अमेरिका के न्याय विभाग ने जब जेफ्री एपस्टीन से जुड़े लाखों पन्नों के कागजात सार्वजनिक किये, तो दुनिया भर में हलचल मच गयी। इन दस्तावेजों में कई देशों के बड़े नेताओं, धनवान लोगों और प्रभावशाली हस्तियों के नाम संदर्भ के रूप में सामने आये, जिससे राजनीति और कूटनीति दोनों में गरमाहट बढ़ गयी। हालांकि अधिकारियों ने साफ कहा है कि किसी का नाम आना अपराध का प्रमाण नहीं है, फिर भी इन खुलासों ने वैश्विक स्तर पर बहस और सनसनी का माहौल बना दिया है।
हम आपको बता दें कि जेफ्री एपस्टीन पहले ही यौन अपराधों में दोषी ठहराया जा चुका था। वर्ष 2008 में उसे सजा मिली, पर वह कड़े दंड से बच गया। वर्ष 2019 में उसे फिर नाबालिग लड़कियों की तस्करी जैसे गंभीर आरोपों में पकड़ा गया, लेकिन मुकदमा पूरा होने से पहले ही वह जेल में मृत पाया गया। उसकी मौत को आधिकारिक रूप से आत्महत्या बताया गया, पर उसके संपर्कों का जाल दुनिया भर में फैला होने से संदेह और चर्चा का दौर कभी थमा नहीं।
नये कागजातों में अनेक देशों के प्रभावशाली लोगों के साथ उसके संदेश, मुलाकातें और संपर्क दर्ज हैं। अमेरिका के बड़े राजनेताओं, उद्योगपतियों और तकनीकी जगत के धनाढ्यों तक के नाम सामने आये हैं। पर हर जगह एक ही चेतावनी दोहरायी गयी है कि संदर्भ का अर्थ दोष सिद्धि नहीं है।
भारत के संदर्भ में सबसे अधिक चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम को लेकर हुई। कागजातों में कुछ संदेश कथित रूप से ऐसे हैं जिनमें उद्योगपति अनिल अंबानी और एपस्टीन के बीच बातचीत में भारत के प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं और मुलाकातों का जिक्र है। इन संदेशों में अमेरिका और इजराइल से जुड़ी कूटनीतिक पहल पर चर्चा दिखती है। हम आपको याद दिला दें कि वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा ऐतिहासिक मानी गयी थी, क्योंकि यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी।
इन संदेशों में यह भी दिखता है कि अनिल अंबानी ने कुछ मौकों पर अमेरिकी सत्ता से जुड़े लोगों से संपर्क साधने में मदद की बात कही। एपस्टीन ने भी अपनी शेखी भरी भाषा में लिखा था कि उसकी सलाह कारगर रही। पर यह सब उसके निजी दावे हैं, जिनका कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं दिया गया। भारत सरकार ने इस पूरे मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने साफ कहा कि प्रधानमंत्री की आधिकारिक इजराइल यात्रा के अलावा बाकी बातें एक दोषी व्यक्ति की बेबुनियाद बकवास हैं और उन्हें उसी तरह खारिज किया जाना चाहिए। सरकार ने दो टूक कहा कि बिना आधार की अटकलों को सच की तरह फैलाना गैर जिम्मेदाराना है।
इसी बीच विपक्ष, खासकर कांग्रेस, ने सवाल उठाये और पारदर्शिता की मांग की। कांग्रेस का कहना है कि प्रधानमंत्री को स्वयं सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। हालांकि अभी तक ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है जो किसी गैर कानूनी काम की ओर सीधा संकेत करे। हम आपको यह भी बता दें कि इन कागजातों में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम भी आया है। उनके और एपस्टीन के बीच निवेश और भारत में अवसरों को लेकर संदेशों का आदान प्रदान दिखता है। इस पर हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि उनके सभी संपर्क केवल औपचारिक थे।
