मजरूह सुल्तानपुरी, जिन्हें नेहरू के खिलाफ लिखने पर जेल हुई:पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा..., पहला नशा..., जैसे दर्जनों गाने लिखे, आखिरी गाना शाहरुख पर
‘मैं अकेले ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।’ इन पंक्तियों को सुनकर लगता है कि इन्हें लिखने वाला शख्स शायद जिंदगी की गहराइयों में डूबा कोई बेहद संजीदा और गंभीर शायर होगा। लेकिन यही मजरूह जब फिल्मों के लिए लिखने बैठे, तो उनकी कलम ने मोहब्बत के ऐसे रंग बिखेरे कि शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान के गाने सालों साल याद गिए गए। ‘पहला नशा… पहला खुमार…’, ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा…’, ‘साथिया तूने क्या किया…’, और ‘ऐ काश कि हम होश में अब आने न पाएं…’ ये सिर्फ गाने नहीं, बल्कि ऐसी धुनें हैं जिनके साथ कई पीढ़ियों की मोहब्बत, जवानी और यादें जुड़ी हुई हैं। उनके सदाबहार गीतों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि उसे गिनते-गिनते शाम हो जाए। ‘आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा’ (तीसरी मंजिल, 1966) से लेकर ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ (यादों की बारात, 1973) तक, मजरूह की कलम ने हिंदी सिनेमा को दर्जनों ऐसे गीत दिए, जो वक्त बदलने के बावजूद पुराने नहीं पड़े। उनकी कलम में बगावत की स्याही भी थी। 1949 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ‘हिटलर का चेला’ कहने पर जेल में डाला गया। विकल्प मिला- माफी मांगो या दो साल जेल में रहो। उन्होंने जेल चुनी। 1 अक्टूबर 1919 को जन्मे मजरूह सुल्तानपुरी की आज 107वीं बर्थ एनिवर्सरी है। इस खास मौके पर जानिए कैसे एक शायर की कलम ने मोहब्बत के गीतों को ऐसे शब्द दिए, जिसे वक्त भी नहीं मिटा सका- 1 अक्टूबर 1919, मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म ब्रिटिश इंडिया के सुल्तानपुर में हुआ। असली नाम था सरारुल हसन खान, जो आगे जाकर सुल्तानपुर के नाम पर मजरूह सुल्तानपुरी नाम से जाने गए । पिता पुलिस में थे, जिन्होंने उनका दाखिला मदरसे में करवाया, वो अंग्रेजी पढ़ाई के खिलाफ थे। यहीं उन्होंने उर्दू, अरबी, फारसी सीखी। बढ़ती उम्र के साथ उनकी दिलचस्पी गानों में होने लगी। लेकिन पिता ने साफ कह दिया कि तुम्हें मेडिकल की पढ़ाई करनी होगी। पिता की सख्ती के आगे गायिकी का शौक फीका पड़ गया और उनका दाखिला करवाया गया लखनऊ के तामील-उल-तबी यूनानी मेडिसिन कॉलेज में। पढ़ाई पूरी कर वह हकीम बन गए, लेकिन जहन में गायिकी ही चलती थी। एक दिन तहसीलदार की बेटी की नब्ज देखते हुए, वो उसे दिल दे बैठे। दोनों में बातचीत भी शुरू हो गई, लेकिन जल्द ही लड़की के पिता ने दोनों के रास्ते अलग कर दिए। दिल टूटा, तो मजरूह सुल्तानपुरी ने कलम उठाई और दिल का दर्द कागजों में लिखने लगे। जल्द ही शब्द शायरी का रूप लेने लगे। दूसरे शायरों को देखते हुए उन्होंने अपना पेन नेम तखल्लुस रखा, जिसका मतलब था- नसीहत देने वाला। कुछ दिनों बाद दोस्त को बताया, तो उसने कहा- ‘नहीं ये नाम अच्छा नहीं, तुम नाम रखो मजरूह यानी घायल।’ ऐसे उनका नाम तखल्लुस मजरूह हुआ। हर शायरी के नीचे वह यही लिखने लगे। 1941 की बात है, एक रोज वह सुल्तानपुर में हो रहे मुशायरे में पहुंचे। हर कोई मंच पर अपनी-अपनी शायरी सुना रहा था, तो मजरूह सुल्तानपुरी भी अपनी डायरी लेकर पहुंच गए। दो लाइनें पढ़ीं, तो हर ओर से वाह- वाह…, की आवाज आने लगी। वाह-वाह करने वालों में उस दौर के मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी भी शामिल थे। वही मशहूर शायर जिनकी कलम से निकली थीं ये पंक्तियां- “ये इश्क नहीं आसां, इतना ही समझ लीजे इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।” और “हम को मिटा सके ये जमाने में दम नहीं, हम से जमाना खुद है, जमाने से हम नहीं।” मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी जिगर मुरादाबादी को इतनी पसंद आई कि उन्होंने शागिर्द से पूछा- ‘ये इतनी कम उम्र का बच्चा इतनी अच्छी शायरी कर रहा है। कौन है ये?’ जवाब मिला- ‘मजरूह है।’ जिगर मुरादाबादी ने उन्हें पास बुलाकर बात की और अपना शागिर्द बना लिया। मजरूह ने जिगर मुरादाबादी जैसा उस्ताद मिलने के बाद हकीमगिरी बंद कर दी और लिखने में तवज्जो देने लगें। कुछ समय बाद एक मुशायरे में जिगर साहब और मजरूह साहब दोनों थे। यहां फिल्म इंडस्ट्री की कई मशहूर हस्तियां भी थीं। तभी मशहूर प्रोड्यूसर कारदार साहब ने जिगर मुरादाबादी के पास आकर कहा- ‘मैं एक फिल्म बना रहा हूं शाहजहां, चाहता हूं कि आप उसमें गाने लिखें।’ जवाब मिला- ‘ये फिल्मी गाने लिखना मेरे बस की बात नहीं है। ये नौजवान शायर है मजरूह। इसको तुम मुशायरे में सुन चुके हो।’ इस पर जिगर साहब ने मजरूह साहब से कहा- ‘तुम कोशिश करो।’ मजरूह साहब बोले- ‘आप खुद तो मना कर रहे हैं और मुझे लिखने को बोल रहे हैं। मैं भी आपकी तरह साहित्य में, अदब में खुद को बड़ा शायर बनाना चाहता हूं, फिल्मी गीतकार नहीं।’ इस बार जिगर मुरादाबादी ने हल्की सी हंसी के साथ कहा- ‘देखो, तुम अभी जवान हो। 24-25 साल के हो। कल तुम्हारी शादी होगी, बीवी-बच्चे होंगे, जिम्मेदारियां बढ़ेंगी। मैं अपने तजुर्बे से कह रहा हूं कि सिर्फ शायरी से घर नहीं चलेगा।’ मजरूह साहब, उस्ताद की बात से इनकार नहीं कर सके और ‘शाहजहां’ फिल्म के लिए दो गाने लिखे। पहला गाना था- ‘गम दिए मुस्तकिल, कितना नाजुक है दिल, ये न जाना, हाय हाय ये जालिम जमाना….’, और दूसरा लिखा- ‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे….,।’ मशहूर सिंगर के.एल. सहगल एक रोज फिल्मी गाने सुन रहे थे। तभी रेडियो पर गाना बजा- ‘जब दिल ही टूट गया, हम जी कर क्या करेंगे…’। गाना सुनते ही सहगल बोल पड़े- ‘जब मेरी मौत हो, तो मेरी अंतिम यात्रा में यही गाना बजना चाहिए।’ 18 जनवरी 1947 को जब के.