Flydubai विमान में सह-पायलट के हमले की UAE ने शुरू की उच्चस्तरीय जांच
दुबई, एक अक्टूबर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने बृहस्पतिवार को कहा कि उसने दुबई से तेल अवीव जा रही ‘फ्लाईदुबई’ की उड़ान में हुई उस घटना की जांच शुरू कर दी है, जिसके चलते विमान का रास्ता बदलना पड़ा था और उसे सऊदी अरब में उतरना पड़ा था। यूएई के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि संयुक्त अरब अमीरात ‘फ्लाईदुबई’ की एफजेड1073 उड़ान से जुड़ी घटना पर “बारीकी से नजर” रख रहा है, जिसे बुधवार को सऊदी अरब के तबुक हवाईअड्डे पर आपात स्थिति में उतारना पड़ा था। भारतीय पायलट स्मित मच्छार ने विमान को दुर्घटनाग्रस्त करने की सह-पायलट की कथित कोशिश नाकाम कर दी थी।
हालांकि, इस दौरान कॉकपिट में संघर्ष के दौरान सह-पायलट ने मच्छार को कथित तौर पर चाकू घोंप दिया था, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। विमान में 27 बच्चों समेत 174 यात्री सवार थे। बयान के मुताबिक, यूएई के अटॉर्नी-जनरल काउंसलर हमद अल शम्सी ने घटना के पीछे के हालात और कारणों की जांच के लिए लोक अभियोजन के विशेषज्ञ सदस्यों वाली एक टीम गठित करने का आदेश दिया है।
यह घटनाक्रम ‘फ्लाईदुबई’ की इस घोषणा के बाद आया है कि विमान के कॉकपिट में हाथापाई की घटना हुई थी, जिसके बाद उसमें मौजूद चालक दल के सदस्यों को दखल देना पड़ा और विमान को सुरक्षित करना पड़ा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि लागू कानूनों के अनुसार, मामले की जांच यूएई के न्यायिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आती है, क्योंकि विमान यूएई में पंजीकृत है और उस पर यूएई का झंडा लगा हुआ है। उसने कहा कि विमान में हुए आपराधिक कृत्यों पर यूएई का कानून लागू होता है, भले ही वे देश की सीमा के बाहर हुए हों।
दुबई में स्थित ‘फ्लाईदुबई’ यूएई सरकार के स्वामित्व वाली एक प्रमुख विमानन कंपनी है। मंत्रालय ने कहा कि जांच अधिकारी घटना से जुड़ी सभी परिस्थितियों और वजहों की पड़ताल कर रहे हैं, जिसमें आतंकवादी गतिविधि या मंशा से संभावित संबंध के अलावा यह भी शामिल है कि क्या इसके लिए पहले से कोई योजना बनाई गई थी या निर्देश दिए गए थे। यूएई ने घटना से निपटने में सहयोग के लिए सऊदी अधिकारियों की तारीफ भी की।
सरकारी समाचार एजेंसी ‘डब्ल्यूएएम’ की खबर के मुताबिक, जांच टीम ने सामान्य नागरिक उड्डयन प्राधिकरण (जीसीएए) और संबंधित अधिकारियों के साथ समन्वय में अपना काम शुरू कर दिया है। खबर के अनुसार, अल शम्सी ने अधिकारियों को घटना से जुड़ी परिस्थितियों और मकसद की जांच करने का निर्देश दिया है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि “कहीं इसका संबंध किसी आतंकवादी गतिविधि या मंशा से तो नहीं है, या फिर इसमें पहले से कोई योजना या निर्देश तो शामिल नहीं थे।” खबर में कहा गया है कि विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक स्रोतों से मिली जानकारी और डेटा पर भरोसा करने तथा जांच पूरी होने तक अटकलों या अविश्वसनीय जानकारी को फैलाने से बचने के महत्व पर भी जोर दिया है। अधिकारियों ने बताया कि विमान सऊदी अरब के तबुक हवाई अड्डे पर सुरक्षित उतार लिया गया।
उन्होंने बताया कि इसका सह-पायलट ओमान का नागरिक बताया जा रहा है और उसे गिरफ्तार कर पूछताछ शुरू कर दी गई है।
दमोह में निजी भूमि पर नए SDM दफ्तर का निर्माण, कलेक्टर ने जांच के दिए निर्देश, दोषी अधिकारियों से वसूली जाएगी खर्च राशि
दमोह: मध्यप्रदेश के दमोह जिले से सरकारी निर्माण में बड़ी लापरवाही का मामला सामने आया है। जहां करीब 1 करोड़ 35 लाख रुपए की लागत से स्वीकृत एसडीएम कार्यालय भवन का निर्माण निजी जमीन पर करा दिया गया। आरोप है कि भवन निर्माण शुरू होने से पहले भूमि के स्वामित्व और जरूरी दस्तावेजों का उचित सत्यापन नहीं किया गया था।
बता दें कि यह मामला जिले की तेंदूखेड़ा तहसील का है। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा की जबलपुर हाईकोर्ट तक जा पहुंचा। इतना ही नहीं, कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने इस संबंध में कार्रवाई करते हुये विवादित भूमि पर निर्माण कार्य एवं किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप पर रोक लगाते हुए संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकारी भवन का करीब 30-40 प्रतिशत काम पूरा हो चुका था। तो इसमें खर्च हुई सरकारी राशि का हिसाब कौन देगा? इस पर कलेक्टर ने निर्माण में खर्च हुई शासकीय राशि की जांच कर दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों से ही वसूली के निर्देश दिए गए हैं।
बिना दस्तावेज सत्यापन के कैसे शुरू हुआ निर्माण कार्य?
बता दें कि तेंदूखेड़ा के खसरा नंबर 170, रकबा 0.2590 हैक्टेयर भूमि से संबंधित है। राजस्व अभिलेखों के अनुसार यह जमीन निजी भू-स्वामी के नाम दर्ज बताई गई है और अब इसी जमीन पर नए एसडीएम दफ्तर का निर्माण कार्य भी शुरू करा दिया गया। आरोप है कि आवश्यक दस्तावेजों और एनओसी की जांच किए बिना ही निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई। खास बात तो यह है कि सरकारी भवन का निर्माण किसी प्लॉट या बंजर जमीन पर नहीं, बल्कि खेती की जमीन पर शुरू कर दिया। कलेक्टर ने जब इसकी जांच के आदेश दिये तो सामने आया कि सच में सरकारी भवन का निर्माण कार्य निजी जमीन पर कराया गया है। इसके बाद सवाल उठता है कि किन दस्तावेजों के आधार पर इस कार्य शुरू कराया गया था।
इस मामले में जमीन के मालिक ने 3 दिसंबर 2025 को कलेक्टर कार्यालय में शिकायत देकर एक आपत्ति दर्ज कराई थी। लेकिन कलेक्टर कार्यालय की ओर से भी समस्या का कोई निराकरण नहीं हुआ। इसके बाद मालिक ने हाईकोर्ट में न्याय की गुहार लगाई। इस संबंध में हाईकोर्ट ने मार्च 2026 को कलेक्टर को मामले में तय समय-सीमा में निराकरण करने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद मामला अवमानना याचिका तक पहुंच गया। अवमानना की कार्रवाई के बाद जिला प्रशासन ने राजस्व प्रकरण में सुनवाई कर मामले के निराकरण की प्रक्रिया तेज की। सुनवाई के बाद कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने 12 अगस्त को स्पीकिंग ऑर्डर जारी किया। इसके बाद 27 अगस्त को विवादित भूमि और निर्माण से जुड़े मामले में आगे की कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए।
निर्माण से पहले भूमि स्वामित्व और दस्तावेजों के सत्यापन पर सवाल
जानकारी के अनुसार, निजी भूमि पर किसी भी प्रकार के निर्माण या हस्तक्षेप पर रोक लगाने के साथ ही संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच और विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। अब यह सवाल उठ रहा है कि सरकारी भवन के निर्माण के लिए निजी भूमि का चयन किस आधार पर किया गया और निर्माण शुरू होने से पहले भूमि के स्वामित्व तथा आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन क्यों नहीं किया गया? निजी भूमि पर निर्माण शुरू किए जाने के कारण अब तक इस कार्य पर खर्च की गई शासकीय राशि भी जांच के दायरे में आ गई है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भूमि चयन, दस्तावेजों के सत्यापन और निर्माण की प्रक्रिया में किन स्तरों पर लापरवाही हुई।
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