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मेंटल हेल्थ- पेरेंट्स से मिलने पर ट्रिगर होता चाइल्डहुड ट्राॅमा:वे आज भी बहुत लड़ते हैं, एक-दूसरे को ताने देते हैं, क्या करूं

सवाल- मेरी उम्र 40 साल है। मेरे पेरेंट्स काफी बूढ़े और कमजोर हो चुके हैं। लेकिन मैं जब भी उनसे मिलती हूं, तो मेरे बचपन का पुराना ट्रॉमा ट्रिगर हो जाता है। मेरे पेरेंट्स एक-दूसरे को बहुत नापसंद करते हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने पूरी जिंदगी साथ बिता दी। आज भी वो हर वक्त आपस में सिर्फ लड़ते रहते हैं। उन्हें देखकर बहुत अजीब लगता है कि लोग कैसे पूरी-पूरी जिंदगी खुद को सप्रेस करके बिता देते हैं। जब तक मैं उनसे दूर रहती हूं, सब ठीक रहता है। लेकिन उनके पास जाते ही मुझे अजीब सी उदासी और डिप्रेशन घेर लेता है। क्या ये PTSD (पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) है? मैं इस सिचुएशन को ज्यादा माइंडफुली कैसे हैंडल करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपकी परेशानी को गंभीरता से समझने की जरूरत है। आपने सवाल में जितनी बातें कही हैं, सिर्फ उनके आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि आपको PTSD या कोई दूसरी मानसिक बीमारी है। लेकिन यह साफ है कि माता-पिता के साथ रहना आपके लिए भावनात्मक रूप से मुश्किल है। बचपन के माहौल का असर अगर किसी बच्चे ने अपने पेरेंट्स को हमेशा लड़ते-झगड़ते, एक-दूसरे को नीचा दिखाते या तनाव में रहते देखा हो, तो इसका असर लंबे समय तक उसकी मेमोरी में रह सकता है। बच्चे के लिए घर का मतलब है– सुरक्षा। लेकिन जब उसी जगह पर लगातार तनाव हो, तो बच्चे को लग सकता है कि जीवन में कुछ भी सुरक्षित या स्थिर नहीं है। आज जब आप अपने माता-पिता को उसी तरह लड़ते देखती हैं, तो बचपन की वही बेबसी फिर महसूस हो सकती है। उस समय आप छोटी थीं। न वहां से निकल सकती थीं और न उनके झगड़े को रोक सकती थीं। लेकिन आज स्थिति अलग है। अब आप बड़ी हैं और अपने फैसले खुद ले सकती हैं। लेकिन बावजूद इसके आपका इमोशनल रिएक्शन वही पुराना वाला हो सकता है। आपके मामले में तीन भावनाएं एक साथ काम कर सकती हैं। 1. पुरानी बेबसी उनके झगड़े आपको उस समय में वापस ले जा सकते हैं, जब आप कुछ बदल नहीं सकती थीं। 2. आज का तनाव आपके माता-पिता अभी भी लड़ते हैं। इसलिए परेशानी सिर्फ अतीत की नहीं है। मौजूदा माहौल भी आपको प्रभावित कर रहा है। 3. दुख और अपराधबोध उन्हें बूढ़ा और कमजोर देखकर आपको उस परिवार के लिए भी दुख हो सकता है, जिसकी आपने बचपन में उम्मीद की थी। साथ ही उनकी देखभाल का दबाव भी महसूस हो सकता है। इन अनुभवों का असर जीवन के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। जैसेकि– लेकिन इन चीजों को देखकर खुद से किसी बीमारी का नाम देना जरूरी नहीं है। इन्हें ऐसे पैटर्न की तरह देखें, जिन्हें समझने की जरूरत है। क्या यह PTSD है? हर दर्दनाक या परेशान करने वाला बचपन PTSD नहीं होता। ट्रॉमा किसी ऐसे अनुभव और उसके लंबे असर को कहा जा सकता है, जिसने व्यक्ति को गहराई से प्रभावित किया हो। वहीं PTSD एक खास मेंटल हेल्थ कंडीशन है। कुछ लोगों में बचपन के मुश्किल अनुभवों के बाद उदासी, चिंता, अपराधबोध या रिश्तों में परेशानी हो सकती है, लेकिन उन्हें PTSD नहीं होता। इसलिए सिर्फ माता-पिता से मिलते ही उदास होना PTSD का प्रमाण नहीं है। अगर बचपन में