हिंदू धर्म में भगवान शिव की पूजा में बेलपत्र का विशेष महत्व माना जाता है। श्रावण मास की शुरुआत 30 जुलाई 2026 से शुरुआत हो रही है और इसका समापन 28 अगस्त 2026 को होगी। सावन के सोमवार में भक्तजन बेलपत्र को महादेव को जरुर अर्पित करते हैं। शिवभक्त भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को बेलपत्र अधिक प्रिय है और इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।
खासतौर पर सोमवार के दिन बेलपत्र महादेव को अर्पित करना शुभ होता है। गौरतलब है कि लोग सोमवार के दिन बेलपत्र तोड़कर शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं बेलपत्र तोड़ने के नियम के बारे में, शिवपुराण में कुछ विशेष नियम बताए हैं। आइए आपको इस लेख में बताते हैं कि सोमवार और चतुर्दशी पर बेलपत्र तोड़ने के नियम क्या हैं और आखिर शास्त्रों में क्यों कहा गया है इन दिनों में बेलपत्र तोड़ने से बचना चाहिए?
किन विशेष तिथियों में नहीं तोड़ना चाहिए बेलपत्र
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सोमवार, चतुर्दशी तिथि, अमावस्या, अष्टमी और नवमी तिथि को बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। जो लोग सोमवार को व्रत रखते हैं, वे लोग रविवार के दिन ही बेलपत्र तोड़कर रख सकते हैं। क्योंकि सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है और इस दिन बेलपत्र तोड़ना शास्त्रों में उचित नहीं माना गया है।
सोमवार को बेलपत्र तोड़ने की मनाही क्यों है?
गौरतलब है कि हिंदू धर्म में हर एक दिन और तिथि का अपना धार्मिक महत्व होता है। मुख्य रुप से सोमवार का दिन भगवान शिव को अति प्रिय होता है और इस दिन शिव भक्त पूजन और व्रत करते हैं और उन्हें बेलपत्र अर्पित करते हैं।
इस दिन भूलकर भी बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए। अगर आपको सोमवार के दिन बेलपत्र अर्पित करनी है, तो आपको इसको एक दिन पहले यानी रविवार को तोड़कर रख लें। मान्यता है कि बेलपत्र कभी भी बासी नहीं होता है और इसलिए आप इसको पहले से तोड़कर रख सकते हैं।
शिवपूजन में बेलपत्र का महत्व
धार्मिक ग्रंथ शिवपुराण में बेलपत्र को पवित्र बताया है। मान्यता है कि बेलपत्र की तीन पत्तियां भगवान शिव के तीन गुणों सत्व, रज और तम का प्रतीक माना जाता है। यदि कोई भक्त सच्चे मन से शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करता है, तो भगवान शिव उसकी मनोकामनाएं जरुर पूरी करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
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कल यानी 30 जुलाई 2026 से श्रावण मास की शुरुआत हो रही है। सावन शुरु होते ही कांवड़ यात्रा आरंभ हो जाती है। हिंदू धर्म में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है। इस दौरान शिव भक्त बड़ी संख्या में हरिद्वार पहुंचते हैं और वहां से गंगाजल लेकर अपने घर के नजदीक शिवालयों में शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, कांवड़ उठाने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और शिवजी की कृपा भक्तों को प्राप्त हो सकती है। लेकिन धार्मिक ग्रंथों में कांवड़ यात्रा से संबंधित कई कड़े नियम बताए हैं जिनका पालन करना बेहद जरुरी है। अगर आप इस सावन पहली बार कांवड़ उठाने जा रहे हैं, तो पहले इससे जुड़े सभी नियमों को अच्छे से जान लें। ताकि कांवड़ यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। आइए आपको बताते हैं कांवड यात्रा से जुड़े जरुरी नियम।
कांवड़ यात्रा के 4 प्रकार होते है
सावन में कांवड़ यात्रा के चार प्रकार होते हैं, इनमें से सामान्य कांवड़, डाक कांवड़, खड़ी कांवड़ और दांड़ी कांवड़। वैसे इनके अलग-अलग महत्व और नियम होते हैं। कांवड़ के प्रकार के अनुसार ही शिव मंदिर और घर में तैयारी की जाती है।
- असल में सामान्य कांवड़ में शिव भक्त यात्रा के दौरान आराम कर सकते हैं। भक्तों के लिए जगह-जगह पर पंडाल की व्यवस्था देखने को मिलती है।
- डांक कांवड़ के समय सभी कांवड़िया बिना रुके चलते रहते हैं जब तक की वे अपने घर के पास वाले शिवालय तक न पहुंच जाएं। गौरतलब है कि इसमें कहीं रुका नहीं जाता है।
- खड़ी कांवड में कांवड़िया के साथ कोई न कोई मदद के लिए साथ में जरुर चलता है। जब कांवड़िया आराम करता है तो उनका साथी कांवड़ लेकर चलने के लिए अंदाज में कांवड़ को हिलाते-डुलाते रहते हैं।
- दांडी कांवड़ सबसे मुश्किल होती है। इसमें शिवभक्त गंगाजी के पास से लेकर अपने क्षेत्र के शिवालय तक दंडवत प्रणाम यानी लेटते हुए जाते हैं। जिस वजह से इस यात्रा में कई बार महीना का समय भी लग जाता है। इसलिए अपनी क्षमता के अनुसार ही कांवड़ यात्रा का चुनाव कर सकते हैं।
कांवड़ यात्रा के दौरान ध्यान रखें ये नियम
- माना जाता है कि कांवड़ यात्रियों को गंगा तट से लेकर अपने घर के नजदीक शिवालयों तक कांवाड़ियों को पैदल यात्रा करना चाहिए। ऐसा करने से आपको पुण्य फल प्राप्त होगा।
- कांवड यात्रा के दौरान सबसे जरुरी नियम का विशेष ख्याल रखें कि जब भी आप कहीं पर आराम के लिए रुकें, तो कभी भी कांवड़ को जमीन पर न रखें। जगह-जगह पंडालों में इस तरह की व्यवस्था जरुर होती है।
- यदि इस बार आप कांवड़ को उठा रहे हैं, तो भूलकर भी पूरे सावन मास में मांस, मदिरा आदि तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें। मन में सिर्फ शुभ विचार रखें।
- कांवड़ यात्रा के समय कांवाड़ियों को मन में शिवजी का स्मरण करना चाहिए। पूरे रास्ते में बम बम भोले व हर हर महादेव के जयकारे लगाने चाहिए।
- यदि आप कांवड़ यात्रा के दौरान गलती से जमीन पर कांवड़ रख देते हैं,तो आपको फिर से गंगा जी से गंगाजल लेकर आना चाहिए।
- कांवड़ यात्रा के समय परिवार के सदस्यों को भी सावन से जुड़े सभी नियमों का पालन करना चाहिए। इस अवधि में तामसिक भोजन और नकारात्मक विचारों से दूर रहे हैं।
- शौंच करने के बाद कांवड़िये को स्नान करना बेहद जरुरी है और इसके बाद भी कांवड़ को उठाना चाहिए। दरअसल, बिना स्नान किए कांवड़ यात्रा उठाना उचित नहीं माना जाएगा।
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