HTET Revised Result 2026: हरियाणा TET का रिवाइज्ड रिजल्ट जारी, bseh.org.in से ऐसे करें डाउनलोड
बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन हरियाणा (BSEH) ने हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा (HTET) 2026 का रिवाइज्ड रिजल्ट जारी कर दिया है। परीक्षा में शामिल उम्मीदवार अब बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट bseh.org.in पर जाकर अपना संशोधित परिणाम चेक और डाउनलोड कर सकते हैं। उम्मीदवारों को रिवाइज्ड रिजल्ट देखने के लिए अपने रजिस्ट्रेशन नंबर और जन्मतिथि की जरूरत होगी।
इससे पहले बोर्ड ने HTET Result 2026 का परिणाम 5 अगस्त 2026 को जारी किया था। इसके बाद 22 अगस्त 2026 को स्कोरकार्ड उपलब्ध कराया गया था। अब बोर्ड ने संशोधित परिणाम जारी किया है।
HTET Revised Result 2026 कैसे डाउनलोड करें?
उम्मीदवार नीचे दिए गए आसान स्टेप्स की मदद से अपना रिवाइज्ड रिजल्ट चेक कर सकते हैं।
- सबसे पहले BSEH की आधिकारिक वेबसाइट bseh.org.in पर जाएं।
- होम पेज पर दिए गए Result सेक्शन पर क्लिक करें।
- अब HTET Revised Result 2026 से संबंधित लिंक पर क्लिक करें।
- इसके बाद मांगी गई लॉगिन डिटेल दर्ज करें।
- लॉगिन करने के बाद आपका संशोधित रिजल्ट स्क्रीन पर दिखाई देगा।
- रिजल्ट को डाउनलोड कर लें।
- भविष्य के लिए इसका प्रिंटआउट निकालकर सुरक्षित रख लें।
जुलाई में हुई थी हरियाणा TET परीक्षा
हरियाणा शिक्षक पात्रता परीक्षा 2026 का आयोजन 4 और 5 जुलाई 2026 को किया गया था। परीक्षा के बाद 6 जुलाई 2026 को प्रोविजनल आंसर-की जारी की गई थी।
उम्मीदवारों से प्राप्त आपत्तियों के निस्तारण के बाद बोर्ड ने फाइनल आंसर-की और रिजल्ट 5 अगस्त 2026 को जारी किया था। अब संशोधित परिणाम जारी किया गया है।
2.33 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने कराया था रजिस्ट्रेशन
HTET 2026 के लिए करीब 2,33,294 उम्मीदवारों ने रजिस्ट्रेशन कराया था। इनमें से 1,92,220 उम्मीदवार परीक्षा में शामिल हुए थे।
रिवाइज्ड रिजल्ट जारी होने के बाद उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अपने संशोधित परिणाम को ध्यान से चेक करें और भविष्य की जरूरत के लिए इसकी कॉपी सुरक्षित रखें।
Shardiya Navratri 2026: रावण से युद्ध से पहले श्रीराम ने क्यों की थी मां दुर्गा की पूजा?
शारदीय नवरात्रि केवल नौ दिनों के व्रत, पूजा और गरबा-डांडिया तक सीमित पर्व नहीं है। धार्मिक परंपराओं में इसे शक्ति की उपासना और बुराई पर अच्छाई की विजय से भी जोड़ा जाता है। इसी परंपरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीराम और रावण के युद्ध की है।
मान्यता के अनुसार, लंका पर निर्णायक चढ़ाई और रावण से युद्ध से पहले भगवान श्रीराम ने शरद ऋतु में मां दुर्गा का विशेष आह्वान किया था। धार्मिक कथाओं में देवी की इस असमय की गई आराधना को ‘अकाल बोधन’ कहा गया है।
क्या होता है अकाल बोधन?
