IND vs WI के दूसरे मैच में KL Rahul खेलेंगे 100वां ODI, 10000 इंटरनेशनल रन का मौका
भारतीय विकेटकीपर-बल्लेबाज़ केएल राहुल बुधवार को गुवाहाटी के बरसापारा स्टेडियम में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ दूसरे वनडे मैच में अपना 100वां वनडे खेलेंगे। इस खास मैच में केएल राहुल - जो भारत के सबसे भरोसेमंद और हरफनमौला वनडे बल्लेबाज़ों में से एक हैं - अपने 10,000 रन पूरे कर सकते हैं, क्योंकि वह इस आंकड़े से सिर्फ़ 35 रन दूर हैं। इसके साथ ही, वह इंटरनेशनल क्रिकेट में 10,000 रन बनाने वाले 15वें भारतीय बल्लेबाज़ बन सकते हैं।
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फिलहाल, केएल राहुल ने भारत के लिए 241 मैचों और 280 पारियों में 40.50 की औसत से 9,965 रन बनाए हैं, जिसमें 22 शतक, 63 अर्धशतक और 199 का बेस्ट स्कोर शामिल है। पिछले कुछ सालों में KL, ODI टीम के लिए एक 'ऑल-राउंडर' (यानी हर काम में माहिर खिलाड़ी) बन गए हैं। वे ओपनिंग करने, पारी को संभालने और मिडिल-ऑर्डर में टीम को स्थिरता देने के साथ-साथ छठे नंबर पर आकर तेज़ी से रन बनाने (फिनिशर की भूमिका) जैसे कई काम करते हैं। इसके अलावा, वे टीम के विकेटकीपर और कभी-कभी कप्तान की भूमिका भी निभाते हैं।
99 ODI मैचों और 90 पारियों में, केएल राहुल ने 49.44 की औसत से 3,412 रन बनाए हैं। इसमें आठ शतक और 20 अर्धशतक शामिल हैं, और उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 112* रहा है। टेस्ट मैचों में, KL ने 70 मैचों और 122 पारियों में 36.64 की औसत से 4,288 रन बनाए हैं। इसमें 12 शतक और 21 अर्धशतक शामिल हैं, और उनका बेस्ट स्कोर 199 रहा है। T20I मैचों में, केएल राहुल ने 72 मैचों और 68 पारियों में 37.75 की औसत और 139 से ज़्यादा के स्ट्राइक रेट से 2,265 रन बनाए हैं। इसमें दो शतक और 22 अर्धशतक शामिल हैं, और उनका बेस्ट स्कोर नाबाद 110 रन है।
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केएल राहुल उन बेहतरीन ODI बल्लेबाज़ों में शामिल हैं जो अपनी निरंतरता और ODI के हिसाब से सही गति से खेलने की काबिलियत दिखाते हैं। भारत के लिए 99 ODI मैचों के बाद केवल तीन खिलाड़ियों ने 45 से ज़्यादा की बैटिंग औसत और 90 से ज़्यादा का स्ट्राइक रेट हासिल किया है: शिखर धवन (45.65 औसत और 93.23 स्ट्राइक रेट), दिग्गज MS धोनी (45.15 औसत और 92.95 स्ट्राइक रेट)।
'कमजोर' पटरी पर तेजी से दौड़ने का प्रयास कर रही भारत-चीन 'दोस्ती' की रेल कहीं डिरेल ना हो जाए!
भारत और चीन के रिश्तों में दिल्ली में जो नई गर्माहट दिखाई दे रही है, उसे केवल कूटनीतिक शिष्टाचार या दो नेताओं की मुस्कान की तस्वीरों से समझना बड़ी भूल होगी। असली कहानी इससे कहीं ज्यादा कठोर है। सात साल बाद भारत आए शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात ने यह साफ कर दिया है कि गलवान के बाद दोनों देशों ने टकराव को खत्म नहीं किया है, लेकिन अब वे उसे नियंत्रित करने और अपने-अपने हितों के लिए रिश्ते को फिर से व्यवस्थित करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। मोदी का भाषण रोक कर शी से पूछना— “Is it okay?”, एक मानवीय कूटनीतिक क्षण था, लेकिन उसके पीछे की रणनीति कहीं अधिक गंभीर है।
दिल्ली में मोदी-शी बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण वाक्य था— “Differences should not become disputes.” मोदी ने साफ किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही संबंधों के आगे बढ़ने की बुनियादी शर्त है। दोनों देशों ने सीमा विवाद के न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान की प्रतिबद्धता दोहराई, साथ ही पुराने समझौतों का पालन करने पर जोर दिया। व्यापार, निवेश, सप्लाई चेन, बाजार तक भरोसेमंद पहुंच और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी चर्चा हुई। यानी बातचीत अब केवल सीमा पर सैनिकों की दूरी घटाने तक सीमित नहीं है; दोनों देश रिश्तों का पूरा ढांचा दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन यहां सबसे जरूरी सवाल है कि चीन अचानक भारत की तरफ क्यों देख रहा है? देखा जाये तो जवाब चीन की इच्छा से ज्यादा बदलती वैश्विक परिस्थितियों में छिपा है। अमेरिका की बढ़ती संरक्षणवादी व्यापार नीति, टैरिफ का दबाव, पश्चिम और चीन के बीच तकनीकी संघर्ष तथा वैश्विक सप्लाई चेन का पुनर्गठन बीजिंग के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे समय में भारत को लंबे समय तक केवल रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर चलना चीन के लिए महंगा पड़ सकता है। भारत दुनिया का विशाल बाजार है, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और ग्लोबल साउथ में उसका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।
