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Explainer: फ्लाईदुबई विमान में हमला या साजिश? 67 मिनट में सोशल मीडिया पर कैसे फैल गया ‘फॉल्स फ्लैग’ दावा

Flydubai Plane Hijack: 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हुए खौफनाक घटनाक्रम के बाद सोशल मीडिया पर एक दूसरी लड़ाई शुरू हो गई. विमान में सह-पायलट द्वारा कथित तौर पर भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला करने और विमान को खतरे में डालने की घटना की जांच अभी चल ही रही थी कि इंटरनेट पर इसे लेकर कई तरह की साजिश की थ्योरी वायरल होने लगीं. इनमें कुछ पोस्ट में दावा किया गया कि यह घटना इजरायल, मोसाद या प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की कथित साजिश थी.

हालांकि, इन दावों के समर्थन में कोई विश्वसनीय सबूत सामने नहीं आया है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, फ्लाइट में 174 लोग सवार थे और घटना के बाद विमान को सऊदी अरब के तबूक में सुरक्षित उतारा गया.

पहले समझिए विमान में हुआ क्या था?

फ्लाइट FZ1073 दुबई से तेल अवीव जा रही थी. विमान बोइंग 737 MAX 8 था. उड़ान के दौरान कॉकपिट में कैप्टन और सह-पायलट के बीच हिंसक झड़प की स्थिति पैदा हो गई.

रिपोर्टों के मुताबिक, सह-पायलट ने कैप्टन स्मित मच्छर पर चाकू या किसी धारदार हथियार से हमला किया. इसके बाद विमान की ऊंचाई में तेजी से गिरावट दर्ज की गई. कैप्टन घायल होने के बावजूद कॉकपिट का दरवाजा खोलने में सफल रहे. इसके बाद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने अंदर पहुंचकर हमलावर को काबू करने में मदद की.

विमान को बाद में सऊदी अरब के तबूक एयरपोर्ट की ओर मोड़ा गया और वहां सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई. अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, विमान कुछ ही समय में करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई तक तेजी से नीचे आया था.

घटना के 67 मिनट बाद ही शुरू हो गया ‘फॉल्स फ्लैग’ नैरेटिव

विमान की घटना के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा तेजी से जिस दावे ने जोर पकड़ा, वह था ‘फॉल्स फ्लैग’ थ्योरी. ‘फॉल्स फ्लैग’ का सामान्य अर्थ ऐसी कथित कार्रवाई से है जिसमें किसी घटना की जिम्मेदारी किसी दूसरे पक्ष पर डालने के लिए हमला या ऑपरेशन किया जाता है. इस मामले में कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने बिना प्रमाण के दावा किया कि फ्लाइट में हुआ हमला वास्तव में इजरायल या उससे जुड़े लोगों की बनाई हुई योजना थी.

यह दावा कितनी तेजी से फैला, इसका अंदाजा एंटीसेमिटिज्म रिसर्च सेंटर (ARC) की निगरानी से लगाया जा सकता है. संस्था के मुताबिक, विमान से पहला इमरजेंसी सिग्नल मिलने के सिर्फ 67 मिनट बाद ऐसा पहला पोस्ट सामने आया, जिसमें घटना को इजरायल की कथित ‘फॉल्स फ्लैग’ कार्रवाई बताया गया. इसके बाद पोस्ट की संख्या तेजी से बढ़ती गई.

12 घंटे की निगरानी में सामने आए ये आंकड़े

  • शोधकर्ताओं ने ‘false flag’ शब्द वाले 4,136 पोस्ट की निगरानी की.
  • इनमें से 2,963 पोस्ट में घटना के लिए इजरायल, मोसाद, नेतन्याहू, जायोनिस्ट या यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया गया.
  • करीब 72 फीसदी पोस्ट इन साजिश वाले दावों को आगे बढ़ा रहे थे.
  • आखिरी दो निगरानी अवधि में यह हिस्सा बढ़कर करीब 81 और 82 फीसदी तक पहुंच गया.
  • 9 से 10 बजे ET के बीच एक घंटे में सबसे ज्यादा 623 पोस्ट रिकॉर्ड किए गए.

रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े पूरे सोशल मीडिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते, बल्कि शोधकर्ताओं द्वारा निगरानी किए गए पोस्ट के एक खास डेटासेट से जुड़े हैं.

नेतन्याहू को लेकर भी वायरल हुए दावे

साजिश की थ्योरी सिर्फ इजरायल तक सीमित नहीं रही. कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को भी घटना से जोड़ने की कोशिश की गई.

