मूवी रिव्यू-‘दृश्यम 3’:2 अक्टूबर का राज सब जानते हैं, असली खेल अब 23 जुलाई का, अजय देवगन की विजय वाली बाजी इस बार कितनी भारी पड़ी?
2 अक्टूबर का सच ‘दृश्यम’ के हर फैन को पता है। पाव भाजी, सत्संग, फिल्म और फिर विजय सलगांवकर का वो खेल, जिसने पुलिस को सालों तक उलझाए रखा, लेकिन इस बार कहानी सिर्फ 2 अक्टूबर पर नहीं रुकी है। अब एक और तारीख सामने है- 23 जुलाई। आखिर उस दिन विजय कहां था? क्या हुआ था? और क्या इस तारीख के जरिए पुलिस विजय की बनाई पूरी कहानी को पलट सकती है? यहीं से फिल्म अपना असली खेल शुरू करती है। सामने हैं पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर, जिनके पास सवाल भी हैं और विजय को घेरने का इरादा भी। दूसरी तरफ विजय है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग है। फिल्म कई बार आपको यकीन दिलाती है कि इस बार विजय फंस गया। फिर विजय चुप हो जाता है। आप सोचने लगते हैं कि उसके दिमाग में आखिर क्या चल रहा है? यही फिल्म का मजा है। हालांकि हर चाल उतनी दमदार नहीं है और कुछ जगह कहानी थोड़ी आसान लगती है। फिल्म की कहानी कैसी है सलगांवकर परिवार अपनी पुरानी जिंदगी में लौटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सैम देशमुख की मौत का दर्द मीरा देशमुख के अंदर अब भी जिंदा है। मीरा और महेश देशमुख के लिए मामला खत्म नहीं हुआ। केस दोबारा खुलता है और पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर की एंट्री होती है। राजवीर पुराने सबूतों को नए नजरिए से देखता है। विजय सलगांवकर फिर पुलिस की नजर में आ जाता है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि विजय ने 2 अक्टूबर को क्या किया था। सवाल यह भी है कि 23 जुलाई को विजय कहां था और इस तारीख का पुराने केस से क्या संबंध है? वकील इंद्रजीत शेट्टी भी इस खेल में उतरते हैं। इंस्पेक्टर गायतोंडे अपने पुराने अंदाज में केस को थोड़ा हल्का रखते हैं। इसके बाद शुरू होती है विजय और राजवीर की दिमागी टक्कर। एक तरफ कानून है। दूसरी तरफ विजय है, जो कानून की किताबें नहीं पढ़ता, लेकिन कानून को अपने हिसाब से घुमाना जानता है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर है। अजय देवगन का विजय अब सिर्फ एक किरदार नहीं रहा। चेहरे पर ज्यादा हलचल नहीं है। आवाज में भी ज्यादा बदलाव नहीं है, लेकिन उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं। आप विजय को देखते हैं और सोचते हैं कि आखिर वह इतना शांत क्यों है? यही शांति कहानी का रोमांच बढ़ाती है। दूसरी तरफ जयदीप अहलावत हैं। राजवीर के रूप में उनका अंदाज शांत है। वह धीरे-धीरे विजय के करीब आते हैं। यही उनका सबसे बड़ा हथियार है। शुरुआत में दोनों की टक्कर फिल्म को बांधे रखती है। कुछ जगह फिल्म धीमी पड़ती है, लेकिन अजय और जयदीप के आमने-सामने आते ही रोमांच फिर बढ़ जाता है। प्रकाश राज भी अपने किरदार में शानदार हैं। उनके डायलॉग्स और अंदाज कोर्ट के सीन को मजबूत बनाते हैं। श्रेया सरन को इस बार पहले दोनों हिस्सों के मुकाबले कम जगह मिली है। हालांकि, उनके इमोशनल सीन असर छोड़ते हैं। तब्बू और रजत कपूर अपने बेटे को खोने का दर्द लेकर लौटे हैं। दोनों के किरदारों में बेचैनी साफ नजर आती है। फिर आते हैं गायतोंडे। सीरियस कहानी के बीच यह किरदार हंसी का मौका देता है। 