हिंसा या दुर्व्यवहार हुआ था, तो इस बारे में किसी मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट से विस्तार से बात करना जरूरी है। पेरेंट्स से मिलने पर क्या ट्रिगर होता है? माता-पिता के घर पहुंचते ही पुराना माहौल कई तरह की भावनाएं जगा सकता है। किसी की ऊंची आवाज, एक-दूसरे को बुरा कहना, पुराना झगड़ा या किसी एक का पक्ष लेने का दबाव आपको फिर उसी भूमिका में पहुंचा सकता है, जिसमें आप बचपन में थीं। पेरेंट्स से मिलने पर ये फीलिंग्स ट्रिगर हो सकती हैं– इन ट्रिगर्स को पहचानना ही बदलाव की पहली सीढ़ी है। दो हफ्तों की सेल्फ एक्सरसाइज अपने अनुभवों को बेहतर ढंग से समझने के लिए आप दो हफ्ते तक एक डायरी मेन्टेन करें। इसमें आपको पेरेंट्स से मिलने से पहले और बाद के अपने इमोशंस का ट्रैक रिकॉर्ड रखना है। यह कोई मेडिकल टेस्ट नहीं है। इस एक्सरसाइज का मकसद सिर्फ अपने पैटर्न को समझना है। हर मुलाकात से पहले और बाद में डायरी में ये बातें नोट करें। ट्रिगर क्या था? मन में क्या विचार आया? आपने क्या किया? असर कितना हुआ? खुद से पूछें ये 5 सवाल ऐसे समय में अपने विचारों को समझना भी जरूरी है। खुद से पूछें कि अभी क्या हो रहा है। इससे भावनाओं और पुराने अनुभवों के बीच फर्क करना आसान हो सकता है। यह भी देखें कि यह उदासी सिर्फ माता-पिता के साथ ही महसूस होती है या बाकी समय भी। हर झगड़ा ठीक करना आपकी जिम्मेदारी नहीं पेरेंट्स के झगड़े सुलझाना आपकी जिम्मेदारी नहीं है। आप उन्हें समझा सकती हैं। मदद की पेशकश कर सकती हैं। लेकिन उनके रिश्ते को ठीक करना सिर्फ आपकी जिम्मेदारी नहीं है। उसमें उन दोनों की भागीदारी जरूरी है। आप अपने लिए एक सीमा तय कर सकती हैं, जैसेकि– “अगर आवाज ऊंची होगी या एक-दूसरे को अपशब्द कहे जाएंगे, तो मैं वहां से चली जाऊंगी।” यह माता-पिता की उपेक्षा करना नहीं है। यह अपनी मानसिक शांति की रक्षा करना है। चिंता और सोच में फर्क माता-पिता के झगड़े के बाद बार-बार आपके मन में ये विचार आ सकते हैं– इन सवालों का कोई आसान जवाब नहीं है। बार-बार इन्हीं बातों को सोचने से दुख बढ़ सकता है। इसलिए इसके बजाय खुद से पूछें- “मैं अभी क्या कर सकती हूं?” अगर कोई व्यावहारिक कदम है, तो वह उठाएं। जो चीज आपके कंट्रोल के बाहर है, उसे छोड़ दें। माइंडफुलनेस का मतलब दुख सहना नहीं माइंडफुलनेस का मतलब यह नहीं कि माता-पिता लड़ते रहें और आप चुपचाप सब सहती रहें। इसका मतलब है कि आप अपनी भावनाओं को पहचानें, लेकिन उसके हिसाब से तुरंत प्रतिक्रिया न दें। अगर उनके झगड़े के दौरान तनाव बढ़ने लगे तो- शांत समय में पेरेंट्स से बात करें अगर संभव हो तो दोनों से अलग-अलग और शांत समय में बात करें। आप कह सकती हैं- “मैं आप दोनों से प्यार करती हूं और चाहती हूं कि अब जिंदगी के इस पड़ाव पर माहौल में थोड़ा शांति रहे। जब आप दोनों तेज आवाज में लड़ते हैं या एक-दूसरे को बुरा कहते हैं, तो मुझे बहुत परेशानी होती है। मैं मदद करना चाहती हूं, लेकिन मैं किसी एक का पक्ष नहीं ले सकती।” साथ ही पेरेंट्स के लिए भी कुछ छोटे नियम तय किए जा सकते हैं, जैसकि– जिम्मेदारी के साथ सेल्फ-केयर भी जरूरी माता-पिता से मिलने के बाद अगर आपकी पुरानी भावनाएं और तनाव बढ़ जाते हैं, तो खुद की देखभाल को नजरअंदाज न करें। इसके अलावा सामान्य दिनों में भी अपने शरीर और मन की जरूरतों का ध्यान रखें, जैसेकि- अंतिम बात माता-पिता की परवाह