Indira Ekadashi Vrat Katha: इंदिरा एकादशी व्रत से राजा इंद्रसेन के पितरों को मिली थी मुक्ति, पढ़ें व्रत कथा
Indira Ekadashi Vrat Katha: आज यानी 6 अक्टूबर 2026 को इंदिरा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. यह एकादशी पितृ पक्ष में पड़ती है, इसलिए इसे पितरों को मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी भी कहा जाता है. पितरों की आत्मा को तृप्ति होकी है बल्कि व्रतियों को भी सभी पापों से मुक्ति मिलती है. इस एकादशी पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से साधक को मनचाहा वरदान मिलता है. अगर आपने भी इंदिरा एकादशी का व्रत रखा है तो इस दिन ये पावन कथा जरूर पढ़ें.
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
राजा इन्द्रसेन के पिता की यमलोक से मुक्ति की कथा....
भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति से भाव विह्वल होकर कुंतीपुत्र अर्जुन कहते हैं- हे प्रभु! अब आप कृपा कर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा बतलाइए. इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसका व्रत करने से कौन-सा फल प्राप्त होता है? कृपा कर विधानपूर्वक वर्णन कीजिये.
ये भी पढ़ें- Shardiya Navratri 2026: 9 दिन, 9 देवियां और 9 रंग... जानें शारदीय नवरात्रि के हर दिन का महत्व
श्रीकृष्ण ने सुनाया वृतान्त
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा- हे धनुर्धर! आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है. इस एकादशी का व्रत करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. नरक में गए हुए पितरों का उद्धार होता है. हे अर्जुन! इस एकादशी की कथा के श्रवण मात्र से ही मनुष्य को अनंत फल की प्राप्ति होती है. मैं यह कथा सुनाता हूं, तुम ध्यानपूर्वक श्रवण करो.
राजा इन्द्रसेन ने किया व्रत
सतयुग में महिष्मती नाम की नगरी में इन्द्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था. वह पुत्र, पौत्र, धन-धान्य आदि से संपूर्ण था. उसके शत्रु सदैव उससे भयभीत रहते थे. एक दिन राजा अपनी राज्य सभा में सुखपूर्वक बैठा था कि महर्षि नारद वहां पधारे. नारदजी को देखकर राजा आसन से उठे और प्रणाम करके उन्हें आदर सहित आसन दिया. तब महर्षि नारद ने कहा- हे राजन्! आपके राज्य में सब कुशल से तो हैं? मैं आपकी धर्मपरायणता देखकर अत्यंत प्रसन्न हूं.
राजा ने कहा- हे देवऋषि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुछ कुशलपूर्वक हैं तथा आपकी कृपा से मेरे सभी यज्ञ कर्म आदि सफल हो गए हैं. हे महर्षि! अब आप कृपा कर यह बताए कि आपका यहां आगमन किस प्रयोजन से हुआ है? मैं आपकी क्या सेवा करू?
महर्षि नारद ने दिया राजा को पिता का संदेश
महर्षि नारद ने कहा- हे राजन! मुझे एक अचंभा हो रहा है कि एक बार जब मैं ब्रह्मलोक से यमलोक गया था, तब मैंने यमराज की सभा में तुम्हारे पिता को बैठे देखा. तुम्हारे पिता महान ज्ञानी, दानी तथा धर्मात्मा थे, किंतु एकादशी व्रत के भंग हो जाने के कारण वह यमलोक को गए हैं. तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए एक संदेश भेजा है.
राजा ने उत्सुकता से पूछा- क्या संदेश है महर्षि? कृपा कर शीघ्र बताए
राजन् तुम्हारे पिता ने कहा है- महर्षि! आप मेरे पुत्र इन्द्रसेन, जो कि महिष्मती नगरी का राजा है. उसके पास जाकर एक संदेश देने की कृपा करें कि मेरे किसी पूर्व जन्म के पाप कर्म के कारण ही मुझे यह लोक मिला है. अगर मेरा पुत्र आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत करे तथा उस व्रत के फल को मुझे प्रदान कर दे, तो मेरी मुक्ति हो जाएगी. मैं भी इस लोक से मुक्त होकर स्वर्गलोक में वास कर सकूंगा.