2 अक्टूबर के मीम्स, पाव भाजी और अपनी पुलिसिया परेशानियों के साथ गायतोंडे फिल्म का तनाव हल्का करते हैं। फिल्म का डायरेक्शन कैसा है? अभिषेक पाठक की अच्छी बात यह है कि उन्होंने तीसरे हिस्से को पहले दो हिस्सों की नकल नहीं बनाया। कहानी में नए सवाल जोड़े गए हैं। इनमें 23 जुलाई वाली कड़ी सबसे दिलचस्प है। फिल्म जल्दी कहानी में उतर जाती है। ज्यादा समय यह बताने में नहीं लगाया गया कि कौन कौन है। दर्शक पहले से विजय की दुनिया जानता है। इसलिए फिल्म सीधे खेल शुरू करती है। लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है। विजय और उसके परिवार के बीच का इमोशनल रिश्ता पहले दो हिस्सों में ज्यादा मजबूत था। इस बार कहानी ज्यादा इस बात पर टिकी है कि विजय अगली चाल क्या चलेगा। रोमांच बढ़ा है। परिवार वाला भाव थोड़ा कम हुआ है। फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले कैसा है स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी ताकत यह है कि फिल्म जवाब देने के बजाय लगातार नए सवाल खड़े करती है। 23 जुलाई क्या है? राजवीर के पास ऐसा क्या है, जिससे विजय परेशान है? विजय इतना शांत क्यों है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या इस बार उसकी कोई चाल काम नहीं करेगी? यही सवाल आपको आगे ले जाते हैं। इंटरवल के आसपास फिल्म अच्छी पकड़ बनाती है। दूसरे हिस्से में विजय की योजना सामने आने लगती है। लेकिन कुछ मोड़ ऐसे हैं, जहां आपको लगेगा- यह इतनी आसानी से कैसे हो गया? पहले दो हिस्सों में विजय की योजनाएं बहुत मजबूत लगती थीं। इस बार कुछ जगह कहानी को आगे बढ़ाने के लिए आसान रास्ता लिया गया है। फिल्म का तकनीकी पक्ष कैसा है गोवा इस बार भी कहानी का हिस्सा लगता है। यह सिर्फ खूबसूरत जगह दिखाने के लिए नहीं है। कैमरे का काम रोमांच वाला माहौल बनाए रखता है। फिल्म की कटिंग भी ज्यादातर जगह तेज है। ढाई घंटे की फिल्म होने के बावजूद यह बेवजह लंबी नहीं लगती। हालांकि बीच के कुछ सीन और छोटे किए जा सकते थे। फिल्म का म्यूजिक कैसा है फिल्म में गानों की जरूरत कम है। अच्छी बात है कि कहानी पर गानों का बोझ नहीं डाला गया। अमर मोहिले का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की बड़ी ताकत है। जैसे-जैसे विजय की योजनाएं सामने आती हैं, संगीत रोमांच बढ़ाता है। कई सीन में आपको पता होता है कि कुछ होने वाला है। फिर भी संगीत बेचैनी बढ़ा देता है। ‘मुस्कुरा दो’ भावनात्मक हिस्सों को सहारा देता है। लेकिन फिल्म की असली ताकत बैकग्राउंड म्यूजिक ही है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘दृश्यम द कॉन्क्लूजन’ में कई शानदार रोमांचक पल हैं। हालांकि हर जगह पहले दोनों हिस्सों जैसा असर नहीं बन पाता। अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। गायतोंडे तनाव के बीच हंसी देते हैं। अमर मोहिले का पार्श्व संगीत माहौल बनाए रखता है। बीच में रफ्तार थोड़ी गिरती है। कुछ योजनाएं जरूरत से ज्यादा आसान लगती हैं, लेकिन 23 जुलाई का सवाल और विजय के दिमाग में चल रहा खेल इतना मजबूत है कि आखिरी मिनट तक नजर स्क्रीन से हटती नहीं।
इंडिया-A ने ऑस्ट्रेलिया-A के खिलाफ दूसरा टेस्ट ड्रॉ कराया:यश राठौड़ ने 80 रन बनाए, तुषार की फिफ्टी; सीरीज 1-0 से भारत ने जीती
