Bengaluru LPG Cylinder Accident: बेंगलुरु में घर में फटा LPG सिलिंडर, 4 बच्चों समेत एक ही परिवार के 6 लोग झुलसे
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में शनिवार सुबह LPG गैस लीक होने के बाद एक किराए के मकान में भीषण आग लग गई। हादसे में एक ही परिवार के छह लोग झुलस गए, जिनमें चार बच्चे भी शामिल हैं। घटना विनायक लेआउट इलाके की बताई जा रही है।
पुलिस के मुताबिक, परिवार मूल रूप से रायचूर का रहने वाला है और विनायक लेआउट में किराए के मकान में रह रहा था। हादसा उस समय हुआ, जब परिवार सुबह खाना बना रहा था।
खाना बनाते समय अचानक भड़की आग
पुलिस की प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, खाना बनाते समय LPG सिलिंडर से गैस लीक होने की आशंका है। गैस लीक होने के बाद अचानक आग भड़क गई और देखते ही देखते इसकी चपेट में परिवार के छह सदस्य आ गए।
हादसे में 40 वर्षीय करिलिंगप्पा, उनकी 42 वर्षीय पत्नी लक्ष्मम्मा, 11 वर्षीय चैत्र, 9 वर्षीय बसवा और तीन वर्षीय जुड़वां बच्चे गीता और गिरिजा झुलस गए।
सभी घायलों का अस्पताल में इलाज जारी
घटना की जानकारी मिलते ही चंद्र लेआउट पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। पुलिस ने तत्काल सभी घायलों को नजदीकी अस्पताल पहुंचाया, जहां उनका उपचार जारी है।
डॉक्टरों के अनुसार, फिलहाल सभी छह घायलों की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है। पुलिस घटना के कारणों की जांच कर रही है। शुरुआती तौर पर LPG गैस लीक होने की बात सामने आई है, हालांकि हादसे की पूरी वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
Ashtami Shradh 2026: अष्टमी श्राद्ध आज, इन 3 कामों से बनाएं दूरी; जानें शुभ मुहूर्त और तर्पण की सरल विधि
पितृ पक्ष का समय हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस दौरान परिवार के लोग अपने पितरों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से पितरों का श्राद्ध करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
पितृ पक्ष की हर तिथि का अपना अलग महत्व माना गया है। जिस पूर्वज का निधन जिस तिथि को हुआ हो, उसी तिथि पर पितृ पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। इसी क्रम में अष्टमी श्राद्ध 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को किया जाएगा।
अष्टमी तिथि पर किसका श्राद्ध किया जाता है?
पितृ पक्ष की अष्टमी तिथि पर उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है, जिनका देहावसान किसी भी महीने के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ हो।
यानी यदि किसी पूर्वज की मृत्यु अष्टमी तिथि को हुई थी, तो पितृ पक्ष की अष्टमी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है। मृत्यु का महीना अलग होने पर भी तिथि अष्टमी होने की स्थिति में इस दिन श्राद्ध करने की परंपरा है।
अष्टमी श्राद्ध की सरल पूजन और तर्पण विधि
अष्टमी श्राद्ध के दिन श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार श्राद्ध कर्म कर सकते हैं। इसकी सामान्य विधि इस प्रकार मानी जाती है-
1. प्रारंभिक तैयारी: सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। कुश के आसन पर बैठकर श्राद्ध की तैयारी करें। पास में शुद्ध जल, काले तिल, जौ, कच्चा दूध और तुलसी पत्र रखें।
2. संकल्प और आह्वान: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर पितरों का स्मरण करें। इसके बाद श्राद्ध और तर्पण का संकल्प लें।
3. तर्पण: परंपरा के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल और काले तिल अर्पित किए जाते हैं। तर्पण करते समय पितरों का नाम और गोत्र स्मरण किया जा सकता है।
4. पंचबलि: तैयार भोजन का कुछ हिस्सा परंपरा के अनुसार गाय, कुत्ते, कौवे और अन्य जीवों के लिए निकाला जाता है। अतिथि सत्कार को भी श्राद्ध कर्म का हिस्सा माना जाता है।
5. ब्राह्मण भोज और दान: अपनी क्षमता के अनुसार किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को सात्विक भोजन कराया जाता है। इसके बाद श्रद्धानुसार दक्षिणा या दान दिया जा सकता है।
अष्टमी श्राद्ध पर किन 3 कामों से बचना चाहिए?
धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष को सात्विक और संयमित तरीके से बिताने की सलाह दी जाती है। अष्टमी श्राद्ध के दिन भी कुछ कार्यों से बचने की परंपरा है।
1. तामसिक भोजन से बचें
श्राद्ध के दिन मांसाहार, शराब और अन्य तामसिक पदार्थों से दूरी रखने की परंपरा है। भोजन को सात्विक रखने पर जोर दिया जाता है।
2. क्रोध और विवाद से बचें
पितृ पक्ष में शांत और संयमित रहने की धार्मिक परंपरा है। इसलिए अष्टमी श्राद्ध के दिन अनावश्यक विवाद, क्रोध और कटु वाणी से बचने की सलाह दी जाती है।
3. दिखावे या अनादर से श्राद्ध न करें
श्राद्ध कर्म को धार्मिक परंपरा में श्रद्धा और सम्मान से जुड़ा माना गया है। इसलिए केवल दिखावे के लिए कर्मकांड करने के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार श्रद्धापूर्वक तर्पण, भोजन और दान करने की परंपरा है।
श्राद्ध में श्रद्धा और नियम दोनों का महत्व
पितृ पक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध कर्म का मूल भाव पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना है। परिवार अपनी परंपरा, कुलाचार और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान कर सकता है।
ध्यान दें: श्राद्ध और तर्पण के मुहूर्त, विधि और कुछ नियम अलग-अलग पंचांग, क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए किसी विशेष कर्म के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान आचार्य की सलाह को प्राथमिकता दें। उपरोक्त बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं।
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