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Jadavpur University ने वामपंथी छात्र सम्मेलन विवाद के बाद कार्यक्रम मंजूरी समिति भंग की

कोलकाता, सात अक्टूबर यादवपुर विश्वविद्यालय ने परिसर में वाम समर्थित छात्र संगठनों द्वारा आयोजित एक सम्मेलन और उसमें आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की मौजूदगी को लेकर हुए विवाद के बाद कार्यक्रमों को मंजूरी देने वाली एक समिति को भंग कर दिया है और कुलसचिव को ऐसे मामलों की जिम्मेदारी संभालने का निर्देश दिया है। सोमवार को आयोजित ‘जेन जी मूवमेंट: यूनिटी ऑफ जेनरेशन एंड रेजिस्टेंस’ नामक सम्मेलन में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं आयोजित कराने वाली राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को खत्म करने समेत विभिन्न मांगों पर चर्चा की गई। इसके अलावा, इसमें मतदाता सूचियों के विशेष गहन परीक्षण (एसआईआर) और प्रस्तावित भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) विधेयक का भी विरोध किया गया।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने विश्वविद्यालय के बाहर की राजनीतिक हस्तियों की कथित मौजूदगी का विरोध किया और सवाल उठाया कि क्या कार्यक्रम को प्रशासनिक अनुमति मिली थी। आयोजकों ने पलटकर कहा कि आरएसएस से संबद्ध छात्र संगठन को “बाहरी लोगों” के बारे में बात करने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि अगस्त में अशांति के दौरान उसके कई नेता, जिनका विश्वविद्यालय से कोई संबंध नहीं था, जबरन परिसर में घुस आए थे। विवाद के बाद, विश्वविद्यालय के कुलपति चिरंजीब भट्टाचार्य ने मंगलवार को एक अधिसूचना जारी करते हुए कहा कि ‘कार्यक्रमों के अनुमोदन और निगरानी’ समिति को भंग कर दिया गया है और कुलसचिव देबजीत दत्ता अगले आदेश तक मामलों की देखरेख करेंगे।

अधिसूचना में हालांकि निर्णय का कारण निर्दिष्ट नहीं किया गया था, दत्ता ने बुधवार को ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि कार्यक्रम को अनुमति देने में “प्रक्रियात्मक चूक” के कारण समिति को भंग कर दिया गया और जल्द ही एक नयी समिति गठित की जाएगी। कुलसचिव ने कहा, “हमने कार्यक्रमों के अनुमोदन और निगरानी समिति के अध्यक्ष और डीन को भी ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया है तथा इस चूक के लिए स्पष्टीकरण मांगा है।” दत्ता ने कहा कि यादवपुर विश्वविद्यालय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और परिसर में कार्यक्रम आयोजित करने के अधिकार के पक्ष में है। उन्होंने कहा, लेकिन “राजनीतिक कार्यक्रम” को मंजूरी देने की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

कुलसचिव ने सोमवार को कहा था कि कार्यक्रम के लिए अनुमति लेने के वास्ते उनसे संपर्क नहीं किया गया था और उनके कार्यालय ने इसके लिए मंजूरी नहीं दी थी। उन्होंने पहले चेतावनी दी थी कि यदि आवश्यक मंजूरी के बिना कार्यक्रम आयोजित किया गया तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। संकाय के एक वरिष्ठ सदस्य ने, हालांकि कहा कि कार्यक्रम के आयोजकों को संबंधित समिति से मंजूरी मिल गई थी।

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के नियमों के तहत, समिति की सिफारिश कुलसचिव तक पहुंचनी चाहिए, लेकिन कथित तौर पर ऐसा नहीं हुआ। आरएसएस से संबद्ध शिक्षक संगठन अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) के प्रमुख भास्कर सरदार ने कहा कि कार्यक्रम को निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना अनुमति दी गई।

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Shaurya Path: Ashutosh Dixit संभालेंगे Indian Air Force की कमान, भारत अब बदलेगा आसमान का खेल! दुश्मन अभी से हुए बेचैन