करना और उनके रिश्ते की जिम्मेदारी उठाना दो अलग बातें हैं। आप उनकी मदद कर सकती हैं, लेकिन उनकी लड़ाइयों का बोझ अपने ऊपर लेना जरूरी नहीं। अपनी सीमाएं तय करना स्वार्थ नहीं है। आपका मानसिक स्वास्थ्य भी उतनी ही देखभाल का हकदार है। **************** ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा …………………… मेंटल हेल्थ की ये खबर भी पढ़िए मेंटल हेल्थ- बॉयफ्रेंड ने बिना कारण बताए ब्रेकअप कर लिया: तब से डिप्रेशन में हूं, उसे भूल नहीं पा रही, जिंदगी में आगे कैसे बढूं तीन साल का रिश्ता खत्म होने पर दुख होना स्वाभाविक है। यह किसी बेहद अपने को खोने जैसा अनुभव हो सकता है। इसके बाद मन में खालीपन, उदासी और बहुत सारे सवाल भी आ सकते हैं। पूरी खबर पढ़िए…

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डॉक्टर बनने का मौका छोड़ा, ट्रेनों में गाकर पैसे कमाए:‘विक्की डोनर’ से बदली किस्मत, आयुष्मान खुराना बोले- रिस्क लेकर यहां तक पहुंचा हूं

आयुष्मान खुराना आज बॉलीवुड के उन एक्टर्स में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी अलग तरह की फिल्मों से इंडस्ट्री में पहचान बनाई। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। चंडीगढ़ से निकले आयुष्मान ने थिएटर किया, रेडियो जॉकी बने, एमटीवी पर वीजे रहे और कई ऑडिशन दिए। उन्हें इंडियन आइडल-2 में भी रिजेक्शन मिला। 2012 में ‘विक्की डोनर’ से फिल्मी करियर शुरू हुआ। पहली फिल्म हिट हुई, लेकिन इसके बाद लगातार तीन फिल्में नहीं चलीं। फिर ‘दम लगा के हईशा’ से करियर ने दोबारा रफ्तार पकड़ी। इसके बाद ‘बरेली की बर्फी’, ‘शुभ मंगल सावधान’, ‘अंधाधुन’, ‘बधाई हो’, ‘आर्टिकल 15’, ‘ड्रीम गर्ल’ और ‘बाला’ जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। आज की सक्सेस स्टोरी में आयुष्मान खुराना के करियर और निजी जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें... चंडीगढ़ में हुआ जन्म, पिता ज्योतिषी आयुष्मान खुराना का जन्म 14 सितंबर 1984 को चंडीगढ़ में हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई चंडीगढ़ के सेंट जॉन्स हाई स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ से इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की और पंजाब यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन स्टडीज से पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उनके पिता पी. खुराना जाने-माने ज्योतिषी थे, जबकि मां पूनम खुराना ने हिंदी में एमए किया था। परिवार का माहौल पढ़ाई, साहित्य और कला से जुड़ा रहा। आयुष्मान ने कॉलेज के दिनों में थिएटर किया और दो थिएटर ग्रुप भी बनाए। डॉक्टर बनने का सपना था, डेंटिस्ट की सीट भी मिली थी एक्टिंग की दुनिया में आने से पहले आयुष्मान ने डॉक्टर बनने का सपना देखा था। उन्होंने 11वीं में साइंस ली थी और कर्नाटक के एक डेंटल कॉलेज में उन्हें सीट भी मिल गई थी। लेकिन तभी उनका रुझान थिएटर की तरफ बढ़ा। उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर आर्ट्स और थिएटर चुना। डीएवी कॉलेज में उन्होंने थिएटर ग्रुप बनाए और स्ट्रीट प्ले किए। थिएटर में काम करते हुए आयुष्मान ने सामाजिक मुद्दों को समझा। यही अनुभव आगे चलकर उनकी फिल्मों के विषयों में भी दिखाई दिया। रोडीज जीते, लेकिन तुरंत मुंबई नहीं आए 2004 में आयुष्मान ने एमटीवी रोडीज सीजन-2 जीता। इसके बाद