भारत-A ने पुडुचेरी में ऑस्ट्रेलिया-A के खिलाफ दूसरा अनऑफिशियल टेस्ट ड्रॉ करा लिया। 365 रन का पीछा करते हुए भारत-A ने 9 विकेट पर 310 रन बनाए। टीम जीत से 55 रन दूर रह गई, जबकि एक समय उसके सामने मैच बचाने की चुनौती थी। इस नतीजे के साथ भारत-A ने दो मैचों की सीरीज 1-0 से अपने नाम की। पहले अनऑफिशियल टेस्ट में भारत-A ने ऑस्ट्रेलिया-A को 162 रन से हराया था। भारत-A पहली पारी में 167 रन पर ऑलआउट हो गई थी। ऑस्ट्रेलिया-A ने पहली पारी में 358 रन बनाने के बाद दूसरी पारी 4 विकेट पर 173 रन बनाकर घोषित की थी। नाइटवॉचमैन बने तुषार ने 52 रन बनाए दिन की शुरुआत आयुष पांडे और तुषार देशपांडे ने की। लियम स्कॉट ने पांडे को LBW कर भारत-A को झटका दिया। इसके बाद नंबर-3 पर नाइटवॉचमैन के तौर पर उतरे तुषार ने कप्तान देवदत्त पडिक्कल के साथ पारी संभाली। तुषार ने 119 गेंदों का सामना करते हुए 52 रन बनाए और करीब 180 मिनट क्रीज पर बिताए। उन्होंने अपना दूसरा फर्स्ट-क्लास अर्धशतक लगाया। पडिक्कल 26 रन बनाकर स्कॉट की गेंद पर विकेटकीपर जॉश फिलिप के हाथों कैच हुए। इसके कुछ देर बाद लियम हैचर की धीमी पड़ती गेंद पर तुषार भी लॉन्ग-ऑफ पर कैच दे बैठे। रशीद ने तेज बल्लेबाजी कर जीत की उम्मीद जगाई शेख रशीद ने 45 गेंदों पर 38 रन की तेज पारी खेली। उन्होंने 8 चौके लगाए और कुछ समय के लिए भारत-A की जीत की उम्मीद जगा दी। हालांकि नाथन मैकस्वीनी की गेंद पर वह पीछे हटकर शॉट खेलने गए और LBW हो गए। इसके बाद कुमार कुशाग्र भी ज्यादा देर नहीं टिक सके। स्कॉट की गेंद इतनी नीची रही कि वह लगभग जमीन से गुजरते हुए स्टंप्स से जा टकराई। तनुश कोटियान भी कोरी रोचिचियोली की गेंद पर आउट हो गए। भारत-A का स्कोर 7 विकेट पर 199 रन हो चुका था। राठौड़ और मुलानी ने 216 गेंदों तक संभाला यहीं से यश राठौड़ और प्लेयर ऑफ द सीरीज शम्स मुलानी ने पारी को संभाला। मुलानी ने एक छोर पर डिफेंस मजबूत रखा, जबकि राठौड़ ने रन बनाने के मौके तलाशते रहे। दोनों ने 216 गेंदों पर 85 रन की साझेदारी की। राठौड़ ने दबाव के बावजूद आक्रामक रुख बनाए रखा। उन्होंने कभी क्रीज से बाहर निकलकर गेंद को खेला तो कभी क्रीज की गहराई का इस्तेमाल किया। मुलानी ने 131 गेंदों का सामना कर ऑस्ट्रेलिया-A के गेंदबाजों को लंबे समय तक परेशान किया। स्कॉट ने फिर पलटा मैच जब लगने लगा कि राठौड़ और मुलानी भारत-A को आसानी से ड्रॉ तक पहुंचा देंगे, तभी लियम स्कॉट ने फिर मैच में रोमांच पैदा कर दिया। उन्होंने राठौड़ को 80 रन पर LBW किया। राठौड़ ने रिव्यू लिया और गेंद की ऊंचाई को लेकर सवाल उठाया, लेकिन बॉल ट्रैकिंग में अंपायर्स कॉल आया। इसके दो ओवर बाद स्कॉट ने मुलानी को भी आउट कर दिया। भारत-A 9 विकेट गंवा चुका था और जीत के लिए 55 रन अभी बाकी थे। आखिरी विकेट ने बचाया मैच अंशुल कंबोज को सीनियर टीम में बुलाए जाने के कारण भारत-A को अपने नंबर-11 प्रफुल हिंगे को बल्लेबाजी के लिए भेजना पड़ा। हिंगे ने 6 गेंदें खेलीं। उनके साथ नचिकेत भुटे ने 21 गेंदों का सामना किया। दोनों ने ऑस्ट्रेलिया-A को आखिरी विकेट लेने का मौका नहीं दिया और खराब होती रोशनी के बीच दोनों टीमों ने मैच ड्रॉ पर खत्म करने पर सहमति जताई।
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