Supreme Court ने Ahmedabad Blast मामले में इंडियन मुजाहिदीन दोषी की फांसी पर लगाई रोक
नयी दिल्ली, एक अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में इंडियन मुजाहिदीन के एक सदस्य की मौत की सजा के अमल पर बृहस्पतिवार को रोक लगा दी। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हो गई थी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ए. जी. मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने अहमद बावा उर्फ अब्बू अबुबकर बरेलवी की याचिका पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया।
बरेलवी ने अपनी याचिका में उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें निचली अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सजा को बरकरार रखा गया था। शीर्ष अदालत ने मामले से संबंधित निचली अदालत के रिकॉर्ड तलब किए और फांसी की सजा पर रोक लगा दी। मामले में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह एक गंभीर मामला है।
उच्च न्यायालय ने 2008 के अहमदाबाद सिलसिलेवार बम धमाका मामले में इंडियन मुजाहिदीन के 38 दोषियों की मौत की सजा सात जुलाई को बरकरार रखी थी। अदालत ने बड़ी संख्या में हुई मौतों, ‘बहुत बड़ी साजिश’ और व्यापक स्तर पर आतंक फैलाने की मंशा को सजा बरकरार रखने के प्रमुख कारणों में शामिल किया था। उसने 11 अन्य दोषियों को दी गई उम्रकैद की सजा भी बरकरार रखी थी और माना था कि गुजरात और केरल में आतंकवादी प्रशिक्षण शिविरों में उनकी भूमिका तथा साजिश के लिए रसद संबंधी सहायता उपलब्ध कराने की बात अभियोजन पक्ष ने साबित की थी।
अहमदाबाद के विभिन्न इलाकों में 26 जुलाई 2008 को करीब 70 मिनट के भीतर 21 सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इनमें 56 लोगों की मौत हुई और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे। धमाकों के बाद घायलों को इलाज के लिए ले जाए जा रहे अस्पतालों में भी विस्फोट हुए थे।
यह भारत में किसी आतंकवादी हमले के दौरान चिकित्सा केन्द्रों को निशाना बनाए जाने की पहली ऐसी घटना थी। दोषियों में प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया के पूर्व नेता सफदर नागौरी और गुजरात, मध्य प्रदेश, केरल तथा उत्तर प्रदेश समेत 11 राज्यों के उसके सहयोगी शामिल हैं। इस मामले में 35 पुलिस मामलों को एक साथ मिलाए जाने के बाद 78 लोगों पर मुकदमा चला था।
इनमें अहमदाबाद धमाकों से संबंधित 20 प्राथमिकी और सूरत में बरामद किए गए बिना फटे बमों से जुड़े 15 मामले शामिल थे। विशेष अदालत ने इनमें से 49 लोगों को दोषी ठहराया था। विशेष अदालत का फरवरी 2022 का फैसला इस लिहाज से ऐतिहासिक था कि किसी एक मामले में एक साथ 38 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई थी।
e-Challan बकाया होने पर नहीं बनेगा PUC, बार-बार नियम तोड़े तो Driving License होगा सस्पेंड
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को निर्देश दिया कि वे उन मामलों में ऑनलाइन और वाहन से जुड़ी अन्य सेवाओं को रोक दें, जहां ट्रैफिक जुर्माना नहीं भरा गया है। इन सेवाओं में रजिस्ट्रेशन का रिन्यूअल, फिटनेस और प्रदूषण नियंत्रण सर्टिफिकेट (PUC) जारी करना, मालिकाना हक का ट्रांसफर और ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूअल भी शामिल है। यह कदम सड़क सुरक्षा कानूनों के इलेक्ट्रॉनिक तरीके से पालन को और असरदार बनाने की देशव्यापी कोशिश का हिस्सा है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि जिन गाड़ियों पर ई-चालान बकाया हैं, उन्हें सेंट्रल परिवहन पोर्टल पर ब्लैकलिस्ट किया जाए, ताकि उनकी बिक्री या ट्रांसफर को रोका जा सके। साथ ही, जब तक ट्रैफिक से जुड़े बकाया जुर्माने नहीं भरे जाते, तब तक किसी भी सेंटर को PUC सर्टिफिकेट जारी करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए। एक से ज़्यादा उल्लंघन के मामलों में, अधिकारियों से कहा गया है कि वे ड्राइविंग लाइसेंस के रिन्यूअल को रोक दें और मौजूदा लाइसेंस को सस्पेंड करने के लिए कदम उठाएं।
