Explainer: देश की पहली LNG ट्रेन बनाम हाइड्रोजन ट्रेन, दोनों में क्या है अंतर? जानिए पावर और खासियत
भारतीय रेलवे वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की दिशा में लगातार काम कर रहा है. इसी कड़ी में साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में 1400 HP क्षमता वाली दो DPCs को डुअल-फ्यूल तकनीक के लिए तैयार किया गया है. इस तकनीक के जरिए ट्रेन को डीजल के साथ LNG यानी लिक्विफाइड नेचुरल गैस से भी चलाया जा सकता है.
2000 किलोमीटर से ज्यादा का ट्रायल
नई तकनीक की वास्तविक परिस्थितियों में क्षमता और विश्वसनीयता जांचने के लिए दोनों मॉडिफाइड DPCs का 2000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक फील्ड ट्रायल किया गया है. ट्रायल का उद्देश्य यह देखना है कि डुअल-फ्यूल सिस्टम लंबे समय तक परिचालन के दौरान कितना प्रभावी और भरोसेमंद रहता है.
डीजल की खपत में 40% तक कमी
रेलवे के ट्रायल से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, LNG के इस्तेमाल से डीजल की खपत करीब 40 प्रतिशत तक घटाई जा सकती है. इससे ईंधन खर्च कम होने के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे प्रदूषकों के उत्सर्जन में भी कमी आने की उम्मीद है. इस तकनीक की एक खास बात यह है कि ट्रेन ईंधन की उपलब्धता के अनुसार LNG या डीजल पर चल सकती है. यानी किसी एक ईंधन की उपलब्धता कम होने पर दूसरे ईंधन का इस्तेमाल किया जा सकता है.
एक टैंक में 1600 किलोमीटर तक चलने की क्षमता
डुअल-फ्यूल सिस्टम को इस तरह तैयार किया गया है कि LNG के इस्तेमाल के बावजूद इंजन की कार्यक्षमता और पावर में जरूरी संतुलन बना रहे. प्रत्येक मॉडिफाइड DPC में करीब 2200 लीटर क्षमता का LNG टैंक लगाया गया है. इस टैंक में लगभग 850 से 900 किलोग्राम उपयोग योग्य LNG स्टोर की जा सकती है. रेलवे के अनुसार, LNG का एक पूरा टैंक ट्रेन को करीब 1600 किलोमीटर तक चलाने में मदद कर सकता है. इससे बार-बार ईंधन भरने की जरूरत कम हो सकती है.
साबरमती-महेसाणा के बीच चल रही LNG-डीजल ट्रेन
पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल DEMU ट्रेन साबरमती और महेसाणा जंक्शन के बीच संचालित की जा रही है. यह 8 कोच वाली नॉन-एसी चेयर कार ट्रेन है. हालांकि, इसका स्थायी नियमित रूट अभी निर्धारित नहीं किया गया है। रेलवे की ओर से मार्ग को लेकर अंतिम निर्णय के बाद इसकी जानकारी सार्वजनिक की जाएगी.
LNG और हाइड्रोजन ट्रेन में क्या अंतर है?
LNG और हाइड्रोजन ट्रेन दोनों वैकल्पिक ईंधन तकनीक पर आधारित हैं, लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है. हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल-सेल तकनीक के जरिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया से बिजली पैदा की जाती है. इसके संचालन के दौरान मुख्य बाई-प्रोडक्ट के तौर पर जल-वाष्प निकलती है. दूसरी ओर, LNG ट्रेन में इंटरनल-कंबशन इंजन का इस्तेमाल होता है। इसमें मौजूदा डीजल इंजन को डुअल-फ्यूल सिस्टम के लिए मॉडिफाई किया जाता है, ताकि LNG के साथ डीजल का भी इस्तेमाल किया जा सके. इस व्यवस्था से डीजल की खपत में करीब 40 प्रतिशत तक कमी का लक्ष्य रखा गया है.
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन ने भी शुरू किया संचालन
भारतीय रेलवे ने 17 जुलाई 2026 को हरियाणा में जींद और सोनीपत के बीच देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी. रेल मंत्रालय के मुताबिक, 25 जुलाई तक इस ट्रेन ने 1200 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय की और इस दौरान 3200 लीटर से अधिक डीजल की बचत हुई. हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजन से अलग तरीके से काम करती है. इसमें हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए ट्रेन के भीतर बिजली तैयार होती है। इस प्रक्रिया में मुख्य उत्सर्जन जल-वाष्प के रूप में होता है. इस ट्रेन में कुल 10 कोच हैं। इनमें दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कारें शामिल हैं. ट्रेन की कुल क्षमता 2,400 kW है। इसमें लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरी और हाइड्रोजन स्टोरेज सिलेंडर भी लगाए गए हैं.