राजा इन्द्रसेन को हुआ दुख
राजा इन्द्रसेन को अपने पिता के यमलोक में पड़े होने की बात सुनकर अत्यंत दुख हुआ तथा उसने नारदजी से कहा- हे नारदजी! यह तो बड़े दुख का समाचार है कि मेरे पिता यमलोक में हैं. मैं उनकी मुक्ति का उपाय अवश्य करूंगा. आप मुझे इंदिरा एकादशी व्रत का विधान बताने की कृपा करें.
नारद जी ने राजा को बताया इंदिरा एकादशी का विधान
नारदजी ने कहा- "हे राजन्! आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन आपको प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक स्नान करना चाहिए. तदुपरान्त मध्याह्नकाल में भी स्नान करना चाहिए. उस समय जल से स्नान कर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें तथा उस दिन एक समय का भोजन करें. रात्रि को भूमि पर शयन करें. इसके दूसरे दिन अर्थात् एकादशी के दिन नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि के उपरान्त भक्तिपूर्वक व्रत का पालन करें तथा इस प्रकार संकल्प करें- मैं आज निराहार रहूंगा एवं सभी प्रकार के भोगों का त्याग कर दूंगा. तदुपरान्त अगले दिन भोजन करूंगा. हे ईश्वर! आप मेरी रक्षा करने वाले हैं. आप मेरे उपवास को सम्पूर्ण कराइए.
इस प्रकार आचरण करके मध्याह्नकाल में भगवान शालिग्राम की प्रतिमा को स्थापित करें तथा ब्राह्मण को बुलाकर भोजन करवाएं एवं उन्हें दक्षिणा दें. भोजन का कुछ अंश गाय को जरूर दें. भगवान विष्णु का धूप, नैवेद्य आदि से पूजन करें तथा रात्रि में जागरण करें. इसके बाद द्वादशी के दिन मौन रहकर बन्धु-बान्धवों सहित भोजन करें. हे राजन्! यह इंदिरा एकादशी के व्रत की विधि है. यदि तुम आलस्य त्यागकर इस एकादशी के व्रत को करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्ग के अधिकारी बन जायेंगे.
राजा ने किया विधि-विधान से व्रत
नारदजी राजा को सब विधान समझाकर लुप्त हो गए. राजा ने इंदिरा एकादशी के आने पर उसका विधानपूर्वक व्रत किया. बन्धु-बान्धवों समेत इस व्रत को करने पर आकाश से पुष्पों की वर्षा हुई तथा राजा के पिता यमलोक से रथ पर चढ़कर स्वर्ग को चले गए. इस एकादशी के प्रभाव से राजा इन्द्रसेन भी इहलोक में सुख भोगकर अन्त में स्वर्गलोक को गए.
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- "हे सखा! यह मैंने तुम्हारे सामने इंदिरा एकादशी के माहात्म्य का वर्णन किया है. इस कथा के पाठ एवं श्रवण मात्र से ही समस्त पापों का शमन हो जाता है तथा अन्त में मनुष्य स्वर्गलोक का अधिकारी बनता है.
व्रत कथा का सार
इंदिरा एकादशी की व्रत कथा का सार है मनुष्य जो भी प्रण करे, उसे चाहिए कि वह उसको तन-मन-धन से पूर्ण करे, किसी भी कार्य का प्रण करके उसे तोड़ना नहीं चाहिए.
ये भी पढ़ें- Indira Ekadashi 2026: आज रखा जा रहा इंदिरा एकादशी का व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पारण की टाइमिंग
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
बच्चे को किस उम्र में क्या खिलाएं? डाइटिशियन ने बताया 6 महीने से 1 साल तक का डाइट चार्ट
बच्चे को किस उम्र में क्या खिलाना चाहिए, इसे लेकर माता-पिता अक्सर असमंजस में रहते हैं. अंबाला नागरिक अस्पताल की डाइटिशियन रेनू बाला के मुताबिक 6 महीने तक बच्चे के लिए मां का दूध सबसे अहम है. इसके बाद धीरे-धीरे पूरक आहार शुरू किया जा सकता है. 8-9 महीने में रोटी और दलिया, जबकि एक साल बाद घर का सामान्य खाना देने की आदत डाली जा सकती है.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation
News18







