CBSE DRQ 2026 Admit Card: आधिकारिक वेबसाइट पर जारी हुए एडमिट कार्ड, जानें हॉल टिकट डाउनलोड करने का तरीका
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अमेरिका में आयातित दवाओं की गुणवत्ता पर मंथन, लॉ-मेकर्स ने उठाई लेबल में मूल देश का नाम लिखने की मांग
वाशिंगटन, 30 जनवरी (आईएएनएस)। अमेरिके के लॉ-मेकर्स ने एक बार फिर मांग उठाई है कि दवाओं पर साफ-साफ लिखा जाए कि वे किस देश में बनी हैं। उनका कहना है कि भारत सहित कुछ देशों ने कोविड-19 महामारी के दौरान दवाओं और उनके कच्चे माल के निर्यात पर रोक लगा दी थी, जिससे यह साफ हुआ कि अमेरिका की दवा आपूर्ति अभी भी दूसरे देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर है और खतरे में है।
यह मांग अमेरिकी सीनेट की एजिंग पर बनी विशेष समिति की सुनवाई के दौरान उठी। सुनवाई का विषय था – “लेबलिंग में सच: अमेरिकी नागरिकों को यह जानने का हक है कि उनकी दवाएं कहां से आती हैं।”
समिति के अध्यक्ष रिक स्कॉट ने अपनी नई विधेयक पहल ‘क्लियर लेबल्स एक्ट’ का ऐलान किया। इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका में बिकने वाली सभी पर्ची वाली दवाओं पर यह बताना जरूरी होगा कि दवा और और उनके मुख्य इंग्रेडिएंट्स कहां बने हैं।
रिक स्कॉट ने कहा कि इस जांच में जो बातें सामने आई हैं, वे लोगों को हैरान कर देंगी। उनके मुताबिक अमेरिका में दी जाने वाली करीब 91 प्रतिशत दवाएं जेनेरिक होती हैं और इनमें से लगभग 94 प्रतिशत दवाओं के सक्रिय घटक विदेशों में बनते हैं, जिनमें ज्यादातर उत्पादन चीन और भारत में होता है।
उन्होंने कहा कि जानकारी की कमी की वजह से मरीजों, डॉक्टरों और दवा विक्रेताओं को यह भी नहीं पता होता कि वे जो दवा इस्तेमाल कर रहे हैं, वह कहां बनी है। साथ ही, विदेशों में बने कारखानों की निगरानी करना भी अमेरिकी एजेंसियों के लिए मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने कहा, हमें न सिर्फ पब्लिक हेल्थ का गंभीर खतरा है, बल्कि नेशनल सिक्योरिटी का भी बड़ा खतरा है। अगर विदेशी सप्लायर एक्सपोर्ट बंद कर देते हैं, तो अमेरिका के पास जान बचाने वाली दवाओं तक पहुंच पक्की करने का कोई पक्का प्लान नहीं है।
उन्होंने हाल के इतिहास की ओर इशारा किया। स्कॉट ने कहा, कोविड महामारी के दौरान, भारत ने ज़रूरी दवा सामग्री के एक्सपोर्ट को रोक दिया था। तो यह फिर से हो सकता है।
सुनवाई के एक हिस्से की अध्यक्षता करने वाली सेनेटर एश्ले मूडी ने कहा कि आम उपभोक्ता के लिए यह जान पाना लगभग नामुमकिन है कि उसकी दवा कहां से आई है। उन्होंने कहा कि एफडीए इंपोर्ट अलर्ट में विदेशी फैसिलिटी में समस्याओं का ज़िक्र किया गया है, जिसमें कैंसर पैदा करने वाली अशुद्धियां, गलत बैच रिकॉर्ड और नॉन-स्टेराइल स्थितियां शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि बुजुर्ग लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं, क्योंकि वे ज्यादा जेनेरिक दवाओं पर निर्भर रहते हैं और उनके पास विकल्प भी कम होते हैं।
सुनवाई में मौजूद विशेषज्ञों ने दवाओं की जानकारी सार्वजनिक करने के विचार का समर्थन किया, लेकिन यह भी कहा कि सिर्फ लेबल बदलने से जेनेरिक दवाओं की गहरी समस्याएं अपने-आप हल नहीं होंगी।
ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन ग्रे ने कहा कि उपभोक्ताओं, डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को दवाओं की मूल जानकारी मिलनी चाहिए, जिसमें यह भी शामिल हो कि दवा कहां बनी है और उसकी गुणवत्ता का जोखिम कितना है। उन्होंने कहा कि यह मानना अब सही नहीं है कि सभी जेनेरिक दवाएं एक-जैसी होती हैं, खासकर जब उत्पादन विदेशों में हो रहा हो और निरीक्षण पहले से घोषित किए जाते हों।
ग्रे ने दवा की पैकेजिंग पर क्यूआर कोड लगाने की सलाह दी। ये कोड सर्च की जा सकने वाली जानकारी से जुड़ेंगे, जिससे पता चलेगा कि तैयार दवाएं और एक्टिव इंग्रेडिएंट्स कहां बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि क्वालिटी डेटा भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि कंपनियां सिर्फ सस्ती कीमत पर नहीं, बल्कि अच्छी गुणवत्ता पर भी प्रतिस्पर्धा करें।
अमेरिकन सोसाइटी ऑफ हेल्थ-सिस्टम फार्मासिस्ट के माइकल गैनियो ने कहा, “हर अमेरिकी को यह जानने का हक़ है कि उनकी प्रिस्क्रिप्शन दवाएं कहां बनती हैं। ट्रांसपेरेंसी से जेनेरिक दवा की कीमतों में “सबसे नीचे की दौड़” को रोकने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि रिसर्च से पता चला है कि जब ओरिजिन की जानकारी बताई जाती है, तो मरीज और फार्मेसी खरीदार भारत या चीन की दवाओं के बजाय यूनाइटेड स्टेट्स या कनाडा में बनी दवाओं को पसंद करते हैं। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि केवल देश का नाम दवा की गुणवत्ता की पूरी गारंटी नहीं देता।
मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टीफन डब्ल्यू. शोंडेलमेयर ने भारत को सप्लाई चेन का एक जरूरी लेकिन मुश्किल हिस्सा बताया। उन्होंने कहा, “भारत जेनेरिक दवाओं का हमारा बड़ा सप्लायर है। भारत से अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट आते हैं, सभी नहीं, लेकिन उनमें से कुछ।” उन्होंने इसे गलत बताया कि अमेरिका खाने-पीने के सामान और कपड़ों पर तो देश का नाम लिखने की मांग करता है, लेकिन जीवन बचाने वाली दवाओं के मामले में ऐसा नियम नहीं है। उन्होंने न्यूजीलैंड की सार्वजनिक दवा जानकारी प्रणाली को एक अच्छा उदाहरण बताया।
ड्यूक-मार्गोलिस इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ पॉलिसी के स्टीवन कोलविले ने कहा कि ड्रग सप्लाई चेन को एक जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें पुरानी कमी, क्वालिटी की चिंताएं, जियोपॉलिटिकल रिस्क और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने की कोशिशें शामिल हैं।
कमेटी ने कहा कि जब तक लॉमेकर्स ड्राफ्ट कानून की समीक्षा करेंगे, तब तक सुनवाई का रिकॉर्ड अगले हफ़्ते तक खुला रहेगा।
अमेरिकी अधिकारी काफी समय से चेतावनी देते रहे हैं कि विदेशों पर निर्भरता की वजह से दवा आपूर्ति प्रणाली कमजोर हो गई है। कोविड-19 महामारी के दौरान कई देशों द्वारा दवाओं और मेडिकल सामान के निर्यात पर रोक लगाए जाने से इस चिंता को और मजबूती मिली और इस मुद्दे पर दोनों दलों में गंभीर चर्चा शुरू हुई।
--आईएएनएस
एएस/
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