Kal Ka Mausam: सावधान! अगले 4 दिन भारी पड़ेंगे, पहाड़ों पर गिरेगी बर्फ, मैदानों में कोहरे और शीतलहर की मार
उत्तर भारत में मौसम एक बार फिर करवट ले रहा है. पहाड़ों पर बर्फबारी और मैदानों में बारिश के साथ घने कोहरे का अलर्ट जारी किया गया है. वेस्टर्न डिस्टरबेंस (Western Disturbance) के एक्टिव होने की वजह से 31 जनवरी से 3 फरवरी के बीच पहाड़ों पर मौसम बिगड़ने वाला है. जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में हल्की से मध्यम बारिश और बर्फबारी हो सकती है. इस दौरान कई जगहों पर बिजली कड़कने और गरज-चमक के साथ मौसम खराब रहने की संभावना है.
मैदानों में बारिश और घने कोहरे की मार
पहाड़ों के साथ-साथ मैदानी इलाकों में भी इसका असर दिखेगा. पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में हल्की बारिश हो सकती है. सबसे ज्यादा परेशानी घने कोहरे की वजह से होने वाली है. सुबह और रात के वक्त कोहरा इतना ज्यादा हो सकता है कि विजिबिलिटी 50 मीटर से भी कम रह जाए. इसका सीधा असर सड़क और रेल यातायात पर पड़ सकता है, इसलिए सफर करते समय सावधानी बरतें.
कैसा रहा पिछले 24 घंटों का हाल?
पिछले 24 घंटों में भी सर्दी का सितम जारी रहा. उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बहुत घना कोहरा देखा गया. राजस्थान, मध्य प्रदेश और ओडिशा के कुछ इलाकों में भी धुंध छाई रही. वहीं, सिक्किम में बारिश और बर्फबारी दर्ज की गई, जबकि उत्तराखंड के कुछ इलाकों में पाला गिरने से ठिठुरन बढ़ गई है.
तापमान में उतार-चढ़ाव
फिलहाल उत्तर-पश्चिम भारत और बिहार-मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में न्यूनतम तापमान 5 से 10 डिग्री सेल्सियस के बीच चल रहा है. हरियाणा का नारनौल 2.0 डिग्री सेल्सियस के साथ सबसे ठंडा इलाका रहा. आने वाले दिनों में पहले तापमान थोड़ा बढ़ेगा और फिर दोबारा गिरावट दर्ज की जा सकती है. महाराष्ट्र और गुजरात में हालांकि अब धीरे-धीरे गर्मी बढ़ने के आसार हैं.
मछुआरों और आम लोगों के लिए चेतावनी
मौसम विभाग ने 30 और 31 जनवरी को पंजाब और हरियाणा में शीतलहर (Cold Wave) चलने की चेतावनी दी है. साथ ही, खराब मौसम और तेज हवाओं के चलते मछुआरों को सलाह दी गई है कि वे 3 फरवरी तक बंगाल की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी जैसे समुद्री इलाकों में न जाएं.
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विश्व को जापानी सैन्यवाद के पुनरुत्थान से सावधान रहना चाहिए
बीजिंग, 29 जनवरी (आईएएनएस)। इस वर्ष जापान के आक्रमण के विरुद्ध चीनी जन प्रतिरोध युद्ध और विश्व फासीवाद-विरोधी युद्ध में विजय की 80वीं वर्षगांठ है। द्वितीय विश्व युद्ध में पराजित राष्ट्र के रूप में जापान को सैन्यवाद द्वारा किए गए गंभीर अपराधों पर गहन चिंतन करना चाहिए था।
फिर भी, जापान में कुछ व्यक्ति और ताकतें ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत करने, युद्धकालीन अत्याचारों को छिपाने और जापान के आक्रामक युद्ध पर स्थापित निर्णयों को पलटने के प्रयासों को तेज़ कर रही हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि सैन्यवादी विचारधाराओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
इस प्रकार की कार्रवाइयां अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की इतिहास की साझा समझ के सीधे विपरीत हैं, अंतर्राष्ट्रीय सहमति और मानवीय विवेक का गंभीर रूप से उल्लंघन करती हैं, क्षेत्रीय और वैश्विक शांति और स्थिरता को गंभीर रूप से खतरे में डालती हैं, और युद्धोत्तर अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देती हैं।
नवंबर की शुरुआत में, जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने संसद सत्र के दौरान सार्वजनिक रूप से दावा किया कि तथाकथित थाइवान संकट एक अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है, जिससे जापान को सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति मिल जाएगी।
1945 में जापान की पराजय के बाद यह पहली बार है कि किसी मौजूदा नेता ने औपचारिक रूप से यह विचार व्यक्त किया है कि थाइवान के लिए संकट जापान के लिए भी संकट है, और इसे सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग से जोड़ा है।
यह पहली बार है जब जापान ने थाइवान मुद्दे में सैन्य हस्तक्षेप करने की महत्वाकांक्षा व्यक्त की है और पहली बार जापान ने चीन के खिलाफ़ बल प्रयोग की धमकी दी है।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
--आईएएनएस
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