एल. सहगल का निधन हुआ, तो उनकी आखिरी विदाई में यही गीत बजा। शाहजहां से बतौर लिरिसिस्ट करियर की शुरुआत करने वाले मजरूह सुल्तानपुरी ने आगे नाटक (1947), डोली (1947), अंजुमन (1948) जैसी कई फिल्मों के गाने लिखे। हालांकि उन्हें असल पहचान महबूब खान की फिल्म अंदाज (1949) से मिली। फिल्म में नरगिस, दिलीप कुमार और राज कपूर पर फिल्माए गए सभी गाने मजरूह सुल्तानपुरी ने ही लिखे। नेहरू जी के खिलाफ लिखने पर हुई जेल 1949 में मजरूह सुल्तानपुरी मजदूर आंदोलन में पहुंचे। मंच पर उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ‘हिटलर का चेला’ कहते हुए एक कविता पढ़ी- मन में जहर डॉलर के बसा के, फिरती है भारत की अहिंसा। खादी की केंचुल को पहनकर, ये केंचुल लहराने न पाए। ये भी है हिटलर का चेला, मार लो साथी जाने न पाए। कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू, मार लो साथी जाने न पाए। तत्कालीन गवर्नर मोरारजी देसाई के कहने पर आंदोलन में शामिल एक्टर बलराज साहनी और अन्य लोगों के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी ऑर्थर रोड जेल में डाल दिया गया। जेल में मजरूह सुल्तानपुरी के सामने साफ विकल्प रखा गया- ‘माफी मांगो या दो साल जेल में रहो।’ मजरूह ने माफी मांगने के बजाय जेल जाना चुना। उनकी कलम सत्ता के सामने झुकने को तैयार नहीं थी। उन्होंने दो साल की सजा काटी। इतना ही नहीं, आगे भी ऐसे कई मौके आए, जब उनकी कविताओं और उनके विचारों की कीमत उन्हें जेल जाकर चुकानी पड़ी। जब मजरूह जेल में बंद थे तब उनकी पहली बेटी हुई। परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। इस दौरान मजरूह सुल्तानपुरी ने जेल में रहते हुए कुछ फिल्मों में गीत लिखने की हामी भरी और उनसे मिले पैसे परिवार को पंहुचा दिए। मजरूह 2 साल बाद 1951 के करीब जेल से बाहर आए। मजरूह ने लगभग 350 फिल्मों के लिए गाने लिखे हैं। उन्होंने आमिर खान स्टारर कयामत से कयामत तक, जो जीता वही सिकंदर, अकेले हम अकेले तुम से लेकर दिल आशना है, अंदाज अपना अपना, खामोशी, दरार, जानम समझा करो, क्या कहना और पुकार जैसी फिल्मों के गाने लिखे। उन्होंने आखिरी बार शाहरुख खान स्टारर फिल्म वन टू का फोर के लिए गाने लिखे, जो उनके निधन के बाद रिलीज हुआ। इस फिल्म का गाना ‘खामोशियां गुनगुनाने…,’ लगीं काफी हिट रहा था। मजरूह सुल्तानपुरी ने अपने करियर में 8 हजार से ज्यादा गाने लिखे हैं। जिसमें से ज्यादातर गाने हिट रहे हैं। मजरूह पहले गीतकार हैं जिन्हें 1993 में दादासाहेब फाल्के अवॉर्ड से नवाजा गया है। 24 मई 2000 को उनका लंग्स संबंधित दिक्कतों के चलते 80 साल की उम्र में निधन हो गया। मजरूह की याद में सुल्तानपुर में एक बगीचा बनाया गया जिसका नाम रखा गया मजरूह सुल्तानपुरी उद्यान। सुल्तानपुर में एंट्री के रास्ते में ही उनके नाम का गेट भी बनाया गया है।
भुवन बोले- प्यार में किसी भी हद तक जाऊंगा:सोनम ने कहा- दुपहिया में पेपर लीक का मुद्दा महज संयोग, शिवानी ने अंधविश्वास को चुनौती दी
प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘दुपहिया’ का दूसरा सीजन आज रिलीज हो चुका है। पहले सीजन में गांव की सादगी और दिलचस्प किरदारों से दर्शकों का मनोरंजन करने के बाद यह सीरीज नए ट्विस्ट और खुलासों के साथ लौट रही है। इस सीजन में अपराध, प्यार, जुगाड़, अंधविश्वास और पेपर लीक जैसे मुद्दे देखने को मिलेंगे। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अभिनेता भुवन अरोड़ा, अभिनेत्री शिवानी रघुवंशी और निर्देशक सोनम नायर ने सीरीज के किरदारों, उनकी बारीकियों, शूटिंग के अनुभवों और असल जिंदगी से जुड़ी समानताओं पर बात की। उन्होंने सीरीज से जुड़े कई दिलचस्प किस्से भी साझा किए। सवाल: पहले सीजन में धड़कपुर काफी सीधा-सादा नजर आया था। इस बार यह ‘मिर्जापुर’ जैसा क्यों बनता दिख रहा है? जवाब/सोनम नायर: पिछले सीजन में हमने दिखाया था कि धड़कपुर में बिल्कुल भी अपराध नहीं होता। वहां के लोग बहुत भोले-भाले और सीधे-साधे हैं। लेकिन कहानी के अंत तक पता चलता है कि जो लोग खुद को जितना सीधा दिखा रहे थे, वे वास्तव में उतने सीधे नहीं हैं। अब सबका पर्दाफाश हो चुका है और उनकी असलियत सामने आ गई है। इस सीजन में इन किरदारों का असली रूप देखने को मिलेगा। सवाल: भुवन और शिवानी से पहली मुलाकात में आपका क्या इम्प्रेशन था? जवाब/सोनम नायर: जब मैं भुवन से अमावस के रोल के लिए मिली थी, तो शुरुआत में हमने रोल की बात ही नहीं की। करीब आधे-एक घंटे तक हम सिर्फ हंसते रहे। भुवन मुझे बिहार और अपने ससुराल की कहानियां सुना रहे थे। मुझे लगा कि इनके साथ सेट पर बहुत मजा आएगा। रोल तो ये अच्छे एक्टर हैं, कर ही लेंगे, लेकिन सेट पर भी मजा आना चाहिए। मेरा पहला इम्प्रेशन यही था कि अगर भुवन होंगे तो मैं एंजॉय करूंगी। शिवानी को मैंने पहली बार एक पार्टी में देखा था। वहां सभी लोग हंस-खुलकर मिल रहे थे, लेकिन शिवानी चुपचाप एक कोने में खड़ी थीं। वह किसी से ज्यादा बात नहीं कर रही थीं और हाथ में डाइट कोक था। मुझे लगा कि ग्लैमर वर्ल्ड में रहने के बावजूद उनमें अलग तरह की मासूमियत है। हमें जिस तरह की लड़की चाहिए, वो यही हैं। सवाल: भुवन, आप पढ़ाई के मामले में कैसे थे? दो महीने पहले से तैयारी करने वाले या परीक्षा से एक रात पहले पढ़ने वाले? जवाब/भुवन अरोड़ा: मैं तो रट्टा मारकर पास होता था। आज भी लंबे-लंबे डायलॉग याद करने में यह आदत मेरे बहुत काम आती है। लोग अक्सर पूछते हैं कि तुम्हें इतनी जल्दी डायलॉग कैसे याद हो जाते हैं। मैं कहता हूं कि मैंने स्कूल ही रट्टे मार-मारकर पास किया है। लास्ट मिनट तो छोड़िए, मैं आखिरी सेकंड तक पढ़ता रहता था। आप अक्सर देखेंगे कि डायलॉग याद करते वक्त मेरी आंखें ऊपर की तरफ रहती हैं, जैसे मेरे अंदर कोई आत्मा आ गई हो और मैं कुछ न कुछ रट रहा हूं। मैं इसी तरीके से पास हुआ हूं। सवाल: सोनम, दोनों में वन-टेक आर्टिस्ट कौन है और परफेक्शनिस्ट कौन है? जवाब/सोनम नायर: दोनों ही वन-टेक में अच्छा परफॉर्म करते हैं। शुरुआत से ही इनका परफॉर्मेंस अच्छा रहता है। कोई छोटा-मोटा बदलाव करना होता है तो मैं करवा लेती हूं। शिवानी शायद कभी-कभी कहती होंगी कि एक टेक और कर लेते हैं, लेकिन मैं हमेशा नहीं लेती। सवाल: अगर कोई कलाकार इतना अच्छा करने के बाद भी कहता है कि कुछ कमी रह गई है, एक टेक और देना चाहता तो आप क्या करती हैं? जवाब/सोनम नायर: मैं उसे कहती हूं कि आपने इतना अच्छा किया है, मैं बहुत खुश हूं। अपने ऊपर कॉन्फिडेंस रखिए और आगे बढ़िए। हां, अगर कोई बहुत महत्वपूर्ण सीन हो और उन्हें सच में लगे कि एक और टेक जरूरी है, तो मैं उन्हें करने देती हूं। कलाकारों के अंदर कई बार इनसिक्योरिटी होती है कि हम और अच्छा कर सकते हैं। लेकिन अगर मुझे लगता है