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पाकिस्तान से नजदीकी बांग्लादेश को क्षेत्रीय अस्थिरता के जटिल जाल में फंसा रही है: रिपोर्ट

नई दिल्ली, 1 फरवरी (आईएएनएस)। किसी भी देश की विदेश नीति में स्वायत्तता उसे बाहरी दबाव से मुक्त होकर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता देती है, लेकिन बांग्लादेश द्वारा हाल के दिनों में पाकिस्तान के साथ तेजी से रिश्ते मजबूत करने के कदम इस स्वायत्तता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। यह बात एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में कही गई है।

यूरेशिया रिव्यू में प्रकाशित एक लेख में सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज के एसोसिएट फेलो आशु मान ने लिखा है कि पाकिस्तान से जुड़कर, जिसकी नीतियां क्षेत्रीय स्थिरता के खिलाफ मानी जाती हैं, बांग्लादेश स्वयं को एक ऐसे जाल में फंसा रहा है, जहां उसके फैसले अपने नागरिकों की जरूरतों के बजाय उसके अस्थिर साझेदार की स्थिति से प्रभावित होंगे।

आशु मान के अनुसार, “पाकिस्तान को गले लगाने का मतलब है बांग्लादेश का क्षेत्रीय अस्थिरता के चिपचिपे जाल में उलझ जाना, जिससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता बुनियादी रूप से कमजोर होती है। पाकिस्तान ऐसा देश है, जो या तो अपने भीतर संघर्षरत रहता है या अपने पड़ोसियों से टकराव में उलझा रहता है। उसकी अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय बेलआउट पर टिकी हुई है और उसकी सीमाएं उग्रवाद से प्रभावित हैं। आर्थिक संपर्क, तटस्थता और व्यापार पर आधारित स्वतंत्र नीति अपनाने के बजाय ढाका एक ऐसे सुरक्षा ढांचे का उपग्रह बनने का जोखिम उठा रहा है, जिसकी पहचान संघर्ष है।”

लेख में कहा गया है कि इस रिश्ते को संभालने, सहयोगी देशों को इसकी सफाई देने और इससे जुड़े जोखिमों पर नजर रखने में बांग्लादेश की कूटनीतिक ऊर्जा खर्च होगी, जबकि यह समय अन्य प्राथमिक क्षेत्रों पर ध्यान देने का होना चाहिए। इससे ऐसे समझौते करने पड़ सकते हैं, जो राष्ट्रीय हित में नहीं हैं, जैसे ऐसे विवादों में पक्ष लेना जिनका बंगाली जनता से कोई लेना-देना नहीं है।

लेख में आगे कहा गया है कि स्वायत्तता का अर्थ है स्थिरता, विकास और शांति को चुनने की आज़ादी। पाकिस्तान जैसे अस्थिर देश के साथ तालमेल स्वतंत्रता का प्रयोग नहीं, बल्कि उसे एक विफल राज्य की अराजकता के हवाले करना है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान-बांग्लादेश साझेदारी समान भागीदारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक भूल है, जो उन घावों को फिर से खोलती है, जो अब तक पूरी तरह भरे नहीं हैं। इससे जनता में अलगाव की भावना पैदा होती है और शासकों तथा आम लोगों के बीच खतरनाक दूरी बनती है। जिन लोगों की स्मृतियों में 1971 के मुक्ति संग्राम का पीढ़ीगत आघात आज भी जीवित है, वे इस फैसले को गहरे और स्वाभाविक संदेह के साथ देख रहे हैं।

लेख के अनुसार, यह अलगाव बांग्लादेश सरकार के आंतरिक जनादेश को कमजोर करता है, जिससे उसे बाहरी मान्यता पर अधिक निर्भर होना पड़ता है। जब सरकार अपने ही मतदाताओं का नैतिक विश्वास खो देती है, तो वह विदेशी मांगों को ‘ना’ कहने की क्षमता भी खो बैठती है और निर्णय दूसरों के हित में होने लगते हैं।

आशु मान ने लिखा कि पाकिस्तान के साथ संबंध गहराते हुए बांग्लादेश सरकार या तो अतीत के अत्याचारों को भूल गई है या अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए उन्हें नजरअंदाज कर रही है। यह रवैया 1971 के इतिहास, बलिदान और संघर्ष को एक सौदेबाजी की वस्तु में बदल देता है।

उन्होंने कहा, “यह एक खतरनाक मिसाल है, जो संकेत देती है कि यदि कीमत सही हो तो राष्ट्रीय गरिमा और शहीदों की स्मृति सहित सब कुछ बेचा जा सकता है। इससे नैतिक सीमाएं धुंधली हो जाती हैं और शासन के अन्य क्षेत्रों में भी लाल रेखाएं खींचना कठिन हो जाता है।”

लेख में यह भी कहा गया है कि ऑपरेशन सर्चलाइट के लिए पाकिस्तान से जवाबदेही की मांग न करना बांग्लादेश सरकार के आत्मसम्मान की कमी को दर्शाता है। इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश जाता है कि बांग्लादेश की स्मृति अल्पकालिक है और उसका रुख लचीला है, जिसका फायदा क्षेत्र के अन्य देश उठा सकते हैं।

--आईएएनएस

डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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