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6,6,6,6,6,6... अभिषेक शर्मा ने पाकिस्तानी गेंदबाजों की लगाई लंका, मात्र 20 बॉल में ठोकी फिफ्टी, जानिए जड़े कितने चौके-छक्के

Abhishek Sharma : अभिषेक शर्मा ने पाकिस्तान के खिलाफ एशियन गेम्स 2026 के फाइनल मैच में तूफानी पारी खेली है. उन्होंने सिर्फ 20 बॉल में अपनी फिफ्टी पूरी कर पाकिस्तान क्रिकेट टीम के गेंदबाजों की लंका लगा दी है. अभिषेक शर्मा ने आते ही पाकिस्तान के गेंदबाजों क आढ़े हाथों लिया और मैदान पर चौके-छक्कों की बरसात कर डाली. उनके सामने वैभवन सूर्यवंशी (15) और संजू सैमसन (2) रन बनाकर आउट हो गए लेकिन उन्होंने अपना विस्फोटक खेल जारी रखा और तूफानी अंदाज में अर्धशतक ठोक डाला. 

अभिषेक शर्मा ने 6 छक्के ठोक जड़ी फिफ्टी

पाकिस्तान के खिलाफ भारत की ओर से एशियन गेम्स 2026 के फाइनल में अभिषेक शर्मा धमाल मचा दिया. अभिषेक ने पाकिस्तान के खिलाफ 20 बॉल में 3 चौके और 6 विस्फोटक छक्कों की मदद से अपने 50 रन पूरे कर फीफ्टी लगाई. इस मैच में अभिषेक शर्मा टीम इंडिया के लिए 28 बॉल में 3 चौके और 7 छक्कों के साथ 61 रन बनाकर आउट हुए. 

ईशान और अय्यर क्रीज पर मौजूद 

इस गोल्ड मेडल मैच में भारत के कप्तान श्रेयस अय्यर ने टॉस जीता और पाकिस्तान के कप्तान साहिबजादा फरहान को पहले बॉलिंग करने का न्योता दिया. भारत के लिए पारी की शुरुआत वैभव सूर्यवंशी और अभिषेक शर्मा ने की. इन दोनों ने पहले विकेट के लिए 2.1 ओवर में 28 रन जोड़े. इस समय ईशान किशन 6 और श्रेयस अय्यर 6 रन बनाकर टीम इंडिया के लिए बैटिंग कर रहे हैं.

भारत-पाकिस्तान की प्लेइंग-11

भारत -  वैभव सूर्यवंशी, अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन (विकेट कीपर), श्रेयस अय्यर (कप्तान), ईशान किशन, तिलक वर्मा, शिवम दुबे, अक्षर पटेल, वाशिंगटन सुंदर, रवि बिश्नोई, जसप्रीत बुमराह.

पाकिस्तान - साहिबज़ादा फ़रहान (कप्तान), माज़ सदाक़त, उस्मान ख़ान (विकेट कीपर), सैम अयूब, हसन नवाज़, अब्दुल समद, अराफात मिन्हास, अहमद दानियाल, साद मसूद, अबरार अहमद, सुफ़यान मोकिम.

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Jitiya Vrat Katha: जितिया व्रत में क्यों खाई जाती है मछली? पढ़ें चील-सियार और जीमूतवाहन की यह व्रत कथा

Jitiya Vrat Katha: आज 3 अक्टूबर 2026 को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जा रहा है. इस व्रत में महिलाएं 36 घंटे का लंबा निर्जला उपवास करती हैं. इसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है. माताएं अपनी संतान की लंबी आयु के साथ-साथ उसके उज्जवल भविष्य और सुखी जीवन की कामना भी करती हैं. इस व्रत में माताएं प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की विधि-वत पूजा करती है. जितिया व्रत में मछली सेवन करने का खास महत्व होता है. कुछ जगहों में व्रत रखने से पहले मछली का सेवन किया जाता है तो वहीं कुछ क्षेत्रों में व्रत करने के बाद पारण की पूजा के पश्चात मछली का सेवन करते हैं. 