भारतीय वायुसेना को जल्द ही नया नेतृत्व मिलने जा रहा है। एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित 31 अक्टूबर 2026 को भारतीय वायुसेना के 29वें प्रमुख के रूप में कमान संभालेंगे। करीब चार दशक के लंबे सैन्य अनुभव, हजारों घंटे की उड़ान और लड़ाकू विमानों से लेकर रणनीतिक कमान तक के अनुभव के साथ दीक्षित ऐसे समय में वायुसेना की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जब भारत की हवाई ताकत को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की बड़ी चुनौती सामने है।

हम आपको बता दें कि आशुतोष दीक्षित की सबसे बड़ी विशेषता उनका लंबा और विविध युद्धक अनुभव है। वर्ष 1986 में लड़ाकू विमान धारा में शामिल हुए दीक्षित को लगभग चार दशक की सेवा का अनुभव है। वह तीन हजार पांच सौ घंटे से अधिक उड़ान भर चुके हैं और मिराज-2000, मिग श्रेणी के विमानों, जगुआर और तेजस सहित अनेक विमानों को उड़ा चुके हैं। वह प्रायोगिक परीक्षण पायलट और प्रशिक्षित उड़ान प्रशिक्षक भी रहे हैं। यानी उनके सामने युद्धक विमान केवल हथियार नहीं, बल्कि युद्ध की पूरी रणनीति का हिस्सा हैं।

उनकी सेवा यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है मैदान से लेकर रणनीतिक स्तर तक उनका अनुभव। उन्होंने पश्चिमी क्षेत्र में अग्रिम लड़ाकू अड्डे की कमान संभाली, दक्षिणी क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रशिक्षण अड्डे का नेतृत्व किया, दक्षिणी वायु कमान में वायु रक्षा की जिम्मेदारी निभाई और बाद में केंद्रीय वायु कमान के वायु अधिकारी कमांडिंग-इन-चीफ रहे। वह एकीकृत रक्षा स्टाफ के प्रमुख के रूप में भी काम कर चुके हैं। सरकार के अनुसार इस भूमिका में उन्होंने तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता और एकीकरण को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

यही अनुभव उनके नेतृत्व की दिशा का संकेत देता है। आने वाला युद्ध केवल लड़ाकू विमानों की संख्या से नहीं जीता जाएगा। रडार, उपग्रह, मानवरहित विमान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, लंबी दूरी के हथियार, हवाई चेतावनी प्रणाली और जमीन आधारित वायु रक्षा, इन सबको एक ही युद्धक तंत्र में जोड़ना होगा। आशुतोष दीक्षित का परीक्षण पायलट का अनुभव और एकीकृत रक्षा व्यवस्था में काम करने का अनुभव इस चुनौती के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

लेकिन उनके सामने सबसे कठिन सवाल वायुसेना की लड़ाकू क्षमता का है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार भारतीय वायुसेना के लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या स्वीकृत संख्या से काफी नीचे है और तेजस के नए संस्करण की आपूर्ति में देरी ने इस कमी को और गंभीर बनाया है। प्रस्तावित बहु-भूमिका लड़ाकू विमान सौदे और भविष्य के स्वदेशी लड़ाकू विमानों की योजनाएं भी इसी बड़े अंतर को भरने की कोशिश हैं।

यहीं से नये वायुसेना प्रमुख की असली परीक्षा शुरू होगी। उन्हें एक तरफ तत्काल युद्धक क्षमता बनाए रखनी होगी और दूसरी तरफ भविष्य की वायुसेना तैयार करनी होगी। तेजस, भविष्य का उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान, लंबी दूरी के हथियार, आधुनिक रडार, हवाई चेतावनी प्रणाली और मानवरहित प्रणालियों को एक साथ गति देना आसान काम नहीं है।

