Political Drama के बाद फिर BSP में वापस कैसे लौटे Akash Anand? क्या है Mayawati का 2027 वाला प्लान?
बहुजन समाज पार्टी (BSP) की अध्यक्ष मायावती ने सोमवार (5 अक्टूबर, 2026) को आकाश आनंद को पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक फिर से नियुक्त करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला पार्टी और आंदोलन के हित में लिया गया है। मायावती ने 'X' पर लिखा कि काफ़ी सोच-विचार के बाद, पार्टी और आंदोलन के हित में यह फ़ैसला लिया गया है कि आकाश आनंद को एक बार फिर BSP का राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त किया जाए और उन्हें पार्टी में दोबारा काम करने का मौका दिया जाए।
ज़्यादा सक्रिय होने की उम्मीद
जैसे-जैसे BSP 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रही है, पर्दे के पीछे आनंद के उत्तर प्रदेश की राजनीति में और ज़्यादा सक्रिय होने की उम्मीद है। उनकी नई भूमिका का पहला इम्तिहान 9 अक्टूबर को लखनऊ में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती पर होने वाली BSP की बड़ी रैली में हो सकता है। उम्मीद है कि आनंद इस कार्यक्रम में मंच साझा नहीं करेंगे, लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है कि वह लखनऊ में संगठन से जुड़े इंतज़ामों और पर्दे के पीछे की रणनीति बनाने में शामिल हो सकते हैं। आने वाले हफ़्तों में उनकी राजनीतिक गतिविधियां भी ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखाई देने की उम्मीद है। 1 नवंबर को आनंद के अयोध्या के एक विधानसभा क्षेत्र में जनसभा को संबोधित करने की संभावना है, जहां BSP जितेंद्र सिंह बबलू को अपना उम्मीदवार घोषित कर सकती है।
कैसे हुई वापसी
आनंद की यह वापसी तीसरी बार है जब उन्हें BSP से हटाए जाने के बाद अहम भूमिका में वापस लाया गया है। मायावती ने सोमवार को उन्हें फिर से बहाल कर दिया; इससे कुछ दिन पहले ही उन्होंने मायावती से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगी थी और उनके नेतृत्व में काम करने का एक और मौका मांगा था। मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक के पद पर बहाल करते हुए कहा कि यह फ़ैसला पार्टी और बहुजन आंदोलन के हित में लिया गया है। BSP के अंदर की गतिविधियों की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, इस सुलह के पीछे लखनऊ में मायावती के घर पर उनके और आनंद के बीच हुई एक लंबी बैठक थी। यह बैठक आनंद के राजनीतिक भविष्य को लेकर हफ़्तों तक बनी अनिश्चितता के बाद हुई।
ससुर अशोक सिद्धार्थ की रिटायरमेंट
इस पारिवारिक राजनीतिक ड्रामे में उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ भी शामिल हो गए थे, जो BSP के पूर्व राज्यसभा सदस्य और पार्टी के सीनियर पदाधिकारी थे। मायावती ने आकाश की पार्टी में संभावित वापसी के लिए सिद्धार्थ के राजनीति से रिटायरमेंट को एक शर्त बनाया था। इसके बाद सिद्धार्थ ने रिटायरमेंट का ऐलान कर दिया, लेकिन फिर भी मायावती ने 10 सितंबर को आकाश को पार्टी से निकाल दिया। उस समय उन्होंने कहा था कि आकाश का व्यवहार और उनके पारिवारिक संबंध चिंता का विषय बन गए थे। बाद में आनंद ने मायावती से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगी। उन्होंने मायावती को अपना राजनीतिक गुरु और "बुआ माँ" बताया और कहा कि BSP उनके लिए सिर्फ़ एक राजनीतिक संगठन नहीं, बल्कि उनका परिवार है। उन्होंने पार्टी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई और पार्टी की सेवा करने का एक और मौका मांगा।
उत्तर प्रदेश चुनाव में भूमिका
वापसी के बाद लखनऊ में हुई बैठक में, आनंद का स्वागत BSP के वरिष्ठ नेताओं ने किया, जिनमें सतीश चंद्र मिश्रा और उत्तर प्रदेश यूनिट के प्रमुख विश्वनाथ पाल शामिल थे; उन्होंने पार्टी की नीली टोपी पहनाकर उनका स्वागत किया। मायावती ने आकाश आनंद को संगठन में एक अहम पद पर वापस ला दिया है और संकेत दिया है कि उनके अलग होने की संभावना कम है। ऐसे में आने वाले हफ़्तों में यह साफ़ हो जाएगा कि उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए BSP की तैयारियों में आकाश आनंद की क्या भूमिका रहती है। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव पहला ऐसा मौका होगा जब बीएसपी प्रमुख मायावती अपने भतीजों आकाश आनंद और ईशान आनंद के साथ मिलकर पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभालेंगी। परिवार ने पहले कभी किसी चुनाव में एक साथ प्रचार नहीं किया है। आकाश आनंद को 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीएसपी के स्टार प्रचारकों में से एक के तौर पर उतारा गया था, लेकिन राज्य में वोटिंग के तीसरे चरण के बाद, 7 मई को मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। इसके साथ ही उनका चुनाव प्रचार भी खत्म हो गया।