दरअसल, इसके पीछे चील-सियार और राजा जीमूतवाहन के साथ हुए एक घटनाक्रम के बारे में बताया जाता है. कहते हैं कि इस व्रत को सर्वप्रथम चील और सियार ने ही किया था. आइए पढ़ते हैं विस्तार से इस कथा के बारे में.

पढ़ें जितिया व्रत की पौराणिक कथा (Jitiya Vrat Katha in Hindi)

पूर्वकाल में एक समय राजा जीमूतवाहन अपने साले मित्रावसु के साथसमुद्र-तट के वनों में भ्रमण कर रहा था कि इतने में उसने एक व्याकुल युवा पुरुष को अपनी ओर आते हुए देखा तथा उसके पीछे एक वृद्ध स्त्री हाय पुत्र, हाय पुत्र, कहकर करुण क्रन्दन करती हुई आ रही थी. पीछे आते हुए सैनिक के समान किसी पुरुष ने एक ऊंची चट्टान के समीप लाकर उस युवक को छोड़ दिया. जीमूतवाहन ने उस युवक से पूछा- "तू कौन है तथा क्‍या चाहता है? तेरी माता तेरे लिये विलाप क्‍यों कर रही है?"

इन प्रश्नों के उत्तर में उस युवक ने जीमूतवाहन के समक्ष सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन करते हुए कहा- प्राचीन समय में कश्यप की दो पत्नियां विनता एवं कद्रू के मध्य किसी कथा के प्रसंग में परस्पर विवाद हो गया. कद्रू ने कहा कि सूर्य के अश्व काले हैं तथा विनता ने कहा श्वेत हैं. इसी बात पर उन्होंने आपस में शर्त लगा ली कि जिसकी बात झूठी होगी, वह दूसरी की दासी बन जायेगी. विजय की इच्छा से कद्रू ने अपने पुत्र सर्पों के द्वारा विषैली फुत्कार से सूर्य के अश्वों का रंग काला करवा दिया तथा छलपूर्वक विजयी हुयी. तदुपरान्त कद्रु ने विनता को दासी बना लिया. यह सत्य है कि स्त्रियों की पारस्परिक ईर्ष्या भी दुखद होती है.

जब यह प्रसंग विनता के पुत्र गरुड़ को ज्ञात हुआ तो उन्होंने शान्तिपूर्वक अपनी माता को दासता से मुक्त करने हेतु कद्रू से प्रार्थना की. तब कद्रू के पुत्र नागगण आपस में विचार-विमर्श करके बोले कि- 'हे गरुड़! देवताओं ने अभी क्षीरसागर का मंथन प्रारम्भ किया है. क्योंकि तुम अत्यन्त बलवान हो, अतः अपनी माता की मुक्ति के प्रतिफल में वहां से अमृत लाकर हमें दो, तदुपरान्त अपनी माता को स्वीकार करो.'

नागों के यह वचन सुनकर अमृत के लिए क्षीरसागर पर जाकर गरुड़ ने अत्यन्त पौरुष का प्रदर्शन किया. गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने स्वयं गरुड़ से कहा कि- 'मैं तुमसे अत्यन्त प्रसन्न हूं, अतः कुछ वर मांगो.' माता के दासत्व के अपमान से क्रुद्ध गरुड़ ने भगवान से वर मांगा कि- 'नाग मेरे भक्ष्य हों.' भगवान ने तथास्तु कहकर उसे यही वरदान दिया. तत्पश्चात्‌ गरुड़ अपने पराक्रम से अमृत को प्राप्त कर जब चलने लगा, तब तत्त्वज्ञ इन्द्र ने उससे कहा- 'हे पक्षिराज! तुम्हें कुछ ऐसा करना चाहिए कि जिससे वे मूर्ख सर्प, अमृत का पान न कर सके. अतः मैं इसका सर्पों से हरण कर लूंगा.' यह सुनकर विष्णु के वर से प्रचण्ड गरुड़ ने, इन्द्र के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया तथा अमृत-कलश लेकर सर्पों के समीप गया.