‘अकाल बोधन’ का सामान्य अर्थ है निर्धारित या सामान्य समय से पहले देवी का जागरण या आह्वान। धार्मिक परंपरा के अनुसार देवी की उपासना का प्रमुख समय वसंत ऋतु यानी चैत्र नवरात्रि से जुड़ा माना जाता था।
कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम रावण के साथ निर्णायक युद्ध की तैयारी कर रहे थे, तब उन्होंने शरद ऋतु में ही मां दुर्गा का आह्वान किया। इसी कारण शरद ऋतु में की गई इस विशेष देवी साधना को ‘अकाल बोधन’ कहा गया।
बंगाल की कृतिवासी रामायण से जुड़ी परंपरा में श्रीराम द्वारा शरद ऋतु में देवी की आराधना का विशेष वर्णन मिलता है। इसी कथा को बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा में भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
रावण के सामने श्रीराम को क्यों करनी पड़ी देवी की आराधना?
धार्मिक कथाओं में रावण को अत्यंत शक्तिशाली बताया गया है। वह भगवान शिव का परम भक्त था और उसे कई दिव्य शक्तियां तथा वरदान प्राप्त थे। कृतिवासी रामायण से जुड़ी कथा-परंपरा में रावण की देवी आराधना और देवी की कृपा का भी उल्लेख मिलता है।
इसी पौराणिक प्रसंग में श्रीराम के सामने यह चुनौती बताई गई है कि रावण से युद्ध में केवल शस्त्रबल ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि देवी शक्ति का आशीर्वाद भी आवश्यक है।
मान्यता के अनुसार, ब्रह्मा जी ने श्रीराम को देवी की आराधना करने की सलाह दी। इसके बाद श्रीराम ने शरद ऋतु में मां दुर्गा का विशेष बोधन और पूजन करने का संकल्प लिया।
108 नीलकमल की कथा क्या है?
अकाल बोधन की कथा का सबसे भावुक प्रसंग 108 नीलकमल से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने मां दुर्गा की पूजा के लिए 108 नीलकमल एकत्र किए और उन्हें देवी को अर्पित करने का संकल्प लिया। पूजा शुरू हुई और श्रीराम एक-एक करके नीलकमल देवी को अर्पित करने लगे।
कथा के अनुसार, देवी ने श्रीराम की भक्ति और संकल्प की परीक्षा लेने के लिए एक नीलकमल छिपा दिया। जब श्रीराम ने कमलों की गिनती की तो एक कमल कम निकला। अब उनके सामने समस्या थी कि 108 नीलकमल के बिना पूजा का संकल्प पूरा कैसे होगा?
जब श्रीराम ने नेत्र अर्पित करने का संकल्प लिया
भगवान श्रीराम को ‘कमलनयन’ भी कहा जाता है। उनके नेत्रों की तुलना कमल से की जाती है। जब उन्हें पूजा के लिए एक नीलकमल नहीं मिला तो उन्होंने अपना नेत्र ही देवी को अर्पित करने का संकल्प लिया।
कथा के अनुसार, श्रीराम ने अपना नेत्र निकालकर मां दुर्गा को अर्पित करने की तैयारी की। उनके इस अद्वितीय समर्पण और भक्ति से देवी प्रसन्न हो गईं। मां दुर्गा ने श्रीराम को रोक दिया और उनकी पूजा स्वीकार करते हुए उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया।
इसके बाद हुआ रावण का वध
मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा के आशीर्वाद के बाद भगवान श्रीराम ने रावण के साथ निर्णायक युद्ध किया और उसका वध किया। इसी विजय को आगे चलकर बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही कारण है कि शारदीय नवरात्रि के बाद आने वाली विजयादशमी को धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है।
अकाल बोधन की यह कथा केवल श्रीराम की विजय की कहानी नहीं है, बल्कि इसे भक्ति, संकल्प और शक्ति उपासना के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। 108 नीलकमल का प्रसंग यह संदेश देता है कि जब संकल्प अटूट हो और समर्पण पूर्ण हो, तो भक्त अपने लक्ष्य के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने को भी तैयार रहता है
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