कर्नाटक में महंगी दवाओं की कीमतों में बड़ा अंतर उजागर, सरकार ने केंद्र से हस्तक्षेप की मांग की
बेंगलुरु, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। कर्नाटक सरकार ने महंगी दवाओं, कैंसर की दवाओं, एंटीबायोटिक्स, मेडिकल उपकरणों और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की संस्थागत खरीद कीमत और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच बड़े अंतर का मुद्दा उठाया है। कुछ उत्पादों का एमआरपी उनकी लैंडिंग कॉस्ट से 50 गुना से भी अधिक पाया गया है।
कर्नाटक गृह मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) कर्नाटक ने हाल में कैंसर मरीजों का इलाज करने वाले अस्पतालों और अन्य प्रतिष्ठानों के निरीक्षण के दौरान यह स्थिति सामने आने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) के समक्ष मामला उठाया है। राज्य ने मरीजों से अत्यधिक बिल वसूली रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है।
विभाग के अनुसार, कुछ दवा कंपनियां अस्पतालों को भारी छूट के साथ संस्थागत कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराती हैं, लेकिन मरीजों से इन दवाओं के लिए प्रिंटेड एमआरपी या उसके आसपास की राशि वसूली जाती है। जांच में ऐसी कीमतों में अत्यधिक अंतर वाली 253 दवाओं की पहचान की गई है।
उदाहरण के तौर पर, क्रिटिकेयर की ओर से सप्लाई की जाने वाली गुफीपोल की लैंडिंग कॉस्ट 86 रुपये थी, जबकि इसका एमआरपी 4,528 रुपये पाया गया। यानी दोनों कीमतों में 52.6 गुना का अंतर था। इसी तरह गुफीसाइक्लिन-50 इंजेक्शन की लैंडिंग कॉस्ट 160 रुपये और एमआरपी 7,110 रुपये था, जो 44.4 गुना का अंतर है।
इसी तरह टर्लिटिस की लैंडिंग कॉस्ट 118 रुपये के मुकाबले एमआरपी 4,416 रुपये था, जबकि टैक्सोकेयर 120 एमजी की खरीद कीमत 1,000 रुपये और एमआरपी 21,617 रुपये दर्ज किया गया।
निरीक्षण के दौरान कैनमैब 440 एमजी की लैंडिंग कॉस्ट 6,600 रुपये और एमआरपी 57,457 रुपये पाया गया। वहीं, बेवाटास 400 एमजी इंजेक्शन की खरीद कीमत 5,850 रुपये थी, जबकि इसका एमआरपी 62,690 रुपये था।
अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री में भी इसी तरह का अंतर पाया गया। एक एडल्ट नेबुलाइजर मास्क की लैंडिंग कॉस्ट 44.50 रुपये थी, जबकि उसका एमआरपी 950 रुपये था। इसी तरह 14.75 रुपये में खरीदे गए एक आईवी सेट का एमआरपी 295 रुपये था।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. खादर ने 23 सितंबर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने संस्थागत कीमतों पर खरीदी गई दवाओं, मेडिकल उपकरणों और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के लिए मरीजों से अत्यधिक बिल वसूली पर रोक लगाने के उपाय करने का आग्रह किया।
राज्य सरकार ने मरीजों के बिल में लैंडिंग कॉस्ट और एमआरपी दोनों का अनिवार्य रूप से उल्लेख करने, ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) के तहत मूल्य-नियंत्रित दवाओं का दायरा बढ़ाने और जरूरी महंगी दवाओं व मेडिकल सामग्री पर ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित करने का प्रस्ताव दिया है।
इसके अलावा इस मुद्दे के अध्ययन के लिए अंतर-मंत्रालयी विशेषज्ञ समूह गठित करने की भी मांग की गई है। राज्य ने दवा (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 में संशोधन, ट्रेड मार्जिन को तर्कसंगत बनाने, लागत से एमआरपी तक पारदर्शिता सुनिश्चित करने, नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन्स का दायरा बढ़ाने तथा ऑडिट और प्रवर्तन तंत्र तैयार करने का भी सुझाव दिया है।
एफडीए और ड्रग्स एनफोर्समेंट अधिकारियों ने 25 और 26 सितंबर को बेंगलुरु समेत कर्नाटक के विभिन्न जिलों में थोक प्रतिष्ठानों, अस्पतालों और अन्य संस्थानों में विशेष सत्यापन अभियान चलाया। इस दौरान 768 से अधिक कंज्यूमेबल आइटम और 189 महंगी दवाओं की जांच की गई। इसके निष्कर्ष केंद्र सरकार को सौंपे जाएंगे।
विभाग ने बताया कि यह सत्यापन अभियान चरणबद्ध तरीके से जारी रहेगा। अगले चरण में एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं, महत्वपूर्ण और नई पीढ़ी की एंटीबायोटिक्स, मेडिकल उपकरणों तथा अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली ऐसी सामग्री पर ध्यान दिया जाएगा, जिनका मरीजों पर बड़ा वित्तीय प्रभाव पड़ता है।
कर्नाटक सरकार ने कहा कि वह स्वास्थ्य सेवाओं की बिलिंग में पारदर्शिता बढ़ाने और मरीजों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने के प्रयास जारी रखेगी।
--आईएएनएस
डीएससी
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