यूएई ने फ्लाई दुबई विमान में हुई घटना को आधिकारिक तौर पर खतरनाक आतंकवादी कृत बताया था। जबकि सऊदी उसे बचाने की भरपूर कोशिश कर रहा था। लेकिन अब खबर है कि यूएई में उसे मौत की सजा देने की तैयारी शुरू हो गई है और उसे ऐसी सजा मिलेगी सुनकर सभी चौंक जाएंगे।
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दरअसल ओमानी पायलट अलमामी ने बताया कि वह विमान को वेन गुरियन एयरपोर्ट से टकराना चाहता था। उसने इजराइल जाने वाली एयरलाइनों के बारे में जानकारी जुटाई। इसी वजह से फ्लाई दुबई में नौकरी हासिल करने की कोशिश की। पूछताछ में अंबानी ने बताया कि पिछले 8 महीने से उसका मकसद सिर्फ एक ही था इजराइल में 91 से भी बड़ा अटैक करना। ज्यादा से ज्यादा इजराइली लोगों को मारना और उसके पहले टारगेट पर 8000 से ज्यादा लोग थे जिन्हें वह मारना चाहता था। उसने बताया कि नौकरी मिलने से पहले ही उसने इस पूरे ऑपरेशन की प्लानिंग कर ली थी। जांच में यह भी बात सामने आई है कि वो हमला इतनी तेजी से करना चाहता था कि इजराइली सेना को लड़ाकू विमान हवा में भेजने का मौका ही ना मिले। लेकिन अब यूएई ने उस पर ऐसा शिकंजा कसा है कि उसे मौत की सजा से कोई भी नहीं रोक पाएगा। यूएई में फांसी या सऊदी अरब की तरह पब्लिक में गला काटने का रिवाज नहीं है।
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यहां नौ लोग एक कमरे में दोषी को गोली से मारते हैं। दरअसल यूएई में मौत की सजा का कानूनी तरीका फायरिंग स्क्वाड है। फांसी या सार्विक तौर पर सजा यहां नहीं दी जाती। मौत की सजा पर अमल से पहले अदालतों में अपील की प्रक्रिया पूरी होती है और इसके बाद अमीरात के शासक या संघीय मामलों में यूएई के राष्ट्रपति की लिखित मंजूरी जरूरी होती है। इसके बाद जेल के एक हिस्से में दोषियों को ले जाया जाता है। फायरिंग स्क्वाड में आमतौर पर नौ लोग होते हैं। इन सभी को बंदूक दी जाती है। ज्यादातर बंदूकों में असली गोलियां होती हैं। लेकिन कम से कम एक बंदूक या उससे ज्यादा ऐसी होती है जिसमें गोली नहीं होती। ऐसा इसलिए ताकि जब एक साथ गोली चले तो किसी को यह ना पता चल सके कि आखिर वो गोलियां किसने चलाई जिससे मौत की सजा मिली।
Nandigram Byelection: मिलन प्रधान की अंतरिम जमानत बरकरार, सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार की चुनौती पर दखल से किया इनकार
नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को मिली अंतरिम जमानत में दखल देने से इनकार कर दिया है. पश्चिम बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत मिलन प्रधान को चुनाव लड़ने और चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए अंतरिम राहत दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने बुधवार को राज्य सरकार की अपील पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.
गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे. सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि वह मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं कर रही है. साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार को यह स्वतंत्रता दी गई कि अगर मिलन प्रधान आगे नियमित जमानत या अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट का रुख करते हैं, तो राज्य अपनी आपत्तियां वहां रख सकता है.
नंदीग्राम और खेजुरी क्षेत्र में दर्ज कई मामले
मामले की शुरुआत सितंबर में हुई थी. मिलन प्रधान को 18 सितंबर को 2007 से जुड़े पुराने आपराधिक मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. उनके खिलाफ नंदीग्राम और खेजुरी क्षेत्र में दर्ज कई मामले लंबित बताए गए हैं. इन मामलों में गंभीर आपराधिक धाराएं भी शामिल हैं. गिरफ्तारी के समय मिलन प्रधान नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव के लिए कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल कर चुके थे. इसके बाद उनकी ओर से कलकत्ता हाईकोर्ट में अंतरिम जमानत की मांग की गई थी.
जमानत की अवधि 20 अक्टूबर तक रखी
29 सितंबर को कलकत्ता हाईकोर्ट ने मिलन प्रधान को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत दी थी. अदालत ने उन्हें चुनाव में हिस्सा लेने की अनुमति दी और अंतरिम जमानत की अवधि 20 अक्टूबर तक रखी. आदेश के मुताबिक उन्हें 21 अक्टूबर को संबंधित अदालत के सामने आत्मसमर्पण करना होगा. हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि उन्हें अपना मोबाइल नंबर नंदीग्राम थाने के प्रभारी अधिकारी को उपलब्ध कराना होगा और पुलिस उनकी मौजूदगी की जानकारी लेने के लिए निर्धारित समय पर उनसे संपर्क कर सकती है.
पश्चिम बंगाल सरकार ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. राज्य की ओर से दलील दी गई कि केवल चुनाव लड़ने के आधार पर किसी आरोपी को जमानत का अधिकार नहीं दिया जा सकता. सरकार ने मिलन प्रधान के खिलाफ लंबित मामलों और आरोपों की गंभीरता का भी हवाला दिया. वहीं मिलन प्रधान की ओर से कहा गया कि उनके खिलाफ मामले करीब 19 साल पुराने हैं और उनकी गिरफ्तारी ऐसे समय हुई जब वे चुनावी मैदान में उतर चुके थे.
7 अक्टूबर के लिए रखा गया था
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने खुद को अलग कर लिया था. उन्होंने बताया था कि वकालत के दिनों में वह मामले से जुड़े कुछ पक्षों की ओर से पेश हो चुके थे, इसलिए हितों के टकराव की स्थिति से बचने के लिए वह सुनवाई का हिस्सा नहीं बनना चाहते. इसके बाद मामले को 7 अक्टूबर के लिए रखा गया था.
बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि नंदीग्राम में मतदान हो चुका है. अदालत को बताया गया कि मतदान 6 अक्टूबर को हुआ और मतगणना 9 अक्टूबर को होनी है. ऐसे में कोर्ट ने कहा कि कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम राहत में इस स्तर पर हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है. साथ ही अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश को मामले के आरोपों की मेरिट पर राय के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
2007 का भूमि अधिग्रहण आंदोलन
नंदीग्राम का राजनीतिक इतिहास भी इस मामले को खास बनाता है. 2007 का भूमि अधिग्रहण आंदोलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम रहा है और इसी दौर से जुड़े कई आपराधिक मामले वर्षों तक अदालतों में लंबित रहे. मिलन प्रधान का मामला भी इसी पृष्ठभूमि से जुड़े पुराने मामलों में शामिल है.
अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद मिलन प्रधान को मिली अंतरिम जमानत फिलहाल कायम रहेगी. हालांकि यह राहत स्थायी नहीं है. यदि वह आगे नियमित जमानत या अंतरिम राहत बढ़ाने के लिए अदालत का रुख करते हैं, तो पश्चिम बंगाल सरकार को उस स्तर पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का अधिकार रहेगा. इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया है, लेकिन मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी.
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