बढ़ती महंगाई और महंगे कच्चे तेल के बीच आरबीआई पर बढ़ा दबाव, ब्याज दरें स्थिर रखना हो सकता है मुश्किल: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 29 सितंबर (आईएएनएस)। बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों, महंगाई के दबाव और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में तेजी के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए ब्याज दरों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। मंगलवार को जारी बीएनपी परिबास इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल के सप्ताहों में भारत का व्यापक आर्थिक परिदृश्य कुछ कमजोर हुआ है, जिससे मौद्रिक नीति पर दबाव बढ़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जबकि अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड 5 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है। इसके साथ ही दुनिया भर में महंगाई के दबाव बने हुए हैं और कई केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में वृद्धि का रास्ता अपना रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (एफसीएनआर) जमा के जरिए अपने बाहरी क्षेत्र को मजबूत किया है, लेकिन विकसित देशों में बढ़ती ब्याज दरों के कारण पूंजी निकासी का जोखिम भी बढ़ गया है। ऐसे माहौल में आरबीआई के लिए नीतिगत दरों को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखना कठिन हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में वृद्धि निकट अवधि में भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसी कारण रुपए पर दबाव बढ़ा है और आरबीआई के पास ब्याज दरें अपरिवर्तित रखने की गुंजाइश सीमित होती जा रही है।
बीएनपी परिबास इंडिया के भारतीय इक्विटी अनुसंधान प्रमुख कुणाल वोरा ने कहा कि भारत का व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण तेल कीमतों के प्रति बेहद संवेदनशील है और पश्चिम एशिया में ताजा तनाव देश के लिए नकारात्मक संकेत लेकर आया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो सप्ताह में रुपया लगभग 1 प्रतिशत कमजोर हुआ है। वहीं भारत की 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड 7 प्रतिशत के ऊपर पहुंच गई है और विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली भी फिर शुरू हो गई है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को एफसीएनआर जमा से समर्थन मिला है। अनुमानतः लगभग 127 अरब डॉलर के एफसीएनआर प्रवाह की मदद से विदेशी मुद्रा भंडार करीब 800 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इससे निकट अवधि में कुछ राहत मिली है, लेकिन ये प्रवाह अगले तीन से पांच वर्षों में वापस भी जा सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ऊंची महंगाई का असर आने वाले महीनों में उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतकों पर दिखाई दे सकता है। शहरी क्षेत्रों में मजदूरी वृद्धि में कमी, बढ़ती महंगाई और कारोबारी विश्वास में गिरावट जैसे संकेत उपभोग मांग पर असर डाल सकते हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मानसून की कमी, खाद्य मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी और फसल बुआई में कमी के कारण ग्रामीण मांग पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है।
इसके बावजूद रिपोर्ट ने कुछ सकारात्मक पहलुओं की भी ओर संकेत किया है। इनमें मजबूत ऋण वृद्धि, ऑटो बिक्री में मजबूती, रोजगार संबंधी आंकड़ों में सुधार और खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार शामिल है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने में सहायक हो सकते हैं।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
Explainer: देश की पहली LNG ट्रेन बनाम हाइड्रोजन ट्रेन, दोनों में क्या है अंतर? जानिए पावर और खासियत
भारतीय रेलवे वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में लगातार काम कर रहा है. इसी कड़ी में साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में 1400 HP क्षमता वाली दो DPCs को डुअल-फ्यूल तकनीक के लिए तैयार किया गया है. इस तकनीक के जरिए ट्रेन को डीजल के साथ LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस से भी चलाया जा सकता है.
2000 किलोमीटर से ज्यादा का ट्रायल
नई तकनीक की वास्तविक परिस्थितियों में क्षमता और विश्वसनीयता जांचने के लिए दोनों मॉडिफाइड DPCs का 2000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक फील्ड ट्रायल किया गया है. ट्रायल का उद्देश्य यह देखना है कि डुअल-फ्यूल सिस्टम लंबे समय तक परिचालन के दौरान कितना प्रभावी और भरोसेमंद रहता है.
डीजल की खपत में 40% तक कमी
रेलवे के ट्रायल से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, LNG के इस्तेमाल से डीजल की खपत करीब 40 प्रतिशत तक घटाई जा सकती है. इससे ईंधन खर्च कम होने के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे प्रदूषकों के उत्सर्जन में भी कमी आने की उम्मीद है. इस तकनीक की एक खास बात यह है कि ट्रेन ईंधन की उपलब्धता के अनुसार LNG या डीजल पर चल सकती है. यानी किसी एक ईंधन की उपलब्धता कम होने पर दूसरे ईंधन का इस्तेमाल किया जा सकता है.
