प्लेग का खौफ बनाम हकीकत: रूस की घटना से फिक्र करने की कितनी जरूरत?
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर (आईएएनएस)। रूस के साइबेरिया में एक एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की महिला कर्मचारी की मौत ने लोगों को डरा दिया है। उसकी मौत के बाद करीब 200 लोगों पर पैनी नजर रखी जा रही है। दुनिया का ध्यान एक बार फिर उस बीमारी की ओर गया है, जिसे सदियों पहले ‘ब्लैक डेथ’ के नाम से जाना जाता था। सोशल मीडिया पर प्लेग फैलने और लैब से संक्रमण बाहर निकलने जैसी आशंकाओं ने चिंता बढ़ाई है। लेकिन मौजूदा वैज्ञानिक और आधिकारिक जानकारी की तस्वीर इससे कहीं अलग है। अमेरिका की ओर से भी कुछ सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि रूस में इस समय किसी बड़े प्लेग प्रकोप की पुष्टि नहीं हुई है। 28 वर्षीय लैब कर्मचारी की मौत निमोनिया से हुई, लेकिन उसके कारण का अभी पता नहीं चला है। रूसी स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, जांच में ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं कि महिला के साथ लैब टेस्टिंग के दौरान प्लेग बैक्टीरिया से संबंधित कोई हादसा हुआ था। महिला जिस इरकुत्स्क एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम करती थी, वहां संक्रमण से जुड़े किसी नए मामले की भी पुष्टि नहीं हुई है।
फिर करीब 200 लोगों को निगरानी में क्यों रखा गया? रॉयटर्स के अनुसार, इसका कारण बीमारी की पुष्टि से ज्यादा सावधानी है। महिला के संपर्क में आए लोगों की पहचान कर उन्हें मेडिकल निगरानी में रखा गया है। अस्पताल के कुछ हिस्सों को भी अलग किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है। संपर्क में आए कुछ लोगों में कोविड-19 और राइनोवायरस संक्रमण मिला है, लेकिन अब तक प्लेग का कोई नया मामला सामने नहीं आया है।
इसके बावजूद यह घटना गंभीरता से क्यों ली जा रही है? इसकी वजह खुद प्लेग की प्रकृति है।
विश्व स्वास्थय संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, प्लेग येरसिनिया पेस्टिस नाम के बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है। यह बैक्टीरिया आमतौर पर छोटे जंगली स्तनधारियों और उनके पिस्सुओं में पाया जाता है। संक्रमित पिस्सू के काटने, संक्रमित ऊतक या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क और कुछ परिस्थितियों में संक्रमित व्यक्ति से निकलने वाले सांस के कणों के जरिए इंसान संक्रमित हो सकता है।
यही वह बिंदु है जहां ‘प्लेग’ शब्द सुनकर पैदा होने वाला डर और आज की वास्तविकता अलग-अलग हो जाती है।
प्लेग आज भी गंभीर बीमारी है, लेकिन यह वह बीमारी नहीं है जिसका इलाज मध्ययुगीन यूरोप में उपलब्ध नहीं था। आज इसके लिए प्रभावी एंटीबायोटिक दवाएं मौजूद हैं। समस्या यह है कि बीमारी का पता देर से चलने पर यह बहुत तेजी से जानलेवा हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खासकर फेफड़ों को प्रभावित करने वाला न्यूमोनिक प्लेग बेहद गंभीर रूप है और इलाज नहीं मिलने पर तेजी से जानलेवा हो सकता है। लेकिन समय रहते पहचान और उपचार मिलने पर मरीज के बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
प्लेग के तीन प्रमुख रूप माने जाते हैं—ब्यूबोनिक, सेप्टीसीमिक और न्यूमोनिक। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इनमें ब्यूबोनिक प्लेग सबसे आम है और आम तौर पर संक्रमित पिस्सू के काटने से होता है। न्यूमोनिक प्लेग फेफड़ों को प्रभावित करता है और यही वह रूप है जिसमें व्यक्ति से व्यक्ति संक्रमण फैलने की आशंका सबसे ज्यादा होती है।
रूस के साइबेरिया का संदर्भ भी महत्वपूर्ण है। यहां प्लेग का प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जंगली जानवरों और पिस्सुओं की आबादी में येरसिनिया पेस्टिस मौजूद रह सकता है। यानी प्लेग दुनिया से गायब नहीं हुआ है, बल्कि कुछ इलाकों में प्रकृति के भीतर मौजूद है और कभी-कभार इंसानों तक पहुंच सकता है। हालांकि, रूस में मानव संक्रमण दुर्लभ है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की 29 सितंबर की रिपोर्ट भी बताती है कि 2019 से 2025 के बीच 10 देशों ने मानव प्लेग के संदिग्ध मामले रिपोर्ट किए और इनमें से छह देशों में संक्रमण की पुष्टि हुई। इस अवधि में कुल 3,847 संदिग्ध मामले और 423 मौतें दर्ज की गईं। ज्यादातर मामले कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और मेडागास्कर से आए, जहां प्लेग कुछ इलाकों में स्थानिक बना हुआ है।
इससे एक बात साफ होती है—प्लेग इतिहास की किताबों में बंद बीमारी नहीं है, लेकिन यह भी सही नहीं है कि इसका कोई एक संदिग्ध मामला अपने आप वैश्विक महामारी का संकेत है।
