उत्तराखंड में ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ कानून पर रिपोर्ट:दावा- 7 साल में आए 62 केस, ट्रायल तक पहुंचे सिर्फ 5, सजा एक को भी नहीं
उत्तराखंड में ‘जबरन धर्म परिवर्तन’ रोकने के लिए बने कानून ‘उत्तराखंड फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट’ (UFRA) को लागू हुए करीब सात साल हो चुके हैं, लेकिन अब तक इस कानून के तहत एक भी मामले में सजा नहीं हो पाई है। यह तब है, जब सरकार ने इस दौरान कानून को लगातार सख्त किया, सजा की अवधि बढ़ाई और कई मामलों में गिरफ्तारियां भी हुईं। यह खुलासा इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से हुआ है, जिसके मुताबिक, उत्तराखंड के 13 जिलों से इस कानून के तहत कुल 62 मामले दर्ज किए गए। इनमें से सिर्फ 5 ही ऐसे रहे, जो फुल ट्रायल तक पहुंच पाए, और अहम बात यह है कि इन सभी पांच मामलों में भी अदालतों ने आरोपियों को बरी कर दिया। बाकी मामलों में कहीं शिकायतकर्ता अपने बयान से मुकर गए, कहीं गवाहों ने आरोपों की पुष्टि नहीं की, तो कई मामलों में अदालतों ने पुलिस जांच में गंभीर खामियां नोट कीं। नतीजा यह रहा कि कानून की सख्ती के बावजूद अदालतों में जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप सबूत की कसौटी पर टिक नहीं पाए RTI और कोर्ट रिकॉर्ड, क्या कहते हैं आंकड़े रिपोर्ट के मुताबिक, RTI से मिले दस्तावेजों और अदालतों के रिकॉर्ड को देखकर सितंबर 2025 तक की स्थिति की जांच की गई। इससे एक साफ तस्वीर सामने आती है। उत्तराखंड के 13 जिलों से जुड़े 51 मामलों के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, जिनकी स्थिति स्पष्ट है। इन मामलों से पता चलता है कि पुलिस के लिए अदालत में अपने आरोप साबित करना लगातार मुश्किल होता गया है। इन 51 मामलों में से सिर्फ 5 ही ऐसे रहे, जो फुल ट्रायल तक पहुंच सके। अहम बात यह है कि इन सभी पांच मामलों में अदालत ने आरोपियों को बरी कर दिया। यानी जिन मामलों में फैसला आया, उनमें एक भी मामले में सजा नहीं हुई और कन्विक्शन रेट शून्य रहा। जब ट्रायल हुआ, तब पुलिस क्यों फेल हुई निचली अदालतों में जिन पांच मामलों में ट्रायल पूरा हुआ और जो सभी बरी होने पर समाप्त हुए, उनका विश्लेषण करने पर पुलिस जांच की कमजोरियां साफ सामने आती हैं। बयान बदले, केस खारिज; बाकी में जमानत रिपोर्ट के मुताबिक कम से कम सात ऐसे मामले सामने आए, जिन्हें अदालतों ने सुनवाई के दौरान ही खारिज कर दिया। इन मामलों में अदालतों ने पाया कि शिकायत करने वालों ने बाद में अपने ही पहले दिए गए बयानों से इनकार कर दिया। कई मामलों में गवाह भी आरोपों की पुष्टि नहीं कर सके, जिससे जबरन धर्म परिवर्तन या लालच देने जैसे आरोप साबित नहीं हो पाए। जिन 39 मामलों की स्थिति स्पष्ट है, उनमें से ज्यादातर मामलों में आरोपी जमानत पर बाहर हैं। कुल 29 मामलों में आरोपियों को जमानत मिल चुकी है। इनमें से 11 मामलों में उत्तराखंड हाईकोर्ट से राहत मिली, जबकि एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी। इसके अलावा तीन मामलों में जमानत की मांग खारिज हुई, पांच मामलों में अभी सुनवाई शुरू होने का इंतजार है और दो मामलों में आरोपियों ने पूरी कार्यवाही पर रोक लगाने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। अदालतों ने कई मामलों में अपने आदेशों में यह भी कहा कि कई रिश्ते आपसी सहमति से बने थे, शिकायतों में विरोधाभास थे और पुलिस की जांच में प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर कमियां पाई गईं। 