कि टेक पर्याप्त अच्छा है, तो मैं प्यार से कह देती हूं कि नहीं, बहुत अच्छा है, अब आगे बढ़ते हैं। सवाल: ट्रेलर में शनिवार को लेकर एक डायलॉग है। क्या असल जिंदगी में भी कभी कोई टोटका आपके साथ हुआ है? जवाब/भुवन अरोड़ा: शनिवार वाली बिल्कुल ऐसी ही घटना मेरे साथ हुई है, लेकिन उसमें दुपहिया नहीं, वॉशिंग मशीन थी। दिल्ली में हमने एक वॉशिंग मशीन खरीदी थी और साफ कह दिया था कि शनिवार को हमारे यहां लोहे की चीज घर में नहीं आती। लेकिन शनिवार रात करीब 8-8:30 बजे उसकी डिलीवरी आ गई। डिलीवरी वाले ने मेरी मम्मी से कहा कि मैडम, अब इसे वापस कहां लेकर जाएंगे और दोबारा लेकर आएंगे, आप इसे रख लीजिए। मम्मी को लगा कि बच्चों को दोबारा परेशानी होगी, इसलिए उन्होंने रख लिया। उस वॉशिंग मशीन ने हमें बहुत परेशान किया। कभी चूहे उसके तार काट देते थे, तो कभी कोई और समस्या हो जाती थी। करीब साढ़े तीन महीने तक हम उस परेशानी से जूझते रहे। आखिरकार कंपनी ने मशीन रिप्लेस की। इसलिए हमारे घर में आज भी नियम है कि शनिवार को लोहे की चीज नहीं आती। सवाल: शिवानी, क्या आप भी इन अंधविश्वासों को मानती हैं? जवाब/शिवानी रघुवंशी: मैं इन सब चीजों को नहीं मानती। लेकिन हमारे घर में ऐसी बातें होती रहती हैं। कोई कहता है मंगलवार को यह नहीं करना चाहिए, कोई कहता है गुरुवार को ऐसा नहीं करना चाहिए। अभी मैं फ्लाइट बुक कर रही थी तो घर में कहा गया कि शुक्रवार को एक खास दिशा में नहीं जाना चाहिए। इसे दिशा शूल कहते हैं। मैं इन चीजों को नहीं मानती। मैं कहती हूं कि आज ही जाकर देखती हूं, कुछ होगा तो देखा जाएगा। आज तक मेरे साथ कुछ गलत नहीं हुआ। मेरा मानना है कि जो होगा, देखा जाएगा। रोशनी के नेचर में भी यही बात है। वह अंधविश्वास को चुनौती देती है और कहती है कि करके दिखाओ, मेरे साथ क्या होगा। सवाल: भुवन, अमावस और आपकी पर्सनैलिटी में क्या समानता है? भुवन अरोड़ा: अमावस और मेरे अंदर एक चीज बहुत कॉमन है। अगर मैं किसी से प्यार करता हूं तो उसके लिए किसी भी हद तक जा सकता हूं। हां, एक चीज बिल्कुल कॉमन नहीं है। मैं क्लेप्टोमेनियाक नहीं हूं और किसी का सामान नहीं चुराता। शिवानी रघुवंशी: मेरे और रोशनी में कुछ भी कॉमन नहीं हैं और मैं वो चाहती भी नहीं हूं। सवाल: आपने प्यार के लिए असल जिंदगी में ऐसा क्या किया है, जिसे आप बड़ी कोशिश मानते हैं? जवाब/भुवन अरोड़ा: मुझे याद है, मेरी पत्नी को एक ज्वेलरी पसंद आई थी और वह पुणे में थी। हमारी एनिवर्सरी पर उन्हें वह ज्वेलरी देने के लिए मैं खास तौर पर पुणे गया। ज्वेलर को ऑर्डर दिया और फिर ज्वेलरी लेकर वापस आया। मैं मानता हूं कि पार्टनर के लिए हम छोटी-छोटी चीजें कर सकते हैं। ऐसी कोई नौबत नहीं आई कि जान पर बात आ जाए। टचवुड, ऐसी स्थिति आई ही नहीं। सवाल: सीरीज में अमावस दोस्त के लिए चीटिंग का जुगाड़ करता है। क्या असल जिंदगी में कभी नकल करनी पड़ी? शिवानी रघुवंशी: नहीं, बहुत ज्यादा नहीं। हालांकि मैं स्कूल में बहुत गंदी चीटिंग करती थी। मैं पूरा टर्न लेकर नकल करती थी। मेरे दोस्त कहते थे कि तू आगे रह, हम तेरे पीछे हैं। सवाल: सीरीज में पेपर लीक का मुद्दा भी उठाया गया है। अगर अमावस को इस समस्या को अपने जुगाड़ से खत्म करना हो तो वह क्या करेगा? जवाब/भुवन अरोड़ा: सबसे पहले तो मैं रोशनी को समझाऊंगा कि इन बेकार के चैलेंज के चक्कर में मत पड़ो। सिर्फ कह दिया है तो जरूरी नहीं कि उसे करके दिखाना ही है। मैं तो खुश ही था कि अगर वह पास हो जाएगी तो शहर चली जाएगी और मुझसे दूर हो जाएगी। मैं कभी नहीं चाहूंगा कि वह मुझसे दूर जाए। लेकिन इश्क का मारा हूं, क्या करूं? जो कहती है, महबूबा के लिए करना पड़ता है। इसलिए जब तक साथ दे सकता हूं, कोशिश करूंगा। फिर चाहे वह दूर रहे या पास। सवाल: सोनम, आप इस मुद्दे पर कोई समाधान देना चाहेंगी? सोनम नायर: मैं कौन होती हूं समाधान बताने वाली? हमारे सिस्टम को हेड करने वाले बहुत सारे मुझसे ज्यादा पढ़े-लिखे और जिम्मेदार लोग हैं। हम अपनी तरफ से सिर्फ लोगों की कहानियां बता सकते हैं। लोगों को जो समस्याएं होती हैं, उसमें हम अपने स्तर पर क्या बदलाव ला सकते हैं, उस स्तर तक मैं कुछ कह सकती हूं। लेकिन इतनी बड़ी समस्या का समाधान, जब हम सब मिलकर भी नहीं कर पा रहे हैं, तो मैं इसका समाधान नहीं बता सकती। यह भी संयोग की बात है। जब हमने यह शो बनाया था, तब पेपर लीक का मुद्दा इतना सामने या प्रासंगिक नहीं था। मुझे लगता है कि जिस समय यह मुद्दा चर्चा में है, उसी समय हमारा शो भी आ रहा है। हमने इसे काफी पहले शूट किया था। इसलिए यह पूरी तरह संयोग है। सवाल: भुवन, हाल ही में हुए नेशनल अवॉर्ड्स में आपकी दो फिल्मों से जुड़े कलाकारों को सम्मान मिला। आप इसे कैसे देखते हैं? भुवन अरोड़ा: मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं कि उन दोनों बेहतरीन फिल्मों का हिस्सा बनने का मौका मिला। अगर उनकी कहानी कहने में मैंने थोड़ा सा भी योगदान दिया है, जिसकी वजह से वे इस मुकाम तक पहुंचीं और नेशनल अवॉर्ड जीता, तो मैं बहुत खुश और आभारी हूं। दोनों फिल्में मेरे लिए बहुत खास हैं। दोनों ही वास्तविक जीवन पर आधारित कहानियां हैं। मुझे लगता है कि हमें ऐसी और फिल्में बनानी चाहिए। सवाल: ‘दुपहिया’ में पहली गाड़ी को लेकर भावनात्मक जुड़ाव दिखाया गया है। आपकी पहली बाइक या कार से जुड़ी क्या यादें हैं? भुवन अरोड़ा: जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मैंने अपनी पहली बाइक खरीदी थी, जो मेरे नाम पर थी। उससे पहले घरवालों ने जो बाइक खरीदकर दी थी, वह उनके नाम पर थी। लेकिन अपनी बुलेट मैंने खुद खरीदी थी। वह बुलेट आज भी मेरे पास है। काफी वक्त हो गया है, मैं उसे चला नहीं पाता और समय भी नहीं मिलता, लेकिन मैंने उसे संभालकर रखा है। वह मेरी पहली ऐसी गाड़ी थी, जो मेरे नाम पर थी। इसलिए वह मेरे लिए बहुत खास है। मुझे नहीं लगता कि मैं उसे कभी बेचूंगा। शिवानी रघुवंशी: जिस गाड़ी पर मैंने ड्राइविंग सीखी थी, वह सफेद रंग की फिएट 118 थी। वह हमारी फैमिली कार थी और मैंने उसी पर गाड़ी चलाना सीखा। मुझे याद है, एक दिन मैं अपनी फैमिली को ड्राइव करके लेकर गई थी। वे बहुत खुश और गर्व महसूस कर रहे थे कि उनकी बेटी गाड़ी चला रही है। इसलिए उस गाड़ी से मेरा खास जुड़ाव है।
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