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Explainer: कैसे दुनिया की प्रमुख मुद्रा बन गया डॉलर? आज भी दुनियाभर में क्यों है इसका सबसे ज्यादा महत्व

Explainer: किसी की भी देश कि मुद्रा की तुलना हमेशा अमेरिकी डॉलर से की जाती है. हर कोई विदेश जाकर डॉलर में ही कमाई करने का सपना देखता है. ऐसे में सवाल पैदा होता कि आखिर ऐसा क्या है अमेरिकी डॉलर में जिसका असर दुनिया भर के देशों पर देखने को मिलता है. बता दें कि डॉलर सिर्फ अमेरिका की मुद्रा नहीं है. बल्कि आज ये वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी बन चुका है. यही वजह है कि दुनिया के देशों के विदेशी मुद्रा भंडार से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद-बिक्री, वैश्विक बैंकिंग और निवेश तक हर चीज का लेन-देन अमेरिकी डॉलर में ही होता है.

कैसे दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा बन गया डॉलर?

ऐसे में सवाल वही है कि आखिर अमेरिका डॉलर दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा कैसे बन गया. जो हर कोई इसके पीछे दिवाना है. डॉलर जितना शक्तिशाली अभी है क्या पहले भी इसकी दुनिया में धाक चलती थी, या फिर कभी ब्रिटिश पाउंड दुनिया की सबसे बड़ी मुद्रा होता था. आज हम जानें कि कैसै 1944 के ब्रेटन वुड्स समझौते ने डॉलर को नई ताकत दी और 1971 में अमेरिका द्वारा डॉलर को सोने से जोड़ने की व्यवस्था खत्म करने के बाद भी डॉलर की बादशाहत कम नहीं हुई.

सबसे पहले समझते हैं इसकी करीब दो सदी पुरानी कहानी-

आज जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार या विदेशी मुद्रा की बात होती है तो डॉलर सबसे पहले दिखाई देता है. लेकिन 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में स्थिति अलग थी. उस समय ब्रिटिश पाउंड अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण मुद्रा होता था. इसके पीछे ब्रिटेन की वैश्विक आर्थिक और साम्राज्यवादी ताकत थी.

क्योंकि उस दौर में दुनिया भर में ब्रिटिश साम्राज्य फैला हुआ था. लंदन अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र था और ब्रिटिश बैंक तथा व्यापारी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय थे. इसलिए दुनिया के कई देशों और व्यापारियों के लिए पाउंड रखना और उसमें कारोबार करना जरूरी था. लेकिन 20वीं सदी के पहले आधे हिस्से में दुनिया की आर्थिक ताकत का संतुलन तेजी से बदलने लगा.

अमेरिका का आर्थिक उदय

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका तेजी से औद्योगिक शक्ति बन रहा था. उसके पास विशाल घरेलू बाजार, बड़ी औद्योगिक क्षमता, प्राकृतिक संसाधन, कृषि उत्पादन, बढ़ती बैंकिंग व्यवस्था और तेजी से विकसित होती पूंजी बाजार व्यवस्था थी. बस यहीं से अमेरिका और उसके डॉलर की कहानी शुरू हो गई. इस दौर में प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचाया.

दूसरी तरफ अमेरिका की औद्योगिक क्षमता और आर्थिक ताकत और बढ़ती गई. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और औद्योगिक शक्तियों बनकर उभर चुका था. यही वह समय था जब डॉलर ने पाउंड की जगह वैश्विक व्यवस्था के केंद्र की ओर बढ़ना शुरू कर दिया.

क्या है ब्रेटन वुड्स सम्मेलन जिसने बदल की पूरी व्यवस्था?

डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व की कहानी में 1944 में शुरू हुई. उस साल ब्रेटन वुड्स सम्मेलन हुआ. बता दें कि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्त से पहले ही मित्र राष्ट्र यह समझने लगे थे कि युद्ध के बाद दुनिया को एक नई आर्थिक व्यवस्था की जरूरत होगी. जुलाई 1944 में अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में कई देशों के प्रतिनिधि एकत्र हुए. यहीं ब्रेटन वुड्स व्यवस्था की नींव रखी गई. जिसमें डॉलर को केंद्रीय भूमिका मिली.

उस समय अमेरिका के पास दुनिया के सोने के बड़े भंडार थे. इस व्यवस्था के तहत डॉलर को सोने से जोड़ा गया और अन्य प्रमुख मुद्राओं की विनिमय दरों को डॉलर के संदर्भ में स्थिर रखने की कोशिश की गई. इसी व्यवस्था ने डॉलर को अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक प्रणाली के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया.

आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक की स्थापना

ब्रेटन वुड्स सम्मेलन का महत्व सिर्फ डॉलर तक सीमित नहीं था. बल्कि इसी प्रक्रिया से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की स्थापना का रास्ता बना. इन संस्थाओं का उद्देश्य युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अधिक स्थिर बनाना और देशों को वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराना था. इस नई व्यवस्था में अमेरिका की आर्थिक शक्ति और डॉलर की भूमिका एक-दूसरे को मजबूत कर रही थीं यहीं से डॉलर को वह संस्थागत आधार मिला जिसने आगे चलकर उसे वैश्विक मुद्रा बनने में मदद की.

1971 में आया नया मोड़

लेकिन 1971 में नया मोड़ आया. दरअसल, ब्रेटन वुड्स व्यवस्था के तहत डॉलर को सोने से जोड़ा गया था. लेकिन समय के साथ अमेरिका के सामने आर्थिक और वित्तीय दबाव बढ़ने लगे. दुनिया में बड़ी मात्रा में डॉलर चलन में आ चुके थे. दूसरी ओर अमेरिका के सोने के भंडार पर दबाव बढ़ रहा था. आखिरकार 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को सोने में बदलने की व्यवस्था को समाप्त कर दिया. यानी डॉलर और सोने का सीधा संबंध खत्म हो गया.

क्या है नेटवर्क इफेक्ट?

नेटवर्क इफेक्ट का मतलब जितने अधिक लोग किसी मुद्रा का इस्तेमाल करते हैं, उस मुद्रा का इस्तेमाल करने का लाभ उतना ही बढ़ जाता है. इसी को नेटवर्क इफेक्ट कहा जाता है. इसमें एक चक्र बनात है- अधिक डॉलर का इस्तेमाल, अधिक डॉलर की मांग, अधिक वित्तीय गतिविधि, डॉलर का और अधिक उपयोग. यही कारण है कि किसी दूसरी मुद्रा के लिए डॉलर की जगह लेना सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था होने से संभव नहीं हो जाता.

अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की भूमिका

अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक है. दुनिया के दो देशों की अपनी-अपनी मुद्राएं हो सकती हैं. लेकिन यदि उनके बीच व्यापार होता है तो वे किसी तीसरी मुद्रा का इस्तेमाल कर सकते हैं. डॉलर लंबे समय से इस भूमिका में सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली मुद्राओं में से एक रहा है.

तेल और डॉलर का रिश्ता

डॉलर के महत्व को समझने में तेल बाजार भी महत्वपूर्ण है. दुनिया के ऊर्जा बाजारों में लंबे समय से डॉलर की बड़ी भूमिका रही है. अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में डॉलर का व्यापक इस्तेमाल हुआ है. इससे तेल आयात करने वाले देशों और तेल निर्यात करने वाले देशों दोनों के लिए डॉलर की उपयोगिता बढ़ी. लेकिन यह समझना जरूरी है कि दुनिया का हर तेल लेनदेन अनिवार्य रूप से डॉलर में ही होता है. अलग-अलग देशों और कंपनियों के बीच भुगतान की व्यवस्थाएं अलग हो सकती हैं.

डॉलर को क्यों कहा जाता है रिजर्व करेंसी?

दरअसल, किसी देश की केंद्रीय बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा के रूप में रखी जाने वाली परिसंपत्तियों को मोटे तौर पर विदेशी मुद्रा भंडार कहा जाता है. जब किसी मुद्रा का इस्तेमाल दूसरे देशों के केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व में बड़े पैमाने पर करते हैं, तो उसे रिजर्व करेंसी कहा जाता है. इस क्षेत्र में डॉलर लंबे समय से प्रमुख मुद्रा रहा है.

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भारतीय अर्थव्यवस्था के वित्त वर्ष 27 में 7 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान: एसएंडपी ग्लोबल

मुंबई, 30 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 26 में 7.8 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की है और वित्त वर्ष 27 में इसके करीब 7 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है। यह जानकारी एसएंडपी ग्लोबल-क्रिसिल की रिपोर्ट में बुधवार को दी गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लोबल अनिश्चितता और अमेरिका के ऊंचे टैरिफ के बावजूद भारत की मजबूती, देश की घरेलू आर्थिक ताकतों को दिखाती है। हालांकि, जैसे-जैसे देश विकास के अगले चरण में प्रवेश करेगा, विकास दर के थोड़ा धीमा होने की उम्मीद है।

इंडिया फॉरवर्ड: रीइमैजिनिंग ग्रोथ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में देश की विकास दर के घटकर लगभग 7 प्रतिशत होने की उम्मीद है।

हालांकि, इसमें कहा गया है कि अगर भारत अपनी मैक्रो-इकोनॉमिक मजबूती को लंबे समय तक चलने वाली ग्रोथ की रफ्तार में सफलतापूर्वक बदल पाता है, तो वह अपनी विकास की गति को बनाए रखने की अच्छी स्थिति में रहेगा।

एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स के प्रेसिडेंट और क्रिसिल के बोर्ड चेयरमैन, यान ले पैलेक ने कहा कि भारत के पास इन्फ्रास्ट्रक्चर के लगातार विकास, अधिक प्रतिस्पर्धी संघवाद, गहरे पूंजीगत बाजार और मजबूत फाइनेंशियल इंटरमीडिएशन के जरिए अपनी आर्थिक मजबूती को और बढ़ाने का एक बड़ा मौका है।

रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की उम्मीद से बेहतर ग्रोथ घरेलू मांग की मजबूती और तेजी से बदलते अनिश्चित वैश्विक माहौल में भी अर्थव्यवस्था के आगे बढ़ने की क्षमता को दिखाती है।

इसमें कहा गया कि देश की ग्रोथ का अगला चरण निवेश की रफ्तार बनाए रखने और अहम आर्थिक संस्थानों को मजबूत करने पर निर्भर करेगा।

भू-राजनीतिक मोर्चे पर, अध्ययन में यह सुझाव दिया गया कि भारत वैश्विक मामलों में खुद को एक बैलेंसिंग पावर के बजाय एक लीडिंग पावर के तौर पर स्थापित कर रहा है।

रिपोर्ट में होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति में रुकावट के बाद ऊर्जा सुरक्षा को एक अहम चिंता के तौर पर भी बताया गया है।

भारत का आधे से ज्यादा कच्चा तेल आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है, जिससे यह देश इस रणनीतिक जलमार्ग में होने वाली रुकावटों से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में से एक बन जाता है।

रिपोर्ट में डिजिटल रुपए की बढ़ती संभावनाओं की ओर भी इशारा किया गया है और कहा गया है कि सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की चौथी परत के तौर पर उभर सकती है।

इसमें कहा गया है कि डिजिटल रुपया प्रोग्रामेबल मनी को संभव बना सकता है और तेजी से टोकनाइज हो रही ग्लोबल इकॉनमी में सीमा-पार व्यापार और रेमिटेंस को सॉवरेन करेंसी (सरकारी मुद्रा) से जोड़े रखने में मदद कर सकता है।

--आईएएनएस

एबीएस

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