PM Modi की कैबिनेट ने Rabi Crops के MSP में की बढ़ोतरी, Ashwini Vaishnaw ने दी जानकारी
सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को बताया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी को मंज़ूरी दे दी है, जिससे 2027-28 रबी मार्केटिंग वर्ष के लिए यह 2,610 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। 2026-27 मार्केटिंग वर्ष (अप्रैल-मार्च) के लिए गेहूं का MSP 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में गेहूं और अन्य पांच रबी फसलों के MSP पर कृषि मंत्रालय के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई।
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केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि आज देश भर में दूरगामी असर डालने वाले तीन बड़े फैसले लिए गए। पहला फैसला रबी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने से जुड़ा है। गेहूं, जौ, चना, मसूर, रेपसीड और सरसों जैसी फसलों के लिए MSP को उत्पादन लागत से कम से कम 50% ज़्यादा तय किया गया है। उदाहरण के लिए गेहूं को ही लें: इसकी उत्पादन लागत ₹1,264 है, फिर भी MSP ₹2,610 प्रति क्विंटल तय किया गया है, जो लागत से 100% से ज़्यादा (लागत से दोगुने से भी ज़्यादा) है। इसी तरह, जौ के लिए MSP को अनुमानित उत्पादन लागत से 58% ज़्यादा तय किया गया है; ₹1,447 की लागत के मुकाबले MSP ₹2,286 प्रति क्विंटल है... कुल मिलाकर, इस रबी सीज़न में 324 लाख मीट्रिक टन की खरीद से किसानों तक ₹90,962 करोड़ पहुंचेंगे।
तिलहन के मामले में, रेपसीड/सरसों के बीज का समर्थन मूल्य (MSP) 6,200 रुपये प्रति क्विंटल से 413 रुपये बढ़ाकर 6,613 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है, जबकि कुसुम (safflower) की दर पिछले साल के 6,540 रुपये प्रति क्विंटल से 675 रुपये बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल कर दी गई है। मंत्री ने कहा कि 2027-28 मार्केटिंग वर्ष में 324 लाख टन उपज के लिए किसानों को कुल भुगतान 90,962 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।
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कृषि लागत और मूल्य आयोग (CACP) की सिफारिश के आधार पर, कृषि मंत्रालय ने उत्पादन लागत, अल नीनो की चिंताओं और वैश्विक व घरेलू मूल्य रुझानों को ध्यान में रखते हुए सभी छह रबी फसलों के लिए MSP का प्रस्ताव दिया था।
UP Police के सभी केस CBI को सौंप दें, अज्ञात पर FIR दर्ज करने को लेकर Supreme Court की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश (UP) पुलिस को आरोपी की पहचान पता होने के बावजूद अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज करने पर कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने सवाल किया कि ऐसे हालात में लोग पुलिस पर कैसे भरोसा कर सकते हैं, और सुझाव दिया कि राज्य में सभी आपराधिक मामलों की जांच CBI को सौंप दी जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह राज्य की पूरी पुलिस फोर्स को ही भंग कर सकती है। कोर्ट ने पूछा, "अगर व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो आपने 'अज्ञात' क्यों लिखा? लोग पुलिस पर कैसे भरोसा करेंगे? कोर्ट की ये टिप्पणियां तब आईं जब याचिकाकर्ता, जो खुद पेश हुई थीं, ने आरोप लगाया कि आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, लेकिन फिर भी FIR में उसका नाम शामिल नहीं किया गया। कोर्ट ने बाद में किसी सप्लीमेंट्री डॉक्यूमेंट के ज़रिए आरोपी का नाम जोड़ने की संभावना पर भी चिंता जताई।
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कोर्ट ने कहा कि शायद... आप नाम बदल सकते हैं, अपनी पसंद का कोई नाम डाल सकते हैं..." कोर्ट ने देखा कि UP पुलिस के हलफ़नामे में ही आरोपी का नाम बताया गया था। यह जानकारी होने के बावजूद, कथित तौर पर FIR में उसका नाम नहीं लिखा गया। कोर्ट ने इस पर सख़्ती से जवाब मांगा। कोर्ट ने UP प्रशासन को FIR से जुड़े हालात बताते हुए एक नया हलफ़नामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आगे कहा कि निर्देशों का पालन करना एक बात है, लेकिन संबंधित आचरण को बचाने या छिपाने के लिए इतनी दूर तक जाना मंज़ूर नहीं है। यह मामला एक महिला से जुड़ा है जिसने आरोपी को मिली अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) को रद्द कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। आरोपी को शुरू में निचली अदालत ने ज़मानत दे दी थी। इसके बाद महिला ने उसकी ज़मानत रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन हाई कोर्ट ने उसकी याचिका ठुकरा दी।
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इसके बाद उसने हाई कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। मूल मामले में उसकी शिकायत IPC की धारा 354 के तहत दर्ज की गई थी। उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने निजी जगह में घुसकर उसे परेशान किया था। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, उसने आरोप लगाया कि उसने आरोपी को पुलिस के हवाले कर दिया था, लेकिन फिर भी FIR किसी अज्ञात व्यक्ति के ख़िलाफ़ दर्ज की गई। उसने आगे आरोप लगाया कि हाई कोर्ट द्वारा रिपोर्ट मांगने के बाद आरोपी का नाम मामले में शामिल किया गया और अंततः उसे क्लीन चिट दे दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई। उत्तर प्रदेश (UP पुलिस) का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील विजेंद्र सिंह ने इस बात से इनकार किया कि कोर्ट ने राज्य पुलिस के ख़िलाफ़ कोई प्रतिकूल टिप्पणी की थी। एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के अनुसार, कोर्ट ने सुनवाई के दौरान केवल याचिकाकर्ता की दलीलों पर ध्यान दिया था और UP पुलिस से हलफ़नामा मांगा था। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि वह कोर्ट के सामने इन आरोपों का जवाब देगी।
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