इसके पीछे एक वजह घटना से पहले नेतन्याहू की ओर से दिया गया बयान बताया गया. रिपोर्टों के अनुसार, 29 सितंबर को उन्होंने इजरायल पर संभावित बड़े हमले को लेकर चेतावनी दी थी. इसके बाद जब 30 सितंबर को फ्लाईदुबई विमान में घटना हुई तो कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स ने दोनों घटनाओं को जोड़ते हुए दावा करना शुरू कर दिया कि विमान की घटना पहले से तैयार की गई थी.

कुछ पोस्ट में ‘Bibiwood’ जैसे हैशटैग भी इस्तेमाल किए गए. लेकिन किसी घटना के पहले चेतावनी दिए जाने और बाद में दूसरी घटना होने मात्र से दोनों के बीच साजिश या संबंध साबित नहीं होता. इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.

क्या ईरान का भी कनेक्शन सामने आया?

इस घटना के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान की संभावित भूमिका को लेकर बयान दिया. उन्होंने कहा कि अगर जांच में यह साबित होता है कि ईरान का फ्लाइट पर हुए हमले से संबंध था तो ईरान को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बेहद कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि उस समय तक जांच चल रही थी और ईरानी कनेक्शन की पुष्टि नहीं हुई थी.

इसलिए फिलहाल ईरान की भूमिका को भी स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता. जांच एजेंसियां घटना के मकसद और संभावित संपर्कों की जांच कर रही हैं.

हमलावर की पहचान को लेकर भी फैलीं अलग-अलग बातें

सोशल मीडिया पर गलत सूचना का एक दूसरा दौर विमान में हमला करने वाले सह-पायलट की पहचान और राष्ट्रीयता को लेकर चला.

शुरुआती घंटों में अलग-अलग सोशल मीडिया अकाउंट्स ने बिना आधिकारिक पुष्टि के हमलावर को अलग-अलग देशों का नागरिक बताना शुरू कर दिया. कुछ दावों को भारत-पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद तनाव से जोड़ने की कोशिश की गई.

बाद की रिपोर्टों में एक इजरायली अधिकारी के हवाले से हमलावर को ओमान का नागरिक बताया गया. हालांकि घटना की पूरी पृष्ठभूमि और मकसद की जांच अभी जारी है.

इससे यह भी पता चलता है कि किसी बड़ी घटना के शुरुआती घंटों में सोशल मीडिया पर सामने आने वाली पहचान संबंधी जानकारी को तुरंत सच मानना कितना जोखिम भरा हो सकता है.

लाइव टीवी पर भी सामने आया फर्जी यात्री

गलत जानकारी फैलने का मामला सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा. इजरायल के चैनल 12 की लाइव कवरेज के दौरान एक व्यक्ति ने फोन पर खुद को विमान का यात्री बताया.

उसने घटना के बारे में भावुक अंदाज में जानकारी दी. लेकिन बातचीत के दौरान उसके दावों में गड़बड़ी नजर आने लगी. उसने अपने साथ यात्रा कर रहे भाई का नाम कुछ असामान्य तरीके से बताया, जिसके बाद चैनल को पता चला कि वह वास्तविक यात्री नहीं था और प्रसारण रोक दिया गया.

यह घटना बताती है कि ब्रेकिंग न्यूज के दौरान लाइव फोन कॉल और कथित प्रत्यक्षदर्शी के बयान को बिना पुष्टि प्रसारित करना कितना जोखिम भरा हो सकता है.

किसी बड़े विमान हादसे, आतंकी घटना या सुरक्षा संकट के समय दर्शक तुरंत जानकारी चाहते हैं. इसी जल्दबाजी में अपुष्ट दावे असली खबर का हिस्सा बन सकते हैं और बाद में गलत सूचना को और बढ़ा सकते हैं.

एंटीसेमिटिज्म पर काम करने वाली संस्थाओं ने जताई चिंता

Combat Antisemitism Movement और उसके Antisemitism Research Center ने इस मामले में सोशल मीडिया पर तेजी से फैली उन पोस्ट का विश्लेषण किया जिनमें इजरायल या यहूदियों को घटना के पीछे बताया गया था.

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस तरह के दावे पहले से मौजूद साजिश की कहानियों को किसी नई घटना से जोड़ते हैं. CyberWell ने भी इसी तरह की पोस्ट का अध्ययन किया और कहा कि कुछ दावों में पीड़ितों और कथित हमलावर की भूमिका को उलटने की कोशिश दिखाई दी.

इन संस्थाओं का कहना है कि किसी घटना की पूरी जानकारी सामने आने से पहले किसी समुदाय या देश को जिम्मेदार ठहराने वाली थ्योरी तेजी से फैलने पर नफरत और गलत सूचना दोनों बढ़ सकते हैं.

यह भी पढ़ें: फ्लाईदुबई के को-पायलट को UAE को सौंपा गया, कप्तान पर हमले और क्रैश की कोशिश की जांच तेज

 

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