फिर भी तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। वर्ष 2026 में भारतीय वायुसेना लगातार ऐसे अभ्यास कर रही है जिनसे स्पष्ट है कि युद्ध की तैयारी केवल कागज पर नहीं हो रही। ‘तरंग शक्ति’ में भारत के साथ अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों की वायु सेनाएं शामिल हैं। इस अभ्यास में विभिन्न प्रकार के लड़ाकू विमान, परिवहन विमान और हवा में ईंधन भरने वाले विमान शामिल हैं। उद्देश्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में संयुक्त अभियान की क्षमता बढ़ाना है। इसके अलावा, जापान के साथ ‘वीर गार्जियन’ में तेजस, सुखोई-30 एमकेआई और राफेल ने जापानी एफ-2 विमानों के साथ उन्नत हवाई अभियानों का अभ्यास किया। इससे भारतीय वायुयोद्धाओं को अलग-अलग युद्धक सिद्धांतों और परिस्थितियों में काम करने का अनुभव मिलता है।

इससे भी आगे की तैयारी पोखरण में आयोजित ‘ड्रोनाथॉन’ में दिखाई देती है। यहां निगरानी, स्वायत्त संचालन, झुंड तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और ड्रोन-रोधी प्रणालियों का परीक्षण किया गया। वायुसेना ने मानवरहित प्रणालियों के लिए अपनी भविष्य की जरूरतों का खाका भी जारी किया। संदेश साफ है कि भविष्य के युद्ध में केवल पायलट वाला विमान नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में बुद्धिमान मानवरहित प्रणालियां भी निर्णायक भूमिका निभाएंगी।

हम आपको यह भी बता दें कि ‘वायु शक्ति-26’ ने भी भारतीय वायुसेना की तस्वीर स्पष्ट की। दिन और रात दोनों समय बड़े पैमाने पर अभियान, हवाई हमले, वायु रक्षा, विशेष बलों की कार्रवाई और परिवहन अभियानों को एक साथ संचालित किया गया। राफेल, सुखोई-30 एमकेआई, मिराज-2000, मिग-29 और जगुआर जैसे लड़ाकू विमानों के साथ आकाश और स्पाइडर जैसी वायु रक्षा प्रणालियों का समन्वय दिखाया गया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भविष्य की सबसे बड़ी ताकत केवल विमानों की संख्या नहीं, बल्कि उनकी आंख और दिमाग होंगे। स्वदेशी ‘नेत्र’ हवाई चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली को अंतिम परिचालन मंजूरी मिलना इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके जरिए हवा में मौजूद खतरों की निगरानी, परिस्थितिजन्य जानकारी और युद्धक्षेत्र का नियंत्रण मजबूत होता है। इसके अगले संस्करण की दिशा में भी काम चल रहा है।

देखा जाये तो आशुतोष दीक्षित के सामने सबसे बड़ी चुनौती भारतीय वायुसेना को ऐसी ताकत बनाने की होगी, जो सिर्फ सीमा की रक्षा तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरत पड़ने पर दुश्मन की हवाई रणनीति, संचार व्यवस्था, निगरानी तंत्र और सैन्य ठिकानों पर भी जबरदस्त दबाव बना कर उसे कुछ घंटों में ही घुटने टेकने पर मजबूर कर दे।

आने वाले वर्षों में अगर लड़ाकू विमानों की कमी दूर होती है, स्वदेशी हथियार और तकनीक समय पर वायुसेना तक पहुंचती है और लड़ाकू विमानों के साथ ड्रोन, हवाई चेतावनी प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और लंबी दूरी के हथियारों का बेहतर तालमेल बनाया जाता है, तो भारतीय वायुसेना की ताकत कई गुना बढ़ सकती है। देखा जाये तो असली ताकत सिर्फ ज्यादा विमान रखने में नहीं, बल्कि दुश्मन से पहले खतरे को पहचानने और उससे कहीं तेजी से जवाब देने में होगी।

बहरहाल, आधुनिक हवाई युद्ध का नियम बिल्कुल साफ है। जिसके पास बेहतर जानकारी, ज्यादा सटीक हथियार और तेज फैसला लेने की क्षमता होगी, उसे बढ़त मिलेगी। अब आशुतोष दीक्षित के सामने यही चुनौती है कि भारतीय वायुसेना को इस नई युद्ध तकनीक और रणनीति के मामले में और आगे कैसे ले जाया जाए।

-नीरज कुमार दुबे

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