वर के प्रभाव से भयभीत नागों से गरुड़ ने कहा क - 'मैं अमृत ले आया हूं, मेरी माता को दासता से मुक्त करके इसे ग्रहण करो. यदि तुम्हें मुझसे भय है, तो मैं इसे कुशा के आसन पर रख देता हूं एवं अपनी माता को मुक्त कर ले जाता हूं. तुम लोग इसे स्वीकार करो.'

नागों ने कहा- 'उचित है, तुम ऐसा ही करो.' इस प्रकार कहने पर गरुड़ ने पवित्र कुशासन पर अमृत-कलश को रख दिया तथा नागों ने गरुड़ की माता विनता को मुक्त कर दिया. माता को दासता से मुक्त कराकर गरुड़ के प्रस्थान करने पर नाग निर्भयतापूर्वक जब अमृतपान करने हेतु एकत्र हुये, तब इन्द्र ने अपनी शक्ति से कुशासन पर रखे हुए सुधा-कलश का अपहरण कर लिया.

हताश नागों ने विचार किया कि संभवतः कुछ अमृत गिरकर कुशा में लगा हो, अतः वे कुशाओं को चाटने लगे. कुशाओं को चाटने से उनकी जीभ के दो भाग हो गए. अत्यंत लोभ के कारण नागों को यह फल प्राप्त हुआ. अमृत के स्वाद से वंचित नागों का शत्रु गरुड़ भगवान विष्णु के वरदान के कारण बारंबार नागों पर आक्रमण कर उनका भक्षण करने लगा. इसके परिणामस्वरूप गरुड़ के आक्रमण से संपूर्ण पाताल व्याकुल हो गया. भय के कारण सर्प निर्जीव से हो गए. गर्भिणी नाग-पत्नियों के गर्भपात होने लगे तथा इसी भय मात्र से अनेक नागों के प्राण शरीर से निकलने लग गए.

प्रतिदिन इस प्रकार का आतंक देखकर नागराज वासुकि ने विचार किया कि इस प्रकार तो समस्त नागलोक सहसा नष्ट हो जायेगा तथा गरुड़ भी अजेय है. यह विचार कर उसने गरुड़ के साथ मिलकर एक नियम बना लिया कि प्रतिदिन एक नाग, समुद्र-तट के पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिए भेज दिया जायेगा. तब नागराज ने गरुड़ से कहा कि - 'तुम पाताल में उपद्रव करने या आतंक फैलाने न आया करो. अन्यथा इस प्रकार एक साथ ही समस्त नागों के नष्ट हो जाने पर तुम्हारा स्वार्थ भी सिद्ध नहीं हो पायेगा.' गरुड़ ने भी इस व्यवस्था को स्वीकार कर लिया तथा वासुकि द्वारा भेजे गए एक-एक नाग का वह प्रतिदिन भोजन करने लगा. अतः नागवध के उसी क्रम में आज मेरी बारी है. मेरा नाम शंखचूड़ है. मैं भी नागराज की आज्ञा से आज गरुड़ के आहार के लिये इस वध्यशिला पर लाया गया हूं. अतः मैं माता के लिये व्यथित एवं शोक कर रहा हूं."

इस प्रकार शंखचूड़ के वचन सुनकर एवं उसके दुख से द्रवित होकर जीमूतवाहन खेदपूर्वक उससे बोला- "अहो! वासुकि का नागराज होना कितना सारहीन है, जो स्वयं अपनी प्रजा को शत्रु का आमिष यानी भोजन बना रहा है. उसने सर्वप्रथम स्वयं को ही गरुड़ के भोजन के लिये क्यों नहीं प्रस्तुत किया. प्रत्युत इसके विपरीत ही नपुंसक की भांति उसने स्वयं के कुल का ही नाश स्वीकार किया. उधर, गरुड़ भी कश्यप ऋषि की संतान होकर कितना घोर पाप कर रहा है. महान पुरुषों को भी इस देह के प्रति कितना मोह है. इसीलिए, आज मैं तुम्हें एक नाग की, अपना शरीर-दान करके रक्षा करूंगा. तुम व्यर्थ में शोक न करो."