एक टैंक में 1600 किलोमीटर तक चलने की क्षमता
डुअल-फ्यूल सिस्टम को इस तरह तैयार किया गया है कि LNG के इस्तेमाल के बावजूद इंजन की कार्यक्षमता और पावर में जरूरी संतुलन बना रहे. प्रत्येक मॉडिफाइड DPC में करीब 2200 लीटर क्षमता का LNG टैंक लगाया गया है. इस टैंक में लगभग 850 से 900 किलोग्राम उपयोग योग्य LNG स्टोर की जा सकती है. रेलवे के अनुसार, LNG का एक पूरा टैंक ट्रेन को करीब 1600 किलोमीटर तक चलाने में मदद कर सकता है. इससे बार-बार ईंधन भरने की जरूरत कम हो सकती है.
साबरमती-महेसाणा के बीच चल रही LNG-डीजल ट्रेन
पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन साबरमती और महेसाणा जंक्शन के बीच संचालित की जा रही है. यह 8 कोच वाली नॉन-एसी चेयर कार ट्रेन है. हालांकि, इसका स्थायी नियमित रूट अभी निर्धारित नहीं किया गया है। रेलवे की ओर से मार्ग को लेकर अंतिम निर्णय के बाद इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी.
LNG और हाइड्रोजन ट्रेन में क्या अंतर है?
LNG और हाइड्रोजन ट्रेन दोनों वैकल्पिक ईंधन तकनीक पर आधारित हैं, लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है. हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल-सेल तकनीक के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली पैदा की जाती है. इसके संचालन के दौरान मुख्य बाई-प्रोडक्ट के तौर पर जल-वाष्प निकलती है. दूसरी ओर, LNG ट्रेन में इंटरनल-कंबशन इंजन का इस्तेमाल होता है। इसमें मौजूदा डीजल इंजन को डुअल-फ्यूल सिस्टम के लिए मॉडिफाई किया जाता है, ताकि LNG के साथ डीजल का भी इस्तेमाल किया जा सके. इस व्यवस्था से डीजल की खपत में करीब 40 प्रतिशत तक कमी का लक्ष्य रखा गया है.
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन ने भी शुरू किया संचालन
भारतीय रेलवे ने 17 जुलाई 2026 को हरियाणा में जींद और सोनीपत के बीच देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी. रेल मंत्रालय के मुताबिक, 25 जुलाई तक इस ट्रेन ने 1200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय की और इस दौरान 3200 लीटर से अधिक डीजल की बचत हुई. हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन से अलग तरीके से काम करती है. इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए ट्रेन के भीतर बिजली तैयार होती है। इस प्रक्रिया में मुख्य उत्सर्जन जल-वाष्प के रूप में होता है. इस ट्रेन में कुल 10 कोच हैं। इनमें दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कारें शामिल हैं. ट्रेन की कुल क्षमता 2,400 kW है। इसमें लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरी और हाइड्रोजन स्टोरेज सिलेंडर भी लगाए गए हैं.
पर्यावरण के लिहाज से LNG और हाइड्रोजन में अंतर
पर्यावरणीय प्रभाव की बात करें तो हाइड्रोजन फ्यूल-सेल ट्रेन का टेलपाइप उत्सर्जन LNG-डीजल ट्रेन की तुलना में काफी कम होता है, क्योंकि फ्यूल-सेल प्रक्रिया में मुख्य उत्पाद के रूप में जल-वाष्प बनती है. वहीं LNG एक जीवाश्म ईंधन है और इसके इस्तेमाल से उत्सर्जन पूरी तरह खत्म नहीं होता. हालांकि, डीजल की जगह LNG के एक हिस्से का इस्तेमाल करने से डीजल की खपत और कुछ प्रदूषक उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है. इस तरह दोनों तकनीकों का उद्देश्य रेलवे को पारंपरिक डीजल पर निर्भरता से धीरे-धीरे दूर ले जाना है। LNG तकनीक मौजूदा डीजल इंजन को वैकल्पिक ईंधन के साथ चलाने का रास्ता देती है, जबकि हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक ट्रेन के लिए बिजली पैदा करने का अलग तरीका अपनाती है.
ये भी पढे़ं: बढ़ती क्षमता उपयोग और मजबूत मांग से नए पूंजीगत निवेश चक्र को मिल रहा बढ़ावा, बढ़ा उद्योग जगत का भरोसा: फिक्की अध्यक्ष
ये भी पढे़ं: दिल की बीमारी के ये शुरुआती संकेत भूलकर भी न करें नजरअंदाज, जानें शरीर कैसे देता है चेतावनी
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation









