Pakistan के भीतर जाकर भारत ने किया आतंकवाद पर करारा प्रहार! Islamabad में SCO Meeting Attend कर India ने चल दिया बड़ा दाँव
भले ही भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी की तलवारें खिंची हुई हों, भले ही हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र के दौरान दोनों देशों के बीच चले वाकयुद्ध को पूरी दुनिया ने देखा हो, लेकिन भारत ने पाकिस्तान की अध्यक्षता में हुई शंघाई सहयोग संगठन यानि एससीओ की राष्ट्रीय समन्वयक बैठक में हिस्सा लेकर दुनिया को एक बड़ा कूटनीतिक संदेश दे दिया है। 28 से 30 सितंबर तक इस्लामाबाद में हो रही इस बैठक में भारत की ओर से संयुक्त सचिव आलोक डिमरी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पाकिस्तान की 2026-27 की अध्यक्षता में यह पहली बड़ी बैठक है, जिसमें संगठन के आगामी कार्यक्रमों और बैठकों का कैलेंडर तय किया जाना है। भारत की इस भागीदारी ने साफ कर दिया है कि नई दिल्ली बहुपक्षीय मंचों से पीछे हटने की बजाय वहां अपनी रणनीतिक मौजूदगी और प्रभाव को और मजबूत करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। साथ ही, आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत का कड़ा रुख भी बरकरार है।
हम आपको बता दें कि पाकिस्तान ने अपनी अध्यक्षता के लिए ‘दृष्टि को कार्रवाई में बदलना: संपर्क, नवाचार और साझा समृद्धि’ का विषय चुना है। इस एजेंडे के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्रीय संपर्क, आर्थिक सहयोग, नवाचार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने का संदेश देना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिस मंच को वह अपनी कूटनीतिक सक्रियता दिखाने के अवसर के रूप में पेश कर रहा है, उसी मंच पर भारत लगातार आतंकवाद के प्रश्न को केंद्रीय सुरक्षा मुद्दे के रूप में सामने रखता आया है।
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उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय स्तर पर लंबे समय से कोई सार्थक व्यापक संवाद नहीं है। इसके बावजूद भारत ने शंघाई सहयोग संगठन के बहुपक्षीय ढांचे को द्विपक्षीय विवादों से अलग रखा है। यही नई दिल्ली की कूटनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू है। पाकिस्तान के साथ सामान्य द्विपक्षीय संबंधों की बहाली और बहुपक्षीय मंच पर भारत की भागीदारी, दोनों को अलग-अलग रखा गया है।
यहीं पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती स्पष्ट होती है। इस्लामाबाद को एससीओ की अध्यक्षता मिली है, लेकिन भारत के साथ उसके संबंधों में वह परिस्थितियां अब भी मौजूद हैं जिनके कारण व्यापक द्विपक्षीय संवाद बंद पड़ा है। इसके बावजूद भारत पाकिस्तान की मेजबानी में होने वाली संगठनात्मक बैठकों में भाग लेकर यह संदेश दे रहा है कि बहुपक्षीय संस्थाओं को बंधक बनाकर द्विपक्षीय विवादों का समाधान नहीं किया जा सकता।
हम आपको यह भी बता दें कि भारत के एजेंडे में आतंकवाद का मुद्दा एक बार फिर सबसे ऊपर रहने वाला है। खास बात यह है कि इस बार जवाब पाकिस्तान की जमीन पर, उसी के मंच पर दिया जाएगा। पाकिस्तान जब एससीओ के क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी ढांचे की अध्यक्षता कर रहा है, तब भारत के लिए यह मंच इस्लामाबाद को आतंकवाद के सवाल पर सीधे घेरने का महत्वपूर्ण अवसर है। नई दिल्ली लगातार आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की मांग करती रही है। साथ ही भारत सीमा पार आतंकवाद तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई को पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की बुनियादी शर्त मानता है। ऐसे में एससीओ के मंच से पाकिस्तान में ही आतंकवाद का मुद्दा उठाना इस्लामाबाद के लिए कहीं अधिक कड़ा कूटनीतिक संदेश होगा।