यह सुनकर शंखचूड़ भी धैर्यपूर्वक बोला- "हे महात्मा ऐसा पुनः मत कहना. कांच के लिए मोती की हानि करना उचित नहीं है. मैं भी कुल-कलंक बनना नहीं चाहता." ऐसा कहकर जीमूतवाहन को रोककर वह सज्जन नाग शंखचूड़, गरुड़ के आगमन का समय होता देख समुद्रतीरवासी गोकर्ण नामक भगवान शिव को अंतिम प्रणाम करने हेतु गया. उसके प्रस्थान करने पर दयानिधि जीमूतवाहन को उसकी रक्षा के लिए अपना प्राणदान करने का अवसर मिल गया. तब उसने युक्तिपूर्वक किसी कार्य के बहाने से अपने साथी मित्रावसु को वहां से भेज दिया. उसी समय वहां उपस्थित हुए गरुड़ के पंखों की वायु से कंपन करती हुई भूमि मानों उस महापुरुष के दर्शन से आश्चर्यचकित होकर घूर्णन करने लगी. गरुड़ के आगमन के इस लक्षण से सतर्क होकर परोपकारी जीमूतवाहन उस वध्यशिला पर चढ़ गया.

अपने विशाल पंखों की छाया से आकाश को ढके हुये गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया. बहती हुई रक्तधारा वाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा. उसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी जिससे गरुड़ भी आश्चर्यचकित हो गया. इतने में ही शंखचूड़ भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया तथा वध्यशिला को रक्त से लथपथ पाकर विचार करने लगा कि- "धिक्कार है मुझे, उस महात्मा ने अवश्य ही मेरे लिए जीवनदान दिया है. गरुड़ इस समय उसे कहां ले गया होगा. मैं उसे शीघ्र खोजता हूं संभव है, मैं उसे प्राप्त कर लूं" ऐसा विचारकर वह सज्जन रक्त की धारा का अनुसरण करते हुए चलने लगा.

उधर जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड़ ने उसका भोजन करना छोड़ दिया तथा आश्चयचकित हो उसे देखने लगा. यह नाग नहीं, कोई अन्य ही जीव है, जो मेरे भक्षण करने पर भी मृत नहीं, अपितु इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है. इस प्रकार मन में विचार करते हुए गरुड़ से अपनी इष्टसिद्धि के लिए जीमूतवाहन बोला- हे पक्षिराज! अब भी मेरी देह में मांस एवं रक्‍त शेष है. फिर भी, तुम बिना तृप्त हुए ही सहसा भोजन करने से क्‍यों रुक गए हो?" यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा- "हे सज्जन! तुम नाग नहीं हो, अतः बताओ कौन हो?

जीमूतवाहन बोला- मैं नाग ही हूं, तुम भोजन करो. जो प्रारंभ किया है, उसे समाप्त करो. महान व्यक्ति किसी भी कार्य को आरंभ करके समाप्त किए बिना नहीं छोड़ते.जीमूतवाहन ऐसा कह ही रहा था कि शंखचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला-हे गरुड़, इसका भक्षण मत करो, मत करो, यह नाग नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूं! तुम्हें यह सहसा भ्रम कैसे हो गया. इसे मुक्त कर दो.

यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यंत व्याकुल हो गया एवं जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट सिद्धि न होने का खेद हुआ. तदनन्तर परस्पर वार्तालाप के प्रसंग में व्यथित होते हुए यह ज्ञात कर कि वह विद्याधरों का राजा है तथा भ्रम से उसका भक्षण करने पर गरुड़ को भारी मानसिक ताप हुआ. वह विचार करने लगा कि- "मुझ जैसे क्रूर ने भारी पाप किया. मनमानी करने वाला वृत्ति के व्यक्तियों से पाप हो जाना सुलभ या स्वाभाविक है. यह एक प्रशंसनीय महात्मा है, जो परहित के लिए अपने प्राण दे रहा है. मैंने अज्ञानवश संसार को नीचा कर दिया."

इस प्रकार पश्चात्ताप कर पापमुक्ति हेतु अग्नि में भस्म होकर प्राण-त्याग करने का विचार करते हुए गरुड़ से जीमूतवाहन ने कहा- "हे पक्षीराज! दुखी क्‍यों हो रहे हो? यदि वास्तविकता में पाप से भयभीत हो, तो आज से इन सर्पों का भक्षण करना त्याग दो तथा पूर्व में जिनका भक्षण कर चुके हो, उनके लिए पश्चात्ताप करो. यही इसका प्रायश्चित्त या प्रतिक्रिया है. इसके अतिरिक्त और कुछ भी विचारना व्यर्थ है."

इस प्रकार प्राणियों पर दया करने वाले जीमूतवाहन के कहने पर गरुड़ ने उसके वचन को गुरु आज्ञा के समान माना एवं तत्पश्चात्‌ वह भक्षण किये हुये नागों को जीवित करने हेतु अमृत लेने गया. क्षत-विक्षित अंगों वाले जीमूतवाहन पर उसकी पत्नी मलयवती की भक्ति से सन्तुष्ट होकर स्वयं माता गौरी ने अमृत सिंचन किया. साक्षात माता गौरी द्वारा अमृत-सिंचन करने से जीमूतवाहन के अंग अधिक मनोहर हो गए थे एवं उसकी अत्यधिक शोभा बढ़ गई थी. आनन्दित देवताओं के गायन एवं वादन सहित स्वस्थ होकर उठे जीमूतवाहन को देखकर गरुड़ ने सम्पूर्ण समुद्र-तट पर अमृत की वर्षा कर दी. इस अमृत-सिंचन के प्रभाव से तट पर इधर-उधर बिखरे हुए सभी नाग-कंकाल पुनर्जीवित हो उठे. इसके फलस्वरूप वह वेला-वन नागों के समूहों से भर गया एवं उन्हें सदैव के लिए गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गयी.

ऐसा प्रतीत होता था कि नागकुल के रक्षक जीमूतवाहन के दर्शन हेतु समस्त पाताल वहां उपस्थित हो गया हो. तदनन्तर अक्षय शरीर एवं अक्षय यश से शोभित जीमूतवाहन का समस्त बन्धुओं ने अभिनंदन किया. जीमूतवाहन की पत्नी एवं उसके माता-पिता सभी अत्यन्त प्रसन्न हुये. जीमूतवाहन के कहने पर शंखचूड़ भी रसातल को प्रस्थान कर गया तथा जीमूतवाहन का यश तीनों लोकों में प्रकाशित हो गया. तदनन्तर देवताओं के समूह गरुड़ के समीप आकर जीमूतवाहन को प्रणाम करने लगे. माता पार्वती की कृपा से जीमूतवाहन के मातंग नामक सम्बंधी भी भय से आकर उसे प्रणाम करने लगे, जो पहले उसके विरुद्ध थे. 

उन्हीं पूर्वविरोधी द्वारा प्रार्थना करने पर जीमूतवाहन अपनी पत्नी मलयवती एवं प्रिय मित्र मित्रावसु के साथ मलयाचल से हिमाचल स्थित अपनी प्राचीन राजधानी को प्रस्थान कर गया. इस प्रकार उस धैर्यशील जीमूतवाहन ने चिरकाल तक विद्याधर-चक्रवर्ती पद का उपभोग किया. इस प्रकार भविष्यपुराण एवं स्कंदपुराण में वर्णित जीवित्पुत्रिका व्रत कथा सम्पूर्ण होती है.

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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