रूस की मौजूदा घटना में सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब यह है कि मृत महिला को आखिर कौन-सा संक्रमण हुआ था। इसकी पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जांच जरूरी है। जब तक येरसिनिया पेस्टिस की मौजूदगी साबित नहीं होती, तब तक इसे प्लेग का पुष्ट मामला कहना जल्दबाजी होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उपलब्ध जानकारी के आधार पर आम आबादी के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम को फिलहाल कम बताया है।
लैब दुर्घटना की आशंका ने भी इस मामले को और संवेदनशील बना दिया है। सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि महिला ने प्लेग बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब गिरा दी थी। लेकिन रूसी स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि उन्हें रोगजनकों को संभालने के दौरान ऐसी किसी दुर्घटना का प्रमाण नहीं मिला है। इसलिए फिलहाल ‘लैब लीक’ को तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।
--आईएएनएस
केआर/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
सरकार एटीएफ की कीमतों को लेकर एयरलाइंस और तेल कंपनियों से कर रही बातचीत: राम मोहन नायडू
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर (आईएएनएस)। केंद्रीय नागर विमानन मंत्री राम मोहन नायडू ने मंगलवार को कहा कि सरकार एयरलाइन और तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) से एविएशन टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) की लागत को लेकर बातचीत कर रही है, जिसमें पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेजी से वृद्धि हुई है।
केंद्रीय मंत्री का यह बयान इंडिगो के उस कदम के बाद आया है, जिसमें एटीएफ की बढ़ी हुई कीमतों के कारण एयरलाइन ने फ्यूल सरचार्ज में इजाफा करने का ऐलान किया है।
केंद्रीय मंत्री ने राष्ट्रीय राजधानी में आईएफक्यूएम सिम्पोजियम 2026 कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों से कहा, सबसे अहम मुद्दों में से एक पश्चिम एशिया का संकट है और यह कैसे एटीएफ की कीमतों पर भारी बोझ डाल रहा है, लेकिन हम अभी भी एयरलाइंस और ओएमसी, दोनों के साथ बातचीत कर रहे हैं। देखते हैं कि बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ती है।
केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि इस मामले पर कोई भी फैसला लेने से पहले नागर विमानन मंत्रालय सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करेगा।
उन्होंने कहा, मंत्रालय संबंधित पक्षों के साथ बैठक करने जा रहा है और जब हम सभी संबंधित पक्षों का नजरिया समझ लेंगे, तब हम कोई फैसला लेंगे।
कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए, नायडू ने एविएशन सेक्टर के लिए सरकार के लंबे समय के विजन के बारे में बताया। इसमें सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (एसएएफ) को बढ़ावा देना, कई एयरपोर्ट हब बनाना और घरेलू एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को मजबूत करना शामिल है।
उन्होंने कहा कि भारत ने नियम बनाया है कि इंटरनेशनल उड़ानों में इस्तेमाल होने वाले फ्यूल का 1 प्रतिशत हिस्सा 2027 तक एसएएफ से आना चाहिए, जो 2028 तक 2 प्रतिशत और 2030 तक 5 प्रतिशत हो जाएगा।
इसके अलावा, सरकार सरकारी रिफाइनरियों इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (एचपीसीएल) के साथ ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के मुताबिक एसएएफ बनाने पर बातचीत कर रही है।
उनके मुताबिक, भारत का लक्ष्य देश भर में कई एयरपोर्ट हब बनाकर ग्लोबल एविएशन हब बनना है। साथ ही, हब-एंड-स्पोक मॉडल अपनाया जाएगा, जिससे छोटे शहरों के यात्री घरेलू गेटवे के जरिए लंबी दूरी की इंटरनेशनल उड़ानों से जुड़ सकेंगे।
एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरिंग पर मंत्री ने इवेंट में कहा कि भारत इंजन बनाने को एक अहम क्षमता मानता है और इसके लिए चरणबद्ध तरीके से काम कर रहा है, जिसकी शुरुआत मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (एमआरओ) गतिविधियों और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग से होगी।
उन्होंने स्वदेशी हेलीकॉप्टर इंजन बनाने में हुई प्रगति का जिक्र किया और कहा कि डिफेंस सेक्टर में हासिल की गई जानकारी और तकनीक आगे चलकर सिविल एविएशन मैन्युफैक्चरिंग के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद कर सकती है।
--आईएएनएस
एबीएस
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