भारत से बाहर देखें तो नॉर्वे की युवरानी मेटे मारित के एपस्टीन से लंबे समय तक संपर्क के संकेत मिले हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से खेद जताया और कहा कि यह उनका गलत निर्णय था। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रुड का नाम एपस्टीन की मुलाकात सूची में दर्ज बताया गया, हालांकि उन्होंने किसी भी नजदीकी संबंध से इंकार किया है। ब्रिटेन के वरिष्ठ नेता पीटर मैंडलसन को लेकर भुगतान और संपर्क की बातें सामने आयीं, जिनके बाद उन्हें राजनीतिक आलोचना झेलनी पड़ी और पद छोड़ना पड़ा। स्लोवाकिया के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार मिरोस्लाव लाजचाक ने तो विवाद बढ़ने पर इस्तीफा तक दे दिया, भले ही उन्होंने आरोपों को नकारा। वहीं कुछ धनकुबेर जैसे एलन मस्क और बिल गेट्स के साथ संदेशों के आदान प्रदान ने यह दिखाया कि एपस्टीन प्रभावशाली लोगों के बीच पहुंच बनाने में माहिर था। पर हर मामले में वही सावधानी दोहरायी गयी कि संपर्क या संदेश अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करते, फिर भी इन खुलासों ने दुनिया भर में सत्ता और धन के रिश्तों पर असहज सवाल खड़े कर दिये।
हम आपको यह भी बता दें कि अमेरिका के न्याय विभाग द्वारा जेफ्री एपस्टीन से जुड़े लगभग पैंतीस लाख नये दस्तावेज जारी किये जाने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी फिर से चर्चा में आ गया है। हालांकि शुरुआती सरकारी बयान और उपलब्ध कागजात यह संकेत देते हैं कि ट्रंप के खिलाफ किसी यौन अपराध या आपराधिक कृत्य का सीधा प्रमाण इन फाइलों में नहीं मिला है, फिर भी उनके और एपस्टीन के संबंधों को लेकर सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
न्याय विभाग के उप महान्यायवादी टॉड ब्लांश ने एक विशेष साक्षात्कार में कहा कि एपस्टीन के वर्षों के पत्राचार की समीक्षा के बाद ऐसा कुछ नहीं मिला जिसमें एपस्टीन ने ट्रंप पर कोई आपराधिक आरोप लगाया हो या पीड़ितों के साथ ट्रंप के अनुचित संबंध का जिक्र किया हो। उन्होंने यहां तक कहा कि जब एपस्टीन ने ट्रंप की बुराई करने की कोशिश भी की, तब भी उसने कोई आपराधिक आरोप नहीं लगाया। यह बयान साफ तौर पर ट्रंप को संभावित राजनीतिक नुकसान से बचाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन दस्तावेजों को विस्तार से देखने पर तस्वीर थोड़ी जटिल लगती है। ट्रंप का नाम कुछ अपुष्ट सूचनाओं में आया है जो जांच एजेंसी को भेजी गयी थीं। एक पीड़िता के साक्षात्कार के हस्तलिखित नोट्स में भी उनका नाम दर्ज है। एपस्टीन के एक कर्मचारी ने जांचकर्ताओं से कहा कि उसे याद है कि ट्रंप कभी एपस्टीन के घर आये थे। साथ ही वर्ष 2002 के कुछ संदेशों में मेलानिया नाम की महिला द्वारा दोस्ताना संवाद और पाम बीच यात्रा का जिक्र मिलता है। ये संदर्भ सीधे तौर पर अपराध साबित नहीं करते, पर संबंधों की प्रकृति पर जिज्ञासा जरूर बढ़ाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप प्रशासन ने लंबे समय तक इन फाइलों को सार्वजनिक करने में अनिच्छा दिखाई, जबकि चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप पारदर्शिता की बात करते रहे थे। ट्रंप ने अपने ऊपर लगे एक आरोप को लेकर एक बड़े अखबार पर मुकदमा भी किया, जिसमें दावा था कि उन्होंने एपस्टीन के लिए आपत्तिजनक चित्र और टिप्पणी भेजी थी।
इन फाइलों में ट्रंप के करीबी लोगों के नाम भी सामने आये हैं। हॉवर्ड लटनिक के परिवार सहित एपस्टीन के द्वीप जाने की योजना का जिक्र है, हालांकि उन्होंने मुलाकात से इंकार किया है। एलन मस्क के संदेशों में एपस्टीन के द्वीप और पार्टियों में रुचि दिखती है, भले ही यात्रा साकार न हुई हो। स्टीव बैनन और एपस्टीन के बीच लंबा संवाद और एक विस्तृत वीडियो साक्षात्कार का भी उल्लेख है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ट्रंप सभी एपस्टीन फाइलें जारी करवाएंगे? हालांकि अमेरिकी न्याय विभाग संकेत दे चुका है कि हालिया