अगर सवाल पूछा जाए कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में भारत के लिए अच्छे थे या दूसरे कार्यकाल में तो आप बिना देर लगाए जवाब देंगे कि डोनाल्ड ट्रंप जब पहली बार राष्ट्रपति बने थे तभी वह भारत के लिए अच्छे थे। क्योंकि उस समय उन्होंने जमकर भारत की तारीफ की थी। पाकिस्तान को खूब सुनाया था। लेकिन आपको बता दें कि ऐसा सोचने वाले ज्यादातर लोग गलत हैं। दरअसल सच यह है कि डॉनल्ड ट्रंप भारत के लिए अब ज्यादा अच्छे साबित हो रहे हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक खजाना साबित हो रहे हैं। ट्रंप अपनी अकड़, अपने अहंकार और अपनी गलतफहमी से भारत को एक बड़ी सुपर पावर बनाने जा रहे हैं।
ट्रंप ने उस वर्ल्ड ऑर्डर को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है जो सेकंड वर्ल्ड वॉर से चला आ रहा था। अगर डॉनल्ड ट्रंप अपने सनकी और गुस्सैल रवैया से मौजूदा वैश्विक सिस्टम को नहीं तोड़ते तो दुनिया वैसे ही चलती रहती जैसे दशकों से चली आ रही है। डॉनल्ड ट्रंप की वजह से ही अब भारत दुनिया की इकलौती उम्मीद बन गया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला जब इजराइल ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए यह ऐलान कर दिया कि वह अगले 10 सालों में अमेरिका पर अपनी सैन्य और आर्थिक निर्भरता को खत्म करने की कोशिश करेगा। इसी के साथ इजराइल ने यह भी ऐलान कर दिया कि वह भारत के साथ एक बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन करेगा। इजराइल अपने बड़े-बड़े हथियारों की प्रोडक्शन भी भारत में शिफ्ट करने पर विचार कर रहा है और यह सब कुछ डोनल्ड ट्रंप के अहंकार की वजह से ही हो रहा है।
27 जनवरी को जिस तरह से यूरोपियन यूनियन ने भारत के साथ मदर ऑफ ऑल डील्स यानी एक बड़ा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया तो उसने भारत को दुनिया के मंच पर सबसे ऊपर बैठा दिया। यह वही यूरोप है जो दशकों से भारत का अपमान करता आ रहा है। भारत को थर्ड वर्ल्ड कंट्री बोलता आ रहा है। लेकिन आज यही यूरोप लॉन्ग लिव इंडिया के नारे लगा रहा है। यूरोप को द्वितीय विश्व युद्ध से ही यह लगता आ रहा है कि वह दुनिया में सबसे ताकतवर है। उसकी सेना और अर्थव्यवस्था सबसे आगे है। ट्रंप ने सिर्फ 3 महीनों में यूरोप की यह गलतफहमी दूर कर दी। डॉन्ड ट्रंप की धमकियों के बाद यूरोप को पता चला कि वह कितना कमजोर हो चुका है। यूरोप अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए भारत से डील कर रहा है। यहां तक कि जब डॉन्ड ट्रंप ने डेनमार्क के अधिकार वाले ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात कही तब भी यूरोप कुछ नहीं कर पाया।
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भारत और यूरोप ने ट्रेड डील कर लिया। इसके बाद दुनिया के कई देश बेचैन हो गए। इन बेचैन देशों में पाकिस्तान भी है जिसे लग रहा है कि उसका बाजार खराब हो रहा है। अब सवाल यह कि क्या भारत ने ईयू के साथ ट्रेड डील करके अमेरिका का भी हिसाब कर दिया है और अमेरिका के आगे भारत को एक अपर एडवांटेज मिल गया है। क्योंकि अमेरिका और भारत के बीच अब तक ट्रेड वार्ता फाइनल नहीं हो पाया। पीयूष गोयल से यह सवाल हुआ कि हमारी डील अमेरिका से कब तक हो पाएगी और कैसी हो पाएगी? उनका सीधा जवाब है यानी कि अमेरिका को तेवर दिखाते हुए भारत कह रहा है कि जब तक यह सौदा भारत के फायदे में नहीं होगा, भारत को इससे लाभ नहीं होगा। हमारे लोगों को इस डील से राहत नहीं मिलेगी तब तक हम इस पर बातचीत जारी रखेंगे और सबसे बड़ी बात यह कि यह बातचीत बिना किसी डेडलाइन के है।
अमेरिका के साथ जो डील है क्या वो जल्द हम सुन सकते हैं हो सकती है और क्या क्या सिग्नलिंग क्या ये ईयू और आपकी जो डील हुई है ये सिग्नल है नहीं मैंने कई बार इस बात का जिक्र किया है हर डील हर एफडीए अपने पैरों पे खड़ा होता है अपने उसके फायदे नुकसान देखते हुए भारत तय करता है और कोई भी डील दूसरे डील पर ना तो निर्भर होती है ना कोई डील कोई डेडलाइन के हिसाब से नेगोशिएट की जाती है। जब अच्छी डील हो जाए, दोनों तरफ को फायदा दिखे। बहुत सार्थक बातचीत चल रही है कई देशों के साथ और आपको पूरा विश्वास दिला सकता हूं मैं कि भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए नए बाजार भारत के लिए खोलेगा। भारत अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए हमारे निर्यातकों को और मौका देने के लिए और साथ ही साथ हमारे किसान मछुआरे हमारे पशु पशुपालक हमारे लघु उद्योग उनको संरक्षण देते हुए आगे भी नए समझौते करते रहे।
साफ तौर पर भारत ने यह दिखाया है कि वो अमेरिका पर निर्भर नहीं है। ऐसे में भारत यूरोप के साथ-साथ गल्फ देश और फिर दुनिया के कई और देशों से बातचीत कर रहा है। कुछ देशों के साथ वह डील कर चुका है और कई देशों से उसकी यह बातचीत जारी है। यानी कि अमेरिका को छोड़ के भी भारत एक नए बाजार के अवसर को तलाश रहा है और अमेरिका को यह बता रहा है कि बात दादागिरी से नहीं हमेशा सम्मान से होगी और दोनों देशों के लाभ की होगी।
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