यही वजह है कि चीन भारत के साथ संबंधों को “रणनीतिक और दीर्घकालिक” नजरिए से देखने की बात कर रहा है। चीनी पक्ष ने खुद कहा है कि दोनों देश एक-दूसरे की ताकतों से सीख सकते हैं और साझा विकास को आगे बढ़ा सकते हैं। चीन के लिए यह केवल भारत से कारोबार बढ़ाने का मामला नहीं है; यह उस बहुध्रुवीय विश्व-व्यवस्था में भारत को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश भी है, जिसमें BRICS की भूमिका बढ़ रही है।
यहां व्यापार सबसे बड़ा दबाव-बिंदु भी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में चीन से भारत का आयात करीब 131.62 अरब डॉलर, जबकि निर्यात केवल 19.47 अरब डॉलर रहा। यानी करीब 112 अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा। चीन भारत के कुल आयात का लगभग 19.2 प्रतिशत हिस्सा देता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर उपकरण, बैटरियां, मशीनरी और दूसरे औद्योगिक सामान में भारत की चीनी निर्भरता बहुत बड़ी है। दूसरी ओर भारत चाहता है कि चीन अपने बाजार को भारतीय उत्पादों के लिए ज्यादा खोले।
यही विरोधाभास रिश्तों की सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी। भारत चीन से व्यापार बंद नहीं कर सकता, लेकिन ऐसा व्यापार भी स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें चीन लगातार बेचता रहे और भारत केवल खरीदता रहे। इसलिए अगला चरण trade expansion नहीं, trade rebalancing का होना चाहिए। भारतीय MSMEs को BRICS की सप्लाई चेन में जोड़ना, चीन से केवल finished goods लेने के बजाय उत्पादन और value chains में हिस्सेदारी बढ़ाना और निवेश को भारतीय manufacturing capacity से जोड़ना इस दिशा में निर्णायक हो सकता है।
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लेकिन असली कांटा अभी भी सीमा है। 2020 के गलवान संघर्ष ने भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई। इसके बाद सैनिक तनाव कम हुआ, लेकिन सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ। अरुणाचल प्रदेश, LAC पर सैन्य तैनाती, चीन-पाकिस्तान समीकरण और संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी गतिविधियां अभी भी भारत की चिंताओं में हैं। इसलिए दिल्ली का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि व्यापार और सहयोग आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन सीमा पर शांति की कीमत पर नहीं।
फिर आता है critical minerals का सवाल। मोदी ने शी की मौजूदगी में ही technology और critical minerals की “weaponisation” के खिलाफ चेतावनी दी। यह सीधा नाम लेकर हमला नहीं था, लेकिन संदेश साफ था। चीन rare-earth refining में 90 प्रतिशत से अधिक वैश्विक क्षमता नियंत्रित करता है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, EV, AI और advanced manufacturing के दौर में यह आर्थिक ताकत ही नहीं, रणनीतिक leverage भी है।
इसलिए भारत-चीन की नई गर्माहट को दोस्ती की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। यह ज्यादा सही तरीके से managed competition है। जहां दोनों देश जानते हैं कि वे एक-दूसरे को हरा नहीं सकते, लेकिन एक-दूसरे को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। शी का दिल्ली आना, मोदी-शी की बातचीत, व्यापारिक संपर्कों का खुलना और BRICS में साथ काम करने की कोशिशें बताती हैं कि रिश्ते अब फिर से पटरी पर लाए जा रहे हैं। लेकिन पटरी अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हुई है। एक गलत सीमा-संघर्ष, व्यापार पर एकतरफा दबाव या रणनीतिक अविश्वास इस पूरी प्रक्रिया को फिर पीछे धकेल सकता है। Xi का BRICS डिनर में शामिल न होना भी इसी सावधानी की याद दिलाता है। हालांकि उनकी अनुपस्थिति का आधिकारिक कारण नहीं बताया गया और इसे किसी राजनीतिक संकेत के रूप में स्थापित करना उचित नहीं होगा।
बहरहाल, दिल्ली में इस बार मोदी ने संकेत दे दिया है कि सहयोग होगा, व्यापार होगा, BRICS में साझेदारी होगी, लेकिन सीमा, संप्रभुता, बाजार पहुंच और रणनीतिक स्वायत्तता पर भारत अपनी शर्तों से पीछे नहीं हटेगा।
-नीरज कुमार दुबे
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