GMC Doda में Burqa विवाद के बाद 3 दिन से छात्रों का कार्य बहिष्कार, अस्पताल प्रशासन ने बैठाई जांच
जम्मू-कश्मीर में डोडा के सरकारी मेडिकल कॉलेज (GMC) में एक प्रोफेसर द्वारा कथित तौर पर बुर्का पहने छात्राओं को लेबर रूम में जाने से रोकने के बाद विवाद खड़ा हो गया है, जिससे ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। पिछले तीन दिनों से विरोध कर रहे छात्रों और इंटर्न का आरोप है कि गायनेकोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मधु चिब ने लेबर रूम के अंदर बुर्का या अबाया पहनने वाली छात्राओं पर आपत्ति जताई थी। सूत्रों के मुताबिक, डॉ. चिब ने कथित तौर पर छात्रों से कहा कि मरीज़ों को देखते समय वे बुर्के की जगह एप्रन पहनें। मुख्य चिंता यह थी कि बाहर के कपड़ों से संक्रमण फैल सकता है और गर्भवती महिलाओं के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
मेडिकल छात्रों का काम का बहिष्कार
पिछले तीन दिनों से छात्र काम का बहिष्कार कर रहे हैं और अस्पताल के बाहर डॉ. चिब के खिलाफ़ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। छात्रों का दावा है कि यह आदेश सिर्फ़ उत्पीड़न और उनके धार्मिक पहनावे पर हमला था। उन्होंने मेडिकल सुपरिटेंडेंट के पास डॉक्टर के खिलाफ़ शिकायत भी दर्ज कराई है। अस्पताल प्रशासन ने अब इन आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं। मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई गई है और उसे अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए दो दिन का समय दिया गया है। इस बीच, पुलिस ने विरोध कर रहे छात्रों से बातचीत की है और उनसे आंदोलन वापस लेने का आग्रह किया है। हालांकि, इससे प्रदर्शनकारियों को शांत करने में कोई खास मदद नहीं मिली है। छात्रों ने प्रोफेसर से माफ़ी की मांग की है।
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एक छात्रा इकरा ने 'द हिंदू' को बताया हमसे बुर्का न पहनने के लिए क्यों कहा जा रहा है? वह (प्रोफेसर) खुलेआम कहती हैं कि उन्हें बुर्का पसंद नहीं है। हम डॉक्टर से माफ़ी की मांग करते हैं। उन्होंने कहा था कि जो लोग बुर्का पहनते हैं, वे गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होते हैं। एक अन्य छात्रा ने आरोप लगाया कि बुर्का पहनने वाली इंटर्न को अलग-थलग किया गया और उन्हें प्रोफेसर के कमरे में भी नहीं जाने दिया गया। छात्रा ने कहा हमने प्रोफेसर से कहा कि अगर लेबर रूम के अंदर बुर्का पहनने की इजाज़त नहीं है, तो लंबे नाखून और दूसरी चीज़ों पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। सिर्फ़ बुर्के को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है? इस बीच, डोडा से AAP विधायक मेहराज़ मलिक ने कहा कि वह स्वास्थ्य मंत्री सकीना इत्तू के सामने यह मुद्दा उठा चुके हैं। विधायक ने कहा प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।
Assam NRC डेटा ट्रांसफर न होने से 19.07 लाख लोगों की Rejection Slips अटकीं, RGI ने दी जानकारी
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि असम के नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिज़न्स (NRC) से बाहर रह गए 19.07 लाख लोगों को रिजेक्शन स्लिप जारी करने की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है, क्योंकि फ़ाइनल NRC को अभी तक आधिकारिक तौर पर नोटिफ़ाई नहीं किया गया है। एक हलफ़नामे में भारत के रजिस्ट्रार जनरल ने कहा कि राज्य के NRC कोऑर्डिनेटर अभी भी NRC डेटा को सुरक्षित रखने के लिए एक "सुरक्षा व्यवस्था" पर काम कर रहे हैं। इसमें कहा गया है कि डेटा अभी तक रजिस्ट्रार जनरल को नहीं सौंपा गया है, और वे फ़ाइनल NRC को तभी नोटिफ़ाई कर सकते हैं जब उन्हें यह डेटा मिल जाए। अगस्त 2019 में जारी अंतिम NRC के अनुसार, 19.07 लाख आवेदकों के नाम सूची से हटा दिए गए थे, जबकि 3.11 करोड़ आवेदकों को इसमें शामिल किया गया था। हलफनामे में कहा गया, राज्य समन्वयक द्वारा NRC डेटा के लिए सुरक्षा व्यवस्था लागू करने का काम चल रहा है और इसलिए डेटा भारत के महापंजीयक (RGI) के साथ साझा नहीं किया गया है।" इसमें यह भी कहा गया कि राज्य NRC समन्वयक द्वारा अस्वीकृति पर्ची (rejection slips) जारी करने की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है।
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सुप्रीम कोर्ट ने पहले राज्य NRC कोऑर्डिनेटर को निर्देश दिया था कि वे फ़ाइनल लिस्ट से बाहर किए गए लोगों को रिजेक्शन स्लिप जारी करने के लिए एक तरीका बनाएं, ताकि वे अपने रिजेक्शन को चुनौती देने के लिए फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में जा सकें। बाद में, अक्टूबर 2020 में राज्य NRC कोऑर्डिनेटर ने RGI को बताया कि रिजेक्शन स्लिप तभी जारी की जा सकती हैं जब रजिस्ट्रार जनरल फ़ाइनल NRC को नोटिफ़ाई कर दें। यह मामला असम स्टेट जमीयत उलेमा, ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और अन्य संगठनों की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सामने आया। इन संगठनों ने NRC से बाहर किए गए लोगों के लिए 'रिजेक्शन स्लिप' और अंतिम सूची में शामिल लोगों के लिए NRC कार्ड की मांग की है। असम सरकार द्वारा अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगे जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई 6 नवंबर तक टाल दी।
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