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एपस्टीन फाइल्स ईमेल में पीएम के नाम का जिक्र: भारत ने की कड़ी निंदा, बताया दोषी अपराधी की घटिया बातें

नई दिल्ली, 31 जनवरी (आईएएनएस)। भारत ने शुक्रवार को तथाकथित एपस्टीन फाइलों के एक ईमेल मैसेज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में किसी भी जिक्र की कड़ी निंदा की और इसे एक दोषी अपराधी की घटिया बातें बताया, जिन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देना चाहिए।

यह मामला तब सामने आया जब अमेरिकी न्याय विभाग ने फाइनेंसर जेफरी एपस्टीन की जांच से जुड़ी फाइलों का एक बड़ा बैच जारी किया, जिसमें तीन मिलियन से ज्यादा पन्नों के रिकॉर्ड, 2,000 वीडियो और 180,000 तस्वीरें शामिल थीं।

जेफरी एपस्टीन, एक अमीर अमेरिकी फाइनेंसर, की 2019 में न्यूयॉर्क की जेल में मौत हो गई थी, जब वह नाबालिग लड़कियों से जुड़े फेडरल सेक्स-ट्रैफिकिंग के आरोपों में मुकदमे का इंतजार कर रहा था। उसकी मौत को आधिकारिक तौर पर आत्महत्या बताया गया था।

विदेश मंत्रालय (एमईए) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शनिवार शाम को कुछ रिपोर्टों को साफ करने के लिए जारी एक बयान में कहा, हमने तथाकथित एपस्टीन फाइलों से एक ईमेल संदेश की रिपोर्ट देखी है जिसमें प्रधानमंत्री और उनकी इजरायल यात्रा का जिक्र है।

एमईए के बयान में आगे कहा गया, जुलाई 2017 में प्रधानमंत्री की इजरायल की आधिकारिक यात्रा के अलावा, ईमेल में बाकी बातें एक दोषी अपराधी की बकवास बातें हैं, जिन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देना चाहिए।

शुक्रवार को, अमेरिकी न्याय विभाग ने जेफरी एपस्टीन और घिसलेन मैक्सवेल की जांच और मुकदमों से जुड़े लाखों रिकॉर्ड जारी करना शुरू किया और कहा कि उसने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हस्ताक्षरित एक नए पारदर्शिता कानून के तहत आदेशित एक अभूतपूर्व समीक्षा पूरी कर ली है।

डिप्टी अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने पत्रकारों को बताया कि विभाग 19 नवंबर, 2025 को कानून बने एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट के अनुपालन के हिस्से के रूप में तीन मिलियन से ज्यादा पन्नों की सामग्री, जिसमें 2,000 से ज्यादा वीडियो और लगभग 180,000 तस्वीरें शामिल हैं, जारी कर रहा है।

न्याय विभाग में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ब्लैंच ने कहा, कुल मिलाकर, इसका मतलब है कि विभाग ने इस अधिनियम के अनुपालन में लगभग 3.5 मिलियन पन्ने जारी किए हैं।

ब्लैंच ने कहा कि समीक्षा के काम में कई डिवीजनों में 500 से ज्यादा वकील और पेशेवर शामिल थे, जिनमें एफबीआई और कई अमेरिकी अटॉर्नी के कार्यालय शामिल हैं। उन्होंने कहा कि टीमों ने काम पूरा करने के लिए लगभग 75 दिनों तक दिन में दो बार, कभी-कभी उससे ज्यादा बैठकें कीं।

ब्लैंच ने कहा कि विभाग ने शुरू में छह मिलियन से ज्यादा पन्नों को संभावित रूप से जवाब देने योग्य के रूप में पहचाना था, लेकिन कानूनी और गोपनीयता मानकों को लागू करने के बाद कम रिकॉर्ड जारी किए। उन्होंने कहा, हमने ज्यादा इकट्ठा करने की गलती की, और कहा कि आवश्यक छूट के कारण अंतिम उत्पादन छोटा था।

--आईएएनएस

एससीएच/डीएससी

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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चुनाव नज़दीक, संसद भवन निर्माण को लेकर समय के खिलाफ जूझ रहा नेपाल

नई दिल्ली, 31 जनवरी (आईएएनएस)। 5 मार्च को होने वाले आम चुनाव और उसके पखवाड़े भर में नतीजे आने की संभावना के बीच नेपाल पर अपने नए संसद भवन का निर्माण समय पर पूरा करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियों के शपथ ग्रहण के लिए भवन तैयार करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, संविधान के तहत प्रतिनिधि सभा के चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर संसद सत्र बुलाना अनिवार्य है। ऐसे में समय पर भवन उपलब्ध कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी भी है।

बीते एक दशक से संसद एक किराए के भवन में संचालित हो रही थी। इसके बाद सरकार ने 2019 में स्थायी संसद भवन और उससे जुड़ी सुविधाओं के निर्माण की शुरुआत की। उसी वर्ष सितंबर में 12 इमारतों की आधारशिला रखी गई थी और इसे तीन वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, इस परियोजना का ठेका चीन की सेकेंड हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी और नेपाल की टुंडी कंस्ट्रक्शन के संयुक्त उपक्रम को दिया गया था। हालांकि, पिछले तीन वर्षों में पांचवीं बार समय-सीमा बढ़ाए जाने के बावजूद निर्माण कार्य अब तक पूरा नहीं हो सका है।

इससे पहले, 1959 के पहले आम चुनाव से लेकर 2006 में संसद की बहाली तक काठमांडू के सिंह दरबार परिसर स्थित गैलरी बैठक में ही संसद संचालित होती रही। दूसरे जन आंदोलन के बाद बहाल हुई संसद, जिसमें पहली बार माओवादी प्रतिनिधि भी शामिल हुए, ने भी इसी भवन से कामकाज किया।

नेपाल का यह आंदोलन जन आंदोलन-II के नाम से जाना जाता है, जो तत्कालीन राजा ज्ञानेंद्र के प्रत्यक्ष शासन के खिलाफ हुआ था। इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों और माओवादी विद्रोहियों ने मिलकर संसद की बहाली और लोकतांत्रिक सुधारों की मांग की थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 2008 में संविधान सभा के सदस्यों की संख्या बढ़ने के बाद गैलरी बैठक में जगह कम पड़ने लगी। इसके बाद काठमांडू के न्यू बानेश्वर स्थित बीरेंद्र अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र को चुना गया, जिसे सरकार ने किराए पर लिया था। हालांकि, आगजनी की एक घटना के बाद यह भवन उपयोग के लायक नहीं रहा और किराया समझौता भी नवीनीकृत नहीं किया गया।

लेख के अनुसार, सितंबर में हुए जेन-ज़ी आंदोलन के दौरान संसद भवन पहला निशाना बना और 9 सितंबर को इसे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। इसके बावजूद, अधिकारियों का दावा है कि सिंह दरबार परिसर में निर्माणाधीन नई इमारतें समय पर तैयार हो जाएंगी।

--आईएएनएस

डीएससी

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