24 मामलों में जोड़ी गईं थी रेप-किडनैपिंग की धाराएं जिन 24 मामलों में धर्म परिवर्तन कानून के साथ रेप या किडनैपिंग की धाराएं जोड़ी गईं, उनमें से 16 मामलों की स्थिति साफ है। इन 16 मामलों में से 10 में अदालतों ने अपने आदेशों में कहा कि संबंधित युवक-युवती आपसी सहमति से साथ थे। वहीं 11 मामलों में या तो कथित पीड़ितों ने बाद में अपने पहले दिए गए बयान बदल दिए, या फिर जांच में गड़बड़ियां सामने आईं। सात मामलों में मुस्लिम पुरुषों पर अपनी पहचान छिपाकर महिलाओं को प्रेमजाल में फंसाने का आरोप लगाया गया। इसे राजनीतिक बहस में अक्सर ‘लव जिहाद’ कहा जाता है। लेकिन इन सात मामलों में से चार में या तो महिला शिकायतकर्ताओं ने पुलिस के आरोपों से इनकार कर दिया, या अदालतों ने जांच में गंभीर विरोधाभास पाए। 4 मामलों में बताया गया जान का खतरा UFRA कानून के तहत जिन इंटर रिलीजन शादियों में धर्म परिवर्तन होता है, उनके लिए शादी से एक महीने पहले जिलाधिकारी को जानकारी देना जरूरी है। लेकिन ऐसे कम से कम चार मामले सामने आए हैं, जहां युवक-युवती ने परिवार से खतरे की वजह से पुलिस या अदालत से सुरक्षा मांगी, और बाद में उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई। देहरादून के 2020 के एक मामले में पटेल नगर थाने में दर्ज एफआईआर को हाईकोर्ट ने 2023 में रद्द कर दिया और ट्रायल भी बंद कर दिया। इसके अलावा पांच मामलों में यह कहकर कार्रवाई की गई कि जोड़े ने अधिकारियों से अनुमति नहीं ली थी। हालांकि इनमें से चार मामलों में अदालतों ने जोड़ों को गिरफ्तारी से राहत दे दी। 2018 से 2025 तक- कानून सख्त, नतीजे कमजोर उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2018 में पेश किया गया था, जब भाजपा राज्य की सत्ता में आई थी। 2022 में इसमें संशोधन कर जेल की सजा की अवधि बढ़ाई गई। 2025 में इसे और सख्त बनाने का प्रस्ताव लाया गया, जिसमें सजा को तीन साल से बढ़ाकर दस साल और गंभीर मामलों में बीस साल या आजीवन कारावास तक करने का प्रावधान जोड़ा गया। हालांकि यह संशोधन अभी नोटिफाई नहीं हो पाया है, क्योंकि राज्यपाल ने इसे लिपिकीय त्रुटियों के सुधार के लिए सरकार को वापस भेज दिया। 2022 के संशोधन के बाद इस कानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या में तेजी आई। सबसे ज्यादा 20 मामले 2023 में दर्ज किए गए, जबकि 2025 में सितंबर तक ही 18 मामले सामने आ चुके थे। ---------------- ये खबर भी पढ़ें… उत्तराखंड धर्मांतरण संशोधन विधेयक पर लगा ब्रेक:राज्यपाल ने धामी सरकार को लौटाया विधेयक, उम्रकैद की सजा का था प्रावधान उत्तराखंड में जबरन धर्मांतरण के खिलाफ सख्त सजा का प्रावधान करने वाले धामी सरकार के महत्वाकांक्षी विधेयक पर फिलहाल ब्रेक लग गया है। राज्यपाल रिटार्यड लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक 2025 को मंजूरी देने के बजाय पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार को वापस लौटा दिया है। (पढ़ें पूरी खबर)
जब अभिनेताओं से ज्यादा कमाने वाली सुरैया ने रूढ़िवादी सोच के सामने मानी हार, कुर्बान कर दिया अपना 'प्यार'
मुंबई, 31 जनवरी (आईएएनएस)। 1947 से पहले, जहां देश में महिलाओं को घर से निकलने की आजादी नहीं थी, उस समय एक बड़े पर्दे पर अपने रूप, रंग और आवाज से एक अभिनेत्री हिंदी सिनेमा में मेल सुपरस्टार से ज्यादा कमा रहीं थीं।
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