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एक पत्रकार को बनाया गया राजा, युगांडा में पूर्व टीवी एंकर को मिली टोरो साम्राज्य की राजगद्दी

Uganda Monarchy: युगांडा के टोरो साम्राज्य में एक पत्रकार को नया राजा बनाया गया है. यह एक पारंपरिक राजशाही है, जो पिछले महीने अपने ‘बाल राजा’ की मौत के बाद शोक और उत्तराधिकार को लेकर विवाद से गुजर रही है.

युगांडा ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन में लंबे समय से पत्रकार और संपादक के तौर पर काम कर रहे प्रिंस एडवर्ड रुकीदी न्याबोंगो को नया राजा बनाया गया है. राजा बनने से पहले उन्होंने महल में प्रवेश से पहले रात में होने वाली पारंपरिक रस्में पूरी कीं और इसके बाद अपना शाही नाम अपनाया. मंगलवार को पश्चिमी युगांडा के फोर्ट पोर्टल शहर में एक समारोह के दौरान उन्हें औपचारिक रूप से अपनी प्रजा के सामने पेश किया गया. यह शहर कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य की सीमा के पास स्थित है.

बने 13वें राजा, खत्म हुआ विवाद

पूर्व टीवी एंकर एडवर्ड रुकीदी किजानंगोमा को युगांडा के फोर्ट पोर्टल में टोरो साम्राज्य के 13वें राजा के रूप में ताज पहनाया गया, जिससे राजा ओयो न्यिम्बा की 34 वर्ष की आयु में कैंसर से मृत्यु के बाद चल रहे उत्तराधिकार विवाद का अंत हुआ.

1993 में पारंपरिक राज्यों में फिर शुरू हुई परंपरा 

युगांडा के पारंपरिक राज्यों को 1960 के दशक में तत्कालीन राष्ट्रपति ने खत्म कर दिया था. उनका मकसद नए-नए आजाद हुए देश को एकजुट करना था. हालांकि, 1993 में इन पारंपरिक राज्यों को फिर से बहाल कर दिया गया. इन राज्यों के राजा या सांस्कृतिक सम्राटों के पास कोई संवैधानिक अधिकार नहीं होता. उन्हें सक्रिय राजनीति से भी दूर रहना पड़ता है. इसके बावजूद समाज में उनका खास प्रभाव है. वे अपनी परंपराओं, संस्कृति और लोगों की पहचान के संरक्षक माने जाते हैं.

दिया पहला भाषण

समारोह में राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी ने पारंपरिक नेताओं से स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने की अपील की. वहीं, न्याबोंगो ने अपने छोटे से भाषण में कहा कि वह लोगों को एकजुट करने वाले राजा की भूमिका निभाएंगे. उन्होंने ‘न्यू विजन’ अखबार से कहा कि शाही परिवार से जुड़ी जिम्मेदारियों के साथ अनुशासन और मेहनत भी जरूरी है. उन्होंने कहा कि शाही पद को अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और कर्तव्य के तौर पर देखा जाना चाहिए.

पद को लेकर विवाद भी

न्याबोंगो शाही परिवार में उत्तराधिकार की दौड़ में सबसे आगे नहीं थे. राजा ओयो न्यिम्बा कबांबा इगुरु रुकीदी चतुर्थ की अगस्त में 34 साल की उम्र में कैंसर से मौत के बाद उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया शुरू हुई. बताया गया कि राजा ने सार्वजनिक रूप से किसी उत्तराधिकारी का नाम घोषित नहीं किया था. इसके बाद सत्तारूढ़ बाबीतो कबीले के बुजुर्गों ने योग्य राजकुमारों में से न्याबोंगो को नया राजा चुना.

हालांकि, इस फैसले को रानी मां बेस्ट केमिगिसा ने चुनौती दी है. उनका दावा है कि दिवंगत राजा एक छोटे बेटे को पीछे छोड़ गए हैं, जिसकी पहचान सही समय आने पर सार्वजनिक की जाएगी. ‘बेबी ओयो’ के संभावित उत्तराधिकारी होने की खबर के बाद सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों के बीच चर्चा तेज हो गई है. इसके साथ ही न्याबोंगो के राज्याभिषेक की वैधता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

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Explainer: सपा ने खोल दिए अपने पत्ते, भाजपा अब भी चुप क्यों? राज्यसभा की 10 सीटों पर 37 वोटों से तय होगी एक सीट...