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बेंच ने कहा कि हज़ारों या लाखों ई-चालान जारी करने का तब तक कोई खास फ़ायदा नहीं है, जब तक अधिकारी जुर्माना वसूल न कर लें। कोर्ट को बताया गया कि कुछ समय के दौरान जारी किए गए ई-चालान के तहत लगभग ₹49,194.05 करोड़ बकाया थे, जिनमें से अब तक ₹26,175.05 करोड़ वसूल किए जा चुके हैं। इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि अधिकारियों को ज़मीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए ज़मीनी स्तर पर काम करना होगा। इसमें कहा गया जुर्माने वगैरह की वसूली को असरदार ढंग से लागू करने के लिए अधिकारियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे उन गाड़ियों की ऑनलाइन सेवाओं को रोक दें जिन पर बकाया राशि है। अधिकारी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट को रिन्यू करने या डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी करने से रोकेंगे और मालिक का पता वगैरह अपडेट करने की किसी भी रिक्वेस्ट पर विचार नहीं करेंगे। जब तक सभी पेंडिंग ट्रैफिक जुर्माने पूरी तरह से चुका नहीं दिए जाते, तब तक अधिकारी फिटनेस सर्टिफिकेट भी नहीं देंगे और साथ ही संबंधित गाड़ी को 'परिवहन पोर्टल' पर ब्लैकलिस्ट भी किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि कई बार नियम तोड़ने पर ड्राइविंग लाइसेंस का रिन्यूअल रोक दिया जाएगा और जो लाइसेंस अभी चालू हैं, उन्हें भी सस्पेंड करने के उपाय किए जाएंगे। आदेश में यह भी कहा गया, "सबसे ज़रूरी बात यह है कि किसी भी सेंटर को PUC सर्टिफ़िकेट जारी करने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए। यह आदेश 2012 के सड़क सुरक्षा मामले में आया है, जिसमें बेंच लगभग 14 सालों से मोटर व्हीकल एक्ट और सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स को लागू करने की निगरानी कर रही है। जजों ने चिंता जताई कि अगर अधिकारी ज़मीनी स्तर पर निर्देशों को लागू करने में नाकाम रहते हैं, तो ये निर्देश सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रह सकते हैं।
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इलेक्ट्रॉनिक एनफोर्समेंट
कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिया कि वे सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा 28 अक्टूबर, 2025 को तैयार की गई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को तुरंत लागू करें और मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 की धारा 136A तथा सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स के नियम 167A का पालन करें। इन नियमों के तहत स्पीड कैमरे, CCTV कैमरे और स्पीड गन जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके सड़क सुरक्षा की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी और नियमों को लागू करना ज़रूरी है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया है कि वे ई-एनफोर्समेंट साइट्स की जानकारी दें और एनफोर्समेंट डिवाइस की खरीद, उन्हें लगाने और कैलिब्रेशन का काम पूरा करें। साथ ही, नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड को इसके लागू होने की निगरानी करने का निर्देश दिया गया है। यह बात ज़ोर देकर कही गई कि इलेक्ट्रॉनिक एनफोर्समेंट सिर्फ़ ई-चालान जारी करने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए; इसलिए गाड़ियों की रैंडम चेकिंग का निर्देश दिया गया। साथ ही कहा गया कि अगर किसी गाड़ी पर ऐसा ई-चालान बकाया पाया जाता है जिसका भुगतान नहीं किया गया है, तो अधिकारियों को उसे ज़ब्त करने के लिए ज़रूरी कदम उठाने चाहिए। बेंच ने संशोधित नियम 21(25) पर भी ध्यान दिया, जो 2026 में लागू हुआ था। इसके तहत, एक साल के अंदर मोटर व्हीकल एक्ट या नियमों के तहत पाँच या उससे ज़्यादा अपराध या उल्लंघन करना जनता के लिए परेशानी या ख़तरे का कारण माना जाता है।
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