उन्हें पहचान मिलने लगी, लेकिन उन्होंने तुरंत मुंबई जाकर फिल्मों में किस्मत नहीं आजमाई। पोस्ट ग्रेजुएशन के दौरान उन्होंने रेडियो में काम शुरू किया। बाद में वे एमटीवी के वीजे बने और कई शो होस्ट किए। फिल्मों में आने से पहले आयुष्मान ने अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान जैसे सितारों का इंटरव्यू भी लिया था। फिल्मफेयर को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि इन सितारों से बातचीत ने उन्हें समझने में मदद की कि स्टार भी आम इंसानों की तरह होते हैं। पिता ने कहा- अभी मुंबई जाओ, वरना दो साल नौकरी नहीं मिलेगी आयुष्मान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वह दो महीने का ब्रेक लेकर एक्टिंग की तैयारी करना चाहते थे। लेकिन उनके पिता ने उन्हें तुरंत मुंबई जाने के लिए कहा। आयुष्मान के मुताबिक, उनके पिता ने कहा था कि अगर अभी नहीं गए तो दो साल तक नौकरी नहीं मिलेगी। इसके बाद वह मुंबई आ गए। शुरुआती दिनों में उनके पास रहने की जगह भी नहीं थी। वह अपने डॉक्टर दोस्त के साथ केईएम हॉस्पिटल के हॉस्टल में रहे और ऑडिशन देते रहे। ट्रेन में गाने से कमाए पैसे फिल्म स्टार बनने से बहुत पहले आयुष्मान और उनके दोस्त ट्रेनों में परफॉर्म करते थे। उन्होंने बताया था कि कॉलेज के दौरान वे पश्चिम एक्सप्रेस में दोस्तों के साथ चढ़ते और अलग-अलग कोच में गाना-परफॉर्म करना शुरू कर देते थे। यात्रियों से मिलने वाले पैसे इकट्ठा किए जाते थे और आयुष्मान के मुताबिक, इतनी कमाई हो जाती थी कि दोस्तों ने उससे गोवा ट्रिप तक स्पॉन्सर की थी। इंडियन आइडल से भी हुए रिजेक्ट आयुष्मान का स्ट्रगल सिर्फ एक्टिंग ऑडिशन तक सीमित नहीं था। उन्होंने इंडियन आइडल-2 में भी हिस्सा लिया था, लेकिन उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि वह मुंबई राउंड तक पहुंचे थे और वहां उन्हें रिजेक्शन मिला। उनके मुताबिक, मुंबई आने से पहले भी उन्हें कई रिजेक्शन मिल चुके थे। 2012 में ‘विक्की डोनर’ पहली ही फिल्म ने बदल दी जिंदगी 2012 में आयुष्मान ने शूजित सरकार की ‘विक्की डोनर' से बॉलीवुड डेब्यू किया। फिल्म का विषय उस दौर के लिए काफी असामान्य था और आयुष्मान ने स्पर्म डोनर का किरदार निभाया। फिल्म सफल रही और आयुष्मान को रातोंरात पहचान मिली। उन्हें फिल्म के लिए बेस्ट मेल डेब्यू के साथ प्लेबैक सिंगिंग के लिए भी अवॉर्ड मिला। लेकिन पहली फिल्म की सफलता के बाद उनका सफर उतना आसान नहीं रहा, जितना बाहर से दिखाई देता था। पहली फिल्म के बाद लगातार तीन फ्लॉप, करियर पर लगा ब्रेक ‘विक्की डोनर’ के बाद आयुष्मान की ‘नौटंकी साला!’, ‘बेवकूफियां’ और ‘हवाईजादा’ बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाईं। खुद आयुष्मान ने माना कि ‘विक्की डोनर' के बाद वह काफी कन्फ्यूज थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि किस तरह की फिल्में करनी चाहिए। उन्होंने बाद में बताया कि तीन लगातार फिल्मों के अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के बाद उनका नजरिया बदला। ‘दम लगा के हईशा’ ने फिर बदली कहानी 2015 में आई ‘दम लगा के हईशा’ आयुष्मान के करियर का बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी। फिल्म में उन्होंने ऐसे लड़के का किरदार निभाया जो पढ़ाई में कमजोर है और जिसकी शादी उससे ज्यादा पढ़ी-लिखी और वजनदार लड़की से हो जाती है। फिल्म की कहानी आम बॉलीवुड रोमांस से अलग थी और आयुष्मान की परफॉर्मेंस को खूब सराहा गया। आयुष्मान बताते हैं कि ‘दम लगा के हईशा’ के आने के बाद उनके करियर की दिशा बदल गई। फिर शुरू हुआ अलग कहानियों का दौर इसके बाद आयुष्मान ने एक के बाद एक ऐसे विषय चुने, जिनसे मुख्यधारा के कई अभिनेता दूरी बनाते रहे। ‘बरेली की बर्फी’ में छोटे शहर की कहानी, ‘शुभ मंगल सावधान’ में इरेक्टाइल डिस्फंक्शन जैसा संवेदनशील विषय, 'अंधाधुन’ में ब्लाइंड पियानो प्लेयर, ‘बधाई हो’ में उम्रदराज माता-पिता की प्रेग्नेंसी, ‘आर्टिकल 15’ में जातिगत भेदभाव, ‘ड्रीम गर्ल’ में फोन पर लड़की की आवाज निकालने वाला युवक और 'बाला’ में समय से पहले बाल झड़ने की समस्या जैसे विषय सामने आए। यहीं से आयुष्मान की एक अलग तरह की फिल्मी पहचान बनने लगी। आयुष्मान कहते हैं कि उनका पूरा करियर रिस्क से बना है और वह सामान्य कमर्शियल फिल्म में खुद को आसानी से नहीं देख पाते। ‘अंधाधुन’ और ‘बधाई हो’ ने स्टारडम मजबूत किया 2018 आयुष्मान के करियर के सबसे महत्वपूर्ण सालों में रहा। ‘अंधाधुन’ ने उन्हें अभिनेता के तौर पर नई ऊंचाई दी, जबकि ‘बधाई हो’ ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की। ‘अंधाधुन’ ने भारत के अलावा चीन में भी जबरदस्त कारोबार किया। वहीं ‘बधाई हो’ ने भारत में 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का कलेक्शन किया। इसी दौर में आयुष्मान ने साबित किया कि कम बजट और असामान्य विषय वाली फिल्में भी दर्शकों तक पहुंच सकती हैं। पत्नी ताहिरा ने स्क्रिप्ट चुनने में निभाई अहम भूमिका आयुष्मान और ताहिरा कश्यप की मुलाकात किशोरावस्था में हुई थी और दोनों ने 2008 में शादी की। ताहिरा लेखक, निर्देशक और क्रिएटिव प्रोफेशनल हैं। आयुष्मान कई बार बता चुके हैं कि फिल्म साइन करने से पहले वह ताहिरा की राय लेते हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद वह ताहिरा को भी देते हैं। दोनों स्क्रिप्ट पर विस्तार से चर्चा करते हैं और मतभेद होने पर उसके फायदे-नुकसान देखते हैं। आयुष्मान ने ताहिरा को अपना ‘लाइफ कोच’ भी बताया है। सफलता के बाद भी फ्लॉप का दौर आया आयुष्मान के करियर में सिर्फ सफलता नहीं रही। ‘चंडीगढ़ करे आशिकी’, ‘अनेक’, ‘डॉक्टर जी’ और ‘एन एक्शन हीरो’ जैसी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी उनके सफल दौर में मिली थी। इससे साफ हुआ कि अलग विषय चुनने का मतलब हर बार बॉक्स ऑफिस सफलता की गारंटी नहीं है। लेकिन आयुष्मान ने अपने करियर की दिशा पूरी तरह नहीं बदली। उन्होंने अलग जॉनर और नए किरदार आजमाने जारी रखे। ‘हर फिल्म रिस्क थी, इसलिए अब डर नहीं सकता’ आयुष्मान के करियर की खास बात यही है कि उन्होंने शुरुआत ही एक रिस्की विषय से की थी। उनके शब्दों में- तक पहुंचा हूं, तो मैं डर नहीं सकता हूं। मेरी हर फिल्म रिस्क थी, शायद बाकी एक्टर्स के मुकाबले। मैं रिस्क लेकर यहां तक पहुंचा हूं, तो मैं डर नहीं सकता हूं।” यही सोच उनके करियर में बार-बार दिखाई देती है। कभी स्पर्म डोनर, कभी नपुंसकता से जूझता युवक, कभी अंधा पियानो प्लेयर, कभी जातिगत भेदभाव के खिलाफ खड़ा पुलिस अफसर और कभी माता-पिता की प्रेग्नेंसी से परेशान बेटा। 40 की उम्र के बाद भी प्रयोग जारी आयुष्मान ने उम्र बढ़ने के साथ अपने करियर का दायरा भी बढ़ाया है। ‘डॉक्टर जी’ और ‘एन एक्शन हीरो’ के बाद उन्होंने अलग जॉनर आजमाए। 