UP Rajya Sabha Election 2026: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाला चुनाव सियासी हलचल की वजह बन गया है. 16 अक्टूबर को होने वाले इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपनी तरफ से पत्ते खोलते हुए दो उम्मीदवारों के नाम पहले ही घोषित कर दिए हैं, जबकि भाजपा खेमे में अभी तक खामोशी बनी हुई है.

सपा ने किसे मैदान में उतारा है?

समाजवादी पार्टी ने वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को अपना उम्मीदवार बनाया है और दोनों का नामांकन भी करा दिया गया है. पार्टी का यह कदम साफ दिखाता है कि वह इस चुनाव को लेकर पहले से पूरी तरह तैयार बैठी है.

भाजपा अभी तक चुप क्यों है?

भाजपा की तरफ से अब तक अपने उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. सूत्रों के मुताबिक पार्टी के भीतर इस पर गहन मंथन चल रहा है और करीब 20 नामों पर विचार किया जा रहा है जिनमें से आखिरकार सिर्फ आठ चेहरों को ही मौका मिलना है. 

एक सीट जीतने के लिए कितने वोट चाहिए?

यूपी विधानसभा की मौजूदा प्रभावी सदस्य संख्या 397 है. इस हिसाब से राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार को कम से कम 37 प्रथम वरीयता वोट चाहिए. अगर सीधा गणित लगाया जाए तो 9 सीटों के लिए 333 वोटों की जरूरत पड़ती है और बचे हुए वोट ही 10वीं सीट के लिए पूरा खेल दिलचस्प बना देते हैं.

भाजपा-NDA का वोट गणित क्या कहता है?

भाजपा के पास फिलहाल विधानसभा में 256 विधायक हैं. इसके अलावा सहयोगी दलों में अपना दल (एस) के 13, रालोद के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक शामिल हैं. इस तरह NDA के मुख्य घटक दलों का कुल आंकड़ा 289 तक पहुंच जाता है. 37 वोट प्रति सीट के हिसाब से 7 सीटों के लिए 259 वोट चाहिए, यानी मौजूदा संख्या बल के आधार पर भाजपा-NDA के लिए सात सीटें लगभग तय मानी जा रही हैं. आठवीं सीट के लिए पार्टी को अतिरिक्त वोटों का जुगाड़ करना होगा.

सपा के दो उम्मीदवारों के पीछे कितनी ताकत है?

समाजवादी पार्टी के पास विधानसभा में 101 विधायक हैं और कांग्रेस के दो विधायकों का समर्थन मिलने पर यह आंकड़ा 103 तक पहुंच सकता है. दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए 74 वोट चाहिए जो सपा के पास आराम से मौजूद हैं. यही वजह है कि पार्टी ने बिना किसी हिचक के अपने दो नाम पहले ही सामने रख दिए.

क्या सपा तीसरा उम्मीदवार भी उतार सकती है?

फिलहाल इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है लेकिन कुछ रिपोर्टों में तीसरे उम्मीदवार की संभावना जताई जा रही है. इसके लिए पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी जैसे नामों की चर्चा राजनीतिक गलियारों में चल रही है. अगर सपा वाकई तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो पूरे चुनाव का नंबर गेम पूरी तरह बदल सकता है.

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तो आखिर 10वीं सीट पर इतनी नजरें क्यों टिकी हैं?

मौजूदा संख्या बल के हिसाब से सात सीटें भाजपा-NDA और दो सीटें सपा के खाते में जाती दिख रही हैं. इसके बाद बची हुई एक सीट के लिए अतिरिक्त वोटों का समीकरण बनता है और यही वह मोड़ है जहां असली सियासी हलचल देखने को मिल सकती है. यहां प्रथम वरीयता वोटों का बंटवारा, सहयोगी दलों का रुख और किसी संभावित क्रॉस-वोटिंग का असर, सब कुछ मायने रखेगा. 

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भाजपा नाम तय करने में इतना वक्त क्यों ले रही है?

पार्टी की तरफ से इसकी कोई आधिकारिक वजह अब तक नहीं बताई गई है. लेकिन सूत्रों के मुताबिक उम्मीदवारों के चयन में जातीय, क्षेत्रीय और संगठनात्मक संतुलन को लेकर गहन विचार-विमर्श चल रहा है. चूंकि अगले साल ही विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए यह चयन सिर्फ संसद भेजने भर का मामला नहीं रह गया बल्कि आने वाले चुनाव के लिए सामाजिक समीकरण साधने की बड़ी कवायद भी बन गया है.

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