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Pakistan के साथ Mecca Pact Sign कर Saudi Arabia ने बड़ी गलती की, India से संबंध मजबूत किये होते तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता!

सऊदी अरब के लिए खतरे की घंटी अब मक्का तक पहुंच गई है। इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का में पहली बार संभावित हवाई हमले को लेकर आपात चेतावनी जारी होने और सायरन बजने से पूरी दुनिया में चिंता पैदा हो गई है। मक्का में हर साल दुनिया के कोने-कोने से लाखों मुसलमान पहुंचते हैं, इसलिए यहां मंडराता कोई भी सुरक्षा खतरा सिर्फ सऊदी अरब की चिंता नहीं रह जाता। हम आपको बता दें कि लोगों को घरों के भीतर जाने और खिड़कियों-दरवाजों से दूर रहने को कहा गया। जेद्दा और ताइफ में भी ऐसी ही चेतावनी जारी हुई। कुछ ही मिनटों में अलर्ट हटा लिया गया, लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया कि यमन के हूतियों से बढ़ता खतरा अब सऊदी अरब के बेहद संवेदनशील इलाकों तक पहुंच चुका है।

मक्का का नाम इस पूरे संकट को असाधारण रूप से संवेदनशील बना देता है। यह केवल सऊदी अरब का शहर नहीं, बल्कि इस्लाम का सबसे पवित्र धार्मिक केंद्र है। इसलिए यहां हवाई खतरे की चेतावनी ने सैन्य संकट को सीधे धार्मिक और राजनीतिक संकट में बदल दिया है। इस्लामी सहयोग संगठन ने मक्का और मदीना क्षेत्र पर हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि पवित्र स्थलों, मस्जिदों और नागरिक ढांचे को निशाना बनाना अस्वीकार्य है और उसने सऊदी अरब की सुरक्षा तथा पवित्र स्थलों की रक्षा के उपायों का समर्थन किया है।

इसे भी पढ़ें: Middle East Tension: मक्का के पास सऊदी एयर डिफेंस ने हूथी ड्रोन को किया ढेर, गठबंधन ने दी 'रेड लाइन' की सख्त चेतावनी

लेकिन असली तस्वीर मक्का से कहीं बड़ी है। हम आपको बता दें कि 12 सितंबर को यमन से दागा गया प्रक्षेपास्त्र सऊदी अरब के जाजान क्षेत्र में गिरा, जिसमें दो लोग घायल हुए और एक मस्जिद सहित कई इमारतों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। इसके अगले दिन सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ के नागरिक इलाकों पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमलों की बात कही। इन हमलों में 13 नागरिक घायल हुए और आवासीय मकानों तथा वाहनों को नुकसान पहुंचा। रियाद ने अब साफ संकेत दिया है कि लगातार हमलों का जवाब दिया जाएगा।

सबसे खतरनाक बात यह है कि हमला केवल शहरों पर नहीं हो रहा। सऊदी अरब की ऊर्जा व्यवस्था भी निशाने पर है। 11 सितंबर को इराक से हुए ड्रोन हमले के बाद करीब 1,200 किलोमीटर लंबी पूर्व-पश्चिम तेल पाइपलाइन को बंद करना पड़ा। यह पाइपलाइन प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल लाल सागर तक पहुंचाने में सक्षम है और होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी संकट के बीच सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता बन गई थी।

यही वह बिंदु है जहां संकट का सामरिक अर्थ साफ दिखाई देता है। यदि होर्मुज बाधित है और लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब-अल-मंदब पर भी हूतियों का दबदबा बढ़ता है, तो सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात के सुरक्षित रास्ते लगातार सिकुड़ते जाएंगे। यानी निशाना केवल रियाद नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा-आधारित आर्थिक शक्ति और पूरी वैश्विक आपूर्ति शृंखला है।

साथ ही हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर मोखा बंदरगाह और रणनीतिक पेरिम द्वीप पर कब्जा कर अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। इसके बाद हनीश द्वीपों पर भी उनकी पकड़ की खबरें सामने आईं। पेरिम द्वीप बाब-अल-मंदब के सबसे संकरे हिस्से में स्थित है और इस समुद्री मार्ग पर नियंत्रण का अर्थ लाल सागर में आने-जाने वाले जहाजों पर दबाव बनाने की क्षमता है। यह घटनाक्रम महज यमन के भूभाग की लड़ाई नहीं है। बाब-अल-मंदब लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री द्वार है। ऐसे में हूतियों की बढ़त सऊदी अरब के पश्चिमी तट, उसके तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार—तीनों पर एक साथ दबाव पैदा करती है।

देखा जाये तो यहां सऊदी अरब की कूटनीतिक रणनीति पर भी सवाल उठते हैं। पाकिस्तान के साथ ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के जरिए रियाद ने सामूहिक सुरक्षा का एक नया ढांचा खड़ा किया है, जिसमें एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना गया है। लेकिन यदि सऊदी अरब ने भारत के साथ सुरक्षा और सामरिक सहयोग को और अधिक गहरा किया होता, तो मौजूदा संकट में उसके पास एक अतिरिक्त और महत्वपूर्ण साझेदार हो सकता था। भारत और सऊदी अरब के बीच पहले से ही रक्षा, नौसैनिक सहयोग, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास मौजूद हैं। दूसरी ओर, भारत के ईरान और इजराइल के साथ भी ऐतिहासिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत की दोनों पक्षों के साथ संवाद की क्षमता सऊदी अरब के लिए एक अतिरिक्त कूटनीतिक और सामरिक सहारा बन सकती थी। फिर भी मौजूदा संकट यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या रियाद ने अपनी सुरक्षा साझेदारियों का दायरा जरूरत से ज्यादा सीमित कर दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि रियाद के सामने अब विकल्प कम हैं। सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार, विशाल आर्थिक संसाधन और मजबूत वायु रक्षा है, लेकिन हूतियों की रणनीति ने युद्ध को मुश्किल बना दिया है। छोटे ड्रोन, मिसाइल, समुद्री दबाव और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमले के जरिए अपेक्षाकृत कमजोर पक्ष भी भारी रणनीतिक लागत पैदा कर सकता है।