साथ ही कनेक्टिविटी के सवाल पर भी भारत की स्थिति स्पष्ट है। नई दिल्ली एससीओ के संपर्क और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग से जुड़े प्रयासों का समर्थन करती है, लेकिन उसकी स्पष्ट शर्त है कि ऐसी कोई भी परियोजना सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन नहीं कर सकती। यानी भारत संपर्क के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह संपर्क के नाम पर विवादित क्षेत्रों अथवा संप्रभुता से जुड़े सिद्धांतों को दरकिनार करने के खिलाफ अपनी स्थिति कायम रखता है।
भारत की यही नीति पिछले वर्षों में भी दिखाई दी है। 2017 में एससीओ का पूर्ण सदस्य बनने के बाद भारत ने संगठन की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की। अक्टूबर 2024 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर पाकिस्तान में एससीओ के शासनाध्यक्षों की बैठक में शामिल हुए थे। जुलाई 2026 में भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल सीमा सुरक्षा से जुड़े एससीओ कार्यक्रम के लिए इस्लामाबाद गया था। भारतीय अधिकारी एससीओ के आतंकवाद-रोधी ढांचे से जुड़े अभ्यासों और विशेषज्ञ बैठकों में भी भाग लेते रहे हैं।
अब नजर 2027 पर है। पाकिस्तान अगस्त 2027 में इस्लामाबाद में एससीओ राष्ट्राध्यक्ष शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। पाकिस्तान ने संकेत दिया है कि संगठन के सभी सदस्य देशों के नेताओं को निमंत्रण दिया जाएगा, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे। लेकिन निमंत्रण मिलना और प्रधानमंत्री का पाकिस्तान जाना दो अलग-अलग विषय हैं।
हम आपको यह भी बता दें कि शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना 2001 में चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में पूर्ण सदस्य बने थे। बाद में ईरान और बेलारूस भी इसमें शामिल हुए। संगठन का दायरा सुरक्षा से लेकर आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय संपर्क और आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद के खिलाफ सहयोग तक फैला हुआ है।
बहरहाल, इस्लामाबाद की बैठक महज एक प्रशासनिक बैठक नहीं है। पाकिस्तान इसे अपनी अध्यक्षता के प्रभाव को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि भारत इसी मंच का इस्तेमाल अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं, आतंकवाद-विरोधी दृष्टिकोण और क्षेत्रीय संपर्क संबंधी सिद्धांतों को मजबूती से रखने के लिए कर रहा है। पाकिस्तान के सामने चुनौती यह है कि संगठन की अध्यक्षता उसके हाथ में होने के बावजूद भारत की भागीदारी उसकी शर्तों पर नहीं, बल्कि भारत की घोषित रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रही है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सामरिक और कूटनीतिक संदेश है।
-नीरज कुमार दुबे
Sun Images: क्या सूरज के रहस्य खुलने वाले हैं? पहली बार सामने आईं हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें, दिखे प्लाज्मा भंवर
Sun Surface Images: सूरज को इंसान सदियों से देखता आ रहा है, लेकिन उसकी सतह को इतनी बारीकी से पहले कभी नहीं देखा गया था। अब वैज्ञानिकों ने सूरज की सतह की बेहद हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें रिकॉर्ड की हैं, जिनमें पहली बार छोटे-छोटे घूमते हुए प्लाज्मा भंवर (Plasma Vortices) दिखाई दिए हैं। यह खोज सूरज से जुड़े सबसे बड़े वैज्ञानिक रहस्यों में से एक को समझने में अहम साबित हो सकती है।
पहली बार इतने करीब से दिखी सूरज की सतह
सूरज पृथ्वी से करीब 15 करोड़ किलोमीटर दूर है। इसका अत्यधिक तापमान और तेज रोशनी इसकी सतह का बारीकी से अध्ययन करना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। अब दुनिया के सबसे शक्तिशाली डेनियल के. इनोए सोलर टेलीस्कोप की मदद से वैज्ञानिकों ने सूरज की सतह की ऐसी तस्वीरें ली हैं, जिनमें बेहद छोटे-छोटे बदलाव भी साफ दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं तस्वीरों में पहली बार प्लाज्मा के सूक्ष्म भंवर रिकॉर्ड किए गए हैं।
आखिर क्या है सूरज का सबसे बड़ा रहस्य?
