अंकित बालियान हत्याकांड: Muzaffarnagar में तीन फरार आरोपियों की संपत्ति अदालत के आदेश पर कुर्क
मुजफ्फरनगर (उप्र), पांच अक्टूबर हरियाणवी गायक एवं यूट्यूबर अंकित बालियान की हत्या के मामले में तीन फरार आरोपियों की संपत्ति अदालत के आदेश पर कुर्क कर ली गई है। पुलिस के एक अधिकारी ने सोमवार को यह जानकारी दी। पुलिस अधीक्षक एन.पी. सिंह ने संवाददाताओं को बताया कि अंकित बालियान की हत्या के मामले में तीन फरार आरोपियों राहुल उर्फ भोलू शाहपुरी, आर्यन संधू और सत्यम कादियान की संपत्ति रविवार को कुर्क कर ली गई।
उन्होंने बताया कि इन तीनों आरोपियों पर एक-एक लाख रुपये का इनाम है और पुलिस उनकी तलाश कर रही है। बालियान की 26 अगस्त, 2026 को शामली में जिम से अपनी कार की ओर आते समय अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। गत 31 अगस्त को शामली जिले में पुलिस के साथ मुठभेड़ में दो शूटर, मोहित और सुमित मारे गए थे।
एक और आरोपी रोहित को गत 30 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस बाकी आरोपियों की तलाश कर रही है।
क्या सुप्रीम कोर्ट CEC ज्ञानेश कुमार को पद से हटाएगी? आज की सुनवाई पर टिकी निगाहें
Supreme Court CEC SIR Hearing: देश की शीर्ष अदालत में आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम संस्थाओं में से एक चुनाव आयोग से जुड़े बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट में आज यानी 5 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तौर-तरीकों और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के नियमन से संबंधित दो अलग-अलग याचिकाओं पर विचार किया जाएगा. इस मामले में दायर याचिकाओं में चुनाव आयोग के शीर्ष स्तर पर मनमाने तरीके से काम करने का गंभीर आरोप लगाया गया है.
साथ ही अदालत से इस पूरे प्रकरण की गहराई से पड़ताल करने के लिए एक विशेष जांच दल यानी SIT गठित करने की अपील भी की गई है. दूसरी याचिका में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए उसे पूरी तरह से गैर-कानूनी घोषित करने की मांग रखी गई है. इस बेहद अहम और संवेदनशील कानूनी मामले की सुनवाई देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष तीन सदस्यीय पीठ करने जा रही है.
याचिका में उठाए गए सवाल और आयोग के भीतर का मतभेद
पटना निवासी राकेश कुमार सिंह की ओर से अदालत के सामने पेश की गई याचिका में आयोग के अंदरूनी कामकाज को लेकर कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं. याचिका में कहा गया है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और बाकी दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी के बीच गंभीर मतभेद उभरकर सामने आए हैं. याचिकाकर्ता का तर्क है कि आयोग के भीतर अहम विषयों पर सहमति बनाने के बजाय अन्य आयुक्तों की आपत्तियों को अनदेखा किया जा रहा है.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324(1) का विशेष तौर पर हवाला देते हुए याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि देश में निष्पक्ष चुनाव कराने, मतदाता सूची की निगरानी करने और चुनावी तंत्र के संचालन का अधिकार किसी एक व्यक्ति या सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त के पास नहीं है. संविधान के तहत यह दायित्व पूरे बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग को सामूहिक रूप से सौंपा गया है, इसलिए फैसले भी सबकी सहमति और विचार-विमर्श से होने चाहिए.
अदालत से निलंबन और अंतरिम व्यवस्था की बड़ी मांग
अदालत में दायर इस अर्जी के जरिए सुप्रीम कोर्ट से कई कड़े और बड़े निर्देश देने की गुहार लगाई गई है. याचिकाकर्ता की सबसे बड़ी मांग यह है कि जब तक इस पूरे विवाद की अंतिम सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर कामकाज देखने और अपने पद पर बने रहने से रोका जाए. अर्जी में कहा गया है कि मामले के निपटारे तक चुनाव आयोग के रोजमर्रा के सभी काम और महत्वपूर्ण निर्णय बाकी दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की आपसी सहमति और तालमेल से चलाए जाएं.
इसके अलावा, याचिका में यह भी सुझाव रखा गया है कि भविष्य में इस पद पर होने वाली नियुक्तियों के लिए एक पारदर्शी समिति की सलाह ली जाए, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश को अनिवार्य तौर पर शामिल किया जाए. याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा है कि आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप की गरिमा और निष्पक्षता को बचाने के लिए सुनवाई जारी रहने तक ज्ञानेश कुमार को पद से निलंबित कर दिया जाना बेहद जरूरी है.
आयोग की सफाई और याचिका में शामिल पक्षकार
अपने ऊपर उठ रहे तीखे सवालों और आलोचनाओं के बीच चुनाव आयोग ने भी इस विवाद पर अपनी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की है. आयोग का कहना है कि किसी भी लोकतांत्रिक और स्वतंत्र संस्था में गंभीर मुद्दों पर चर्चा के दौरान अधिकारियों के बीच अलग-अलग राय या दृष्टिकोण होना एक बहुत ही सामान्य बात है. आयोग ने साफ कहा है कि उसके द्वारा जारी किए गए हर आदेश और नियम को पूरी कानूनी मान्यता प्राप्त है. आयोग के सभी दिशा-निर्देश और निर्णय पूरी तरह से तय कानूनी प्रक्रियाओं और नियमों के अनुसार ही लिए जाते हैं, इसलिए इसमें किसी भी तरह की मनमानी का सवाल ही नहीं उठता है.
इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए याचिका में केंद्रीय कानून मंत्रालय, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और आयोग के वरिष्ठ अधिकारी मनीष गर्ग को पक्षकार बनाया गया है. वकील चांद कुरैशी के माध्यम से शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा पेश की गई इस याचिका में सीधे तौर पर आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा लिए गए कई कदम सामूहिक रूप से निर्णय लेने की स्थापित कानूनी परंपरा और नियमों का उल्लंघन करते हैं. अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी हैं कि अदालत आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली और एसआईटी जांच की मांग पर क्या दिशा-निर्देश जारी करती है.
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