वैसे रियाद अब तक संयम बरतता रहा है। लेकिन पाइपलाइन पर हमला, लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले तथा बाब-अल-मंदब के आसपास हूतियों की बढ़त इस संयम की सीमा को चुनौती दे रहे हैं। अमेरिकी सहायता भी बढ़ी है। एक सौ से अधिक अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में खुफिया सूचना और लक्ष्य निर्धारण में सहायता कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने से बच रहा है। यही सबसे बड़ा रणनीतिक पेच है। सऊदी अरब पीछे हटता है तो हूतियों का दबदबा बढ़ सकता है; वह व्यापक सैन्य कार्रवाई करता है तो संघर्ष लंबा और अधिक विनाशकारी हो सकता है। विशेषज्ञों ने भी चेताया है कि बड़े पैमाने पर सऊदी जवाबी कार्रवाई संघर्ष को फिर एक खुले और लंबे युद्ध में बदल सकती है।

इसलिए मक्का की चेतावनी को केवल एक सुरक्षा अलर्ट समझना भारी भूल होगी। इसके पीछे एक बहुत बड़ा खेल दिखाई दे रहा है। जिसके तहत सऊदी शहरों पर दबाव बनाया जा रहा है, तेल की नस पर हमला हो रहा है और बाब-अल-मंदब जैसे समुद्री द्वार पर पकड़ हासिल की जा रही है। होर्मुज और बाब-अल-मंदब दोनों पर संकट गहराया तो इसका असर केवल सऊदी अरब या यमन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तेल, समुद्री व्यापार और विश्व अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा।

बहरहाल, मक्का तक पहुंचा खतरा इसलिए इस संघर्ष का नया मोड़ है। अब सवाल यह है कि सऊदी अरब कब तक अपनी सीमाओं, पवित्र स्थलों, तेल ढांचे और समुद्री हितों पर एक साथ पड़ते इस चौतरफा दबाव को सहन करेगा।

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Weather update: दिल्ली में 18 वर्षों का टूटा रिकॉर्ड, सितंबर के अंत में महसूस हुई कड़ाके की ठंड, पहाड़ी राज्यों में बढ़ी ठंड

देशभर में मानसून के अंतिम चरण और मौसम के बदलते चक्र ने एक नया रिकॉर्ड बना दिया है। पर्वतीय क्षेत्रों में हुई बेमौसम बर्फबारी और पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने के कारण उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में ठिठुरन अचानक बढ़ गई है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इस मौसमी बदलाव का सबसे ज्यादा असर देखने को मिला है, जहां तापमान में भारी गिरावट दर्ज होने से पिछले 18 वर्षों का रिकॉर्ड टूट गया है और सितंबर के महीने में ही लोगों को कड़ाके की ठंड का अहसास होने लगा है।

​जम्मू-कश्मीर में मौसम का मिजाज और बर्फबारी का असर 
जम्मू-कश्मीर के ऊपरी इलाकों में मौसम ने अचानक करवट ली है। प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों और पर्वतीय श्रृंखलाओं पर हल्की से मध्यम बर्फबारी दर्ज की गई है, जबकि मैदानी हिस्सों में लगातार बारिश हो रही है। इस बदलाव के कारण घाटी में ठंडी हवाएं चल रही हैं और तापमान सामान्य से काफी नीचे आ गया है, जिससे प्रशासन ने भी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जाने वाले लोगों और पर्यटकों के लिए चेतावनी जारी की है।

​हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पर्वतों पर बिछी बर्फ की सफेद चादर 
हिमाचल प्रदेश में भी मौसम के इस यू-टर्न ने लोगों को हैरान कर दिया है। राज्य के लाहुल-स्पीति, किन्नौर और कुल्लू की ऊंची पहाड़ियों पर बर्फबारी के बाद ठिठुरन बढ़ गई है। तापमान में आई भारी गिरावट के चलते स्थानीय लोगों ने गर्म कपड़े निकालने शुरू कर दिए हैं। इसके साथ ही, लगातार हो रही बारिश से कृषि और बागवानी फसलों को भी आंशिक नुकसान पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।

​उत्तराखंड में भारी बारिश, भूस्खलन और ठंड का प्रकोप 
देवभूमि उत्तराखंड में भारी बारिश और पर्वतीय इलाकों में बर्फबारी के कारण जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई जिलों में लगातार बारिश के चलते रास्तों पर भूस्खलन की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे यातायात बाधित हुआ है। चारधाम यात्रा के मार्गों पर भी सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं ताकि यात्रियों को किसी प्रकार की असुविधा या खतरे का सामना न करना पड़े।

​उत्तर प्रदेश में बारिश से आफत और मौसम विभाग का अलर्ट 
एक तरफ जहां पहाड़ी राज्यों में बर्फबारी और ठंड ने दस्तक दी है, वहीं उत्तर प्रदेश में मूसलाधार बारिश ने मुसीबतें खड़ी कर दी हैं। राज्य के कई जिलों में जलभराव और यातायात की समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अगले कुछ दिनों तक उत्तर भारत के इन सभी प्रभावित क्षेत्रों में मौसम खराब रहने और सतर्कता बरतने की सलाह दी है।

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