आमतौर पर किसी भी गर्म चीज से दूर जाने पर उसका तापमान कम होता जाता है, लेकिन सूरज के साथ ऐसा नहीं होता। सूरज की दिखाई देने वाली सतह, जिसे फोटोस्फीयर कहा जाता है, उसका तापमान लगभग 5,500 डिग्री सेल्सियस है।
वहीं, उसकी सबसे बाहरी परत कोरोना का तापमान 10 लाख डिग्री सेल्सियस या उससे भी ज्यादा होता है। यानी सतह से दूर जाने पर तापमान कम होने के बजाय कई गुना बढ़ जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है, यही सवाल पिछले कई दशकों से वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी पहेली बना हुआ है।
क्या हैं प्लाज्मा भंवर?
सूरज पर मौजूद पदार्थ सामान्य गैस नहीं, बल्कि बेहद गर्म और ऊर्जा से भरे कणों का मिश्रण होता है, जिसे प्लाज्मा कहा जाता है। जब इसकी तेज और धीमी धाराएं आपस में टकराती हैं, तो छोटे-छोटे घूमते हुए भंवर बनते हैं। वैज्ञानिक इन्हें केल्विन-हेल्महोल्ट्ज़ अस्थिरता (Kelvin-Helmholtz Instability) कहते हैं। ये भंवर सूरज की ऊर्जा को समझने की अहम कड़ी माने जा रहे हैं।
क्यों खास है यह खोज?
अब तक वैज्ञानिक इन भंवरों के बारे में सिर्फ कंप्यूटर मॉडल और गणितीय गणनाओं के आधार पर अनुमान लगाते थे। लेकिन पहली बार इन्हें वास्तविक तस्वीरों में देखा गया है।
इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि सूरज के अंदर ऊर्जा का प्रवाह कैसे होता है और उसका चुंबकीय क्षेत्र किस तरह काम करता है।
नई तस्वीरों में क्या दिखा?
नई हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरों में सूरज की सतह पर बेहद छोटे और घूमते हुए प्लाज्मा भंवर साफ दिखाई दे रहे हैं। ये संरचनाएं इतनी सूक्ष्म हैं कि पुराने टेलीस्कोप इन्हें रिकॉर्ड नहीं कर पाते थे। यही छोटी-छोटी संरचनाएं सूरज की ऊर्जा प्रणाली को समझने की सबसे अहम कड़ी साबित हो सकती हैं।
क्या अब सुलझेगा 70 साल पुराना रहस्य?
वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इस खोज पर और रिसर्च की जरूरत है। लेकिन पहली बार मिले इन प्रत्यक्ष सबूतों से उम्मीद बढ़ी है कि प्लाज्मा के ये सूक्ष्म भंवर ही सूरज के कोरोना की असामान्य गर्मी का राज खोलने में अहम कड़ी साबित हो सकते हैं।
सूरज की सतह से मिली नई तस्वीरों ने अंतरिक्ष विज्ञान को एक नई दिशा दी है। यह खोज न सिर्फ वैज्ञानिकों को सूरज की प्रक्रिया समझने में मदद करेगी, बल्कि बेहतर भविष्यवाणी और पृथ्वी की तकनीकी प्रणालियों को सुरक्षित रखने में भी अहम भूमिका निभा सकती है।
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