जारीकरण उनके प्रयासों का लगभग अंत है। दूसरी ओर कुछ सांसदों का कहना है कि अभी लाखों पन्ने रोके गये हैं और उन्हें सार्वजनिक होना चाहिए। लेकिन घरेलू राजनीति यहां निर्णायक भूमिका निभा सकती है। पूरी फाइलें जारी करने से कई प्रभावशाली लोगों के नाम और संदर्भ खुल सकते हैं, जिसका राजनीतिक असर व्यापक होगा। ऐसे में संभावना यही दिखती है कि पारदर्शिता और राजनीतिक नुकसान के बीच संतुलन साधने की कोशिश चलेगी। ट्रंप फिलहाल सीधे आरोपों से बचे दिखते हैं, पर अधूरी जानकारी और रोके गये दस्तावेज यह बहस जिंदा रखेंगे कि क्या सच का पूरा हिस्सा अभी सामने आना बाकी है।
इन सबके बीच तरह तरह की कहानियां भी चल पड़ी हैं। कुछ लोग हर नाम को अपराध का प्रमाण मान रहे हैं, तो कुछ इसे बड़ी साजिश बताकर प्रचारित कर रहे हैं। स्पष्ट है कि एपस्टीन प्रकरण ने सत्ता, धन और प्रभाव के रिश्तों पर सवाल जरूर खड़े किये हैं, पर हर नाम को दोषी ठहराना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
देखा जाये तो एपस्टीन प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कागजातों में संदर्भ मात्र को भी अपराध की मुहर की तरह पेश किया जा रहा है। यह प्रवृत्ति न्याय और विवेक दोनों के लिए खतरा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर जो शोर मचाया गया, वह इसी राजनीति का उदाहरण लगता है। एक दोषी व्यक्ति के निजी संदेशों में कही गयी शेखी को ऐसे उछाला गया मानो वही अंतिम सत्य हो। यह पूछने की जरूरत किसी ने नहीं समझी कि क्या कोई आधिकारिक प्रमाण है, क्या कोई जांच है, क्या कोई आरोप पत्र है। केवल नाम जोड़कर बदनाम करने की कोशिश हुई।
यह मानना भोला पन होगा कि वैश्विक राजनीति में छवि खराब करने के खेल नहीं होते। जब कोई नेता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होता है, स्वतंत्र रुख अपनाता है, तब उसके खिलाफ कथा गढ़ना कुछ लोगों के लिए उपयोगी बन जाता है। मोदी की विदेश नीति, इजराइल से बढ़ते संबंध, रक्षा खरीद और सामरिक फैसले कई ताकतों को असहज करते रहे हैं। ऐसे में एपस्टीन जैसे कुख्यात व्यक्ति के कागजात में उनका नाम संदर्भ में दिखना कुछ लोगों को अवसर जैसा लगा।
पर सवाल यह है कि क्या हम किसी भी अपराधी की बात को बिना जांच परख के सच मान लेंगे? अगर ऐसा है तो कल कोई भी अपराधी किसी का भी नाम लेकर कहानी बना देगा और हम उसे सुर्खियां बना देंगे। यह न पत्रकारिता है, न लोकतंत्र के लिए स्वस्थ रवैया। विपक्ष का काम सवाल पूछना है, पर सवाल और आरोप में फर्क होता है। जब बिना प्रमाण केवल राजनीतिक लाभ के लिए माहौल बनाया जाता है तो जनता के असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। महंगाई, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य पर बहस कम और सनसनी पर बहस ज्यादा होने लगती है।
बहरहाल, एपस्टीन कांड से असली सीख यह होनी चाहिए कि सत्ता और धन के मेल पर कड़ी निगरानी जरूरी है, कानून सब पर समान रूप से लागू होना चाहिए और पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए। पर अगर हम इसे केवल कीचड़ उछालने का औजार बना दें तो न सच सामने आयेगा न न्याय मिलेगा। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, पर जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। वरना सच शोर में दब जाता है और झूठ बार बार दोहराकर सच जैसा बना दिया जाता है। अगर हम हर सनसनी पर बह जाएं तो कल कोई भी कहानी हमारे विवेक को बंधक बना लेगी। इसलिए जरूरी है कि हम नाम नहीं, प्रमाण देखें; आरोप नहीं, सत्य खोजें। तभी न्याय भी बचेगा और लोकतंत्र भी।
-नीरज कुमार दुबे
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