2025 में वह ‘थामा' में नजर आए, जो मैडॉक फिल्म्स के हॉरर-कॉमेडी यूनिवर्स का हिस्सा थी। फिल्म में उनके साथ रश्मिका मंदाना, परेश रावल और नवाजुद्दीन सिद्दीकी थे। 2026 में भी उनका प्रयोग जारी है। उनकी आने वाली फिल्मों में ‘ये प्रेम मोल लिया’ और ‘उड़ता तीर’ शामिल हैं। ‘उड़ता तीर’ 9 अक्टूबर को रिलीज होगी। वहीं राजश्री प्रोडक्शन के बैनर तले बनी ‘ये प्रेम मोल लिया’ में आयुष्मान शरवरी वाघ के साथ नजर आएंगे। यह फिल्म 27 नवंबर को रिलीज होगी। इसका निर्देशन सूरज बड़जात्या ने किया है। एक्टिंग के साथ सिंगिंग में भी बनाई पहचान आयुष्मान खुराना की पहचान सिर्फ एक्टर के तौर पर नहीं है। वह अच्छे सिंगर भी हैं और कॉलेज के दिनों से संगीत उनके करियर का हिस्सा रहा है। उन्होंने डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान अपने दोस्त रोचक कोहली के साथ मिलकर ‘पानी दा रंग’ गाना लिखा और कंपोज किया था। यह गाना उन्होंने 2003 में लिखा था, लेकिन इसे रिलीज होने का मौका करीब 9 साल बाद मिला। 2012 में फिल्म ‘विक्की डोनर’ से आयुष्मान ने बॉलीवुड डेब्यू किया और इसी फिल्म के गाने ‘पानी दा रंग’ को अपनी आवाज भी दी। उन्होंने गाना सिर्फ गाया नहीं, बल्कि रोचक कोहली के साथ इसे कंपोज भी किया था। गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि आयुष्मान को फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर मिला। इसके बाद आयुष्मान ने ‘नौटंकी साला’, ‘बेवकूफियां’ जैसी फिल्मों के लिए भी प्लेबैक सिंगिंग की। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह खुद को ‘एक्टर-सिंगर’ मानते हैं और म्यूजिक को अपने करियर का समानांतर हिस्सा समझते हैं। आयुष्मान की संगीत की ट्रेनिंग भी रही है। उन्होंने बताया था कि वह बचपन से गाते थे और उन्हें वोकल ट्रेनिंग मिली थी, हालांकि यह ट्रेनिंग औपचारिक तरीके से नहीं हुई थी। उनके पिता भी संगीत में रुचि रखते थे और बांसुरी बजाते थे। ____________________________________ पिछले हफ्ते की सक्सेस स्टोरी पढ़ें.. पहली फिल्म बंद हुई, अंडे-शकरकंद खाकर गुजारा किया:सिद्धार्थ मल्होत्रा बोले- ढीठपन और अड़ियलपन ने बचाया, ‘शेरशाह’ ने दी नई पहचान दिल्ली के मिडिल क्लास, आर्मी-मर्चेंट नेवी बैकग्राउंड वाले परिवार से निकले सिद्धार्थ मल्होत्रा ने कभी खुलकर नहीं कहा था कि उन्हें एक्टर बनना है। स्कूल-कॉलेज में एमबीए और कॉर्पोरेट नौकरी का प्लान था, लेकिन अंदर छिपा एक्टर मॉडलिंग के रास्ते सामने आया। 21 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे तो फिल्म साइन होने के बावजूद प्रोजेक्ट बंद हो गया।पूरी खबर पढ़ें..

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1300 रुपये महीना कमा पाते थे पिता, मिठाई लिपटी अखबार से बदली लवलीना बोरगोहेन की जिंदगी, आज एशियन गेम्स में जीता गोल्ड

एशियन गेम्स 2026: लवलीना बोरगोहेन ने भारत को 12 साल महिला बॉक्सिंग में एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल दिलाया है. लवलीना से पहले मशहूर मुक्केबाज एमसी मेरीकॉम ने 2014 इंचियोन एशियाड में स्वर्ण पदक जीता था. आपको जानकर हैरानी होगी कि लवलीना ने अपने जन्मदिन के मौके पर फाइनल बाउट जीतने से साथ मौजूदा एशियाई खेलों में भारत के गोल्ड मेडल की संख्या 12 करवा दी. Fri, 2 Oct 2026 11:27:44 +0530

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