यवाओं पर होगा जोर
मायावती ने देश और यूपी में Gen-Z और Gen-Alpha के हालिया विरोध प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन किया है और युवाओं को अपनी पार्टी से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में, पार्टी के युवा संपर्क अभियानों में 'आनंद-ब्रदर्स' अहम भूमिका निभा सकते हैं। आकाश ने 10 अगस्त को हाथरस से यूपी चुनावों के लिए अपना अभियान शुरू किया था और 25 अगस्त को गौतम बुद्ध नगर के जेवर में एक और बैठक को संबोधित किया था, लेकिन 10 सितंबर को उन्हें अचानक पार्टी से हटा दिया गया था। अब, जब मायावती ने उन्हें पार्टी में उनकी अहम भूमिका पर फिर से नियुक्त किया है, तो राज्य में जनसभाओं के लिए उनका नया कार्यक्रम तैयार हो सकता है।
J&K में UCC लागू करने से इंकार करते हुए Omar Abdullah ने मोदी सरकार को दे डाली बड़ी चुनौती
देश की राजनीति में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एक तरफ भाजपा और उसके नेतृत्व वाले राजग शासित राज्यों में यूसीसी को आगे बढ़ाने की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं, वहीं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने प्रदेश में इसे लागू करने से साफ इंकार कर दिया है। उमर ने केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा है कि यदि यूसीसी लागू करना है तो सरकार को संसद में विधेयक लाकर उस पर खुली बहस करनी चाहिए।
उमर अब्दुल्ला का यह बयान ऐसे समय आया है जब यूसीसी को लेकर भाजपा शासित राज्यों में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जहां यूसीसी 27 जनवरी 2025 से प्रभावी हो चुका है। इसके बाद गुजरात, असम और मध्य प्रदेश ने भी यूसीसी से जुड़े कानून विधानसभा से पारित किए हैं। हालांकि इन राज्यों में कानून की वास्तविक प्रभावी तारीख और नियमों की प्रक्रिया अलग-अलग चरणों में है। गुजरात का मामला अब सबसे आगे बढ़ चुका है। राज्य विधानसभा द्वारा पारित यूसीसी विधेयक को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी मिल चुकी है और राज्य सरकार अब इसके नियमों को अधिसूचित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। वहीं असम और मध्य प्रदेश में भी भाजपा सरकारों ने कानून पारित कर दिए हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा ने जुलाई में यूसीसी विधेयक पारित किया था, जबकि असम में मई में विधेयक पारित हुआ। इन दोनों राज्यों में भी आगे की संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी की जा रही है।
इसके अलावा भाजपा और राजग के दूसरे राज्यों में भी यूसीसी की तैयारी शुरू हो चुकी है। महाराष्ट्र में सरकार ने उच्चतम न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में मसौदा तैयार करने के लिए समिति बनाई है। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेन्दु अधिकारी ने अगले छह महीने में यूसीसी लागू करने का ऐलान किया है। साथ ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी सितंबर में बड़ा लक्ष्य सामने रखते हुए कहा था कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा-राजग द्वारा शासित सभी 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में यूसीसी लागू किया जाएगा। यानी एक तरफ यूसीसी का दायरा राज्यों में धीरे-धीरे बढ़ाने की भाजपा की रणनीति दिखाई दे रही है, तो दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर से उमर अब्दुल्ला ने इसके खिलाफ स्पष्ट राजनीतिक रेखा खींच दी है।
उमर का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में यूसीसी लागू नहीं किया जाएगा। उनका तर्क है कि यदि यह वास्तव में समान नागरिक संहिता है तो इसे पूरे देश के लिए संसद के माध्यम से लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने केंद्र से कहा है कि वह संसद में विधेयक लाए और वहां इस पर बहस कराए।
देखा जाये तो पूरे घटनाक्रम ने यूसीसी को महज कानूनी मुद्दे से आगे बढ़ाकर केंद्र और राज्यों के बीच अधिकार, संसद की भूमिका और अलग-अलग राज्यों में कानून लागू करने की प्रक्रिया का बड़ा राजनीतिक सवाल बना दिया है। आने वाले समय में यह टकराव कितना बढ़ता है, इसकी दिशा अब संसद, राज्यों और न्यायिक प्रक्रिया से तय होगी।
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