पर्यावरण के लिहाज से LNG और हाइड्रोजन में अंतर
पर्यावरणीय प्रभाव की बात करें तो हाइड्रोजन फ्यूल-सेल ट्रेन का टेलपाइप उत्सर्जन LNG-डीजल ट्रेन की तुलना में काफी कम होता है, क्योंकि फ्यूल-सेल प्रक्रिया में मुख्य उत्पाद के रूप में जल-वाष्प बनती है. वहीं LNG एक जीवाश्म ईंधन है और इसके इस्तेमाल से उत्सर्जन पूरी तरह खत्म नहीं होता. हालांकि, डीजल की जगह LNG के एक हिस्से का इस्तेमाल करने से डीजल की खपत और कुछ प्रदूषक उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है. इस तरह दोनों तकनीकों का उद्देश्य रेलवे को पारंपरिक डीजल पर निर्भरता से धीरे-धीरे दूर ले जाना है। LNG तकनीक मौजूदा डीजल इंजन को वैकल्पिक ईंधन के साथ चलाने का रास्ता देती है, जबकि हाइड्रोजन फ्यूल-सेल तकनीक ट्रेन के लिए बिजली पैदा करने का अलग तरीका अपनाती है.
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हवाई यात्रा की मांग एयरलाइंस की क्षमता वृद्धि से तेज, कनेक्टिविटी बढ़ाना अगली बड़ी प्राथमिकता: नागर विमानन मंत्री
नई दिल्ली, 29 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय नागर विमानन मंत्री राम मोहन नायडू ने मंगलवार को कहा कि भारत का विमानन बाजार एयरलाइंस द्वारा जोड़ी जा रही क्षमता की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह रुझान देश में हवाई यात्रा की बढ़ती मांग को दर्शाता है और भविष्य में विमानन क्षमता तथा कनेक्टिविटी के विस्तार की आवश्यकता को और मजबूत करता है।
एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए नायडू ने बताया कि पिछले एक दशक में भारत में रेवेन्यू पैसेंजर किलोमीटर (आरपीके) की वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) रही है, जबकि एयरलाइंस द्वारा उपलब्ध कराई गई सीट क्षमता, यानी एवेलेबल सीट किलोमीटर (एएसके), की वृद्धि दर 7 प्रतिशत सीएजीआर रही है।
उन्होंने कहा, इसका मतलब है कि बाजार सीटों की उपलब्धता से अधिक तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बताती है कि आने वाले वर्षों में हवाई यात्रा की मांग को पूरा करने के लिए अतिरिक्त क्षमता निर्माण और बेहतर कनेक्टिविटी पर लगातार निवेश करना होगा।
भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाजार बन चुका है। बढ़ती आय, क्षेत्रीय संपर्क में सुधार और हवाई यात्रा की बढ़ती मांग ने इस वृद्धि को गति दी है। सरकार अब भारत को आने वाले वर्षों में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा समग्र विमानन बाजार बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
इस तेजी से बढ़ती मांग को समर्थन देने के लिए सरकार बड़े स्तर पर एयरपोर्ट नेटवर्क का विस्तार कर रही है। नायडू ने बताया कि वर्ष 2014 में देश में केवल 74 परिचालन एयरपोर्ट थे, जबकि वर्तमान में उनकी संख्या बढ़कर 166 से अधिक हो चुकी है।
सरकार ने वर्ष 2047 तक 400 एयरपोर्ट विकसित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। मंत्री ने कहा कि फिलहाल 66 एयरपोर्ट विकासाधीन हैं, जबकि अगले दस वर्षों में 100 नए एयरपोर्ट विकसित करने की योजना है, जिसका उद्देश्य देशभर में हवाई संपर्क को और मजबूत बनाना है।
नायडू ने यह भी घोषणा की कि विमानन उद्योग के प्रमुख वैश्विक नेटवर्किंग और रूट डेवलपमेंट कार्यक्रमों में से एक रूट्स एशिया 2027 का आयोजन भारत में 16 से 18 मार्च 2027 के बीच किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि यह आयोजन भारत की क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी को नई गति देगा। उन्होंने कहा कि जब पूरी दुनिया बेहतर संपर्क की दिशा में आगे बढ़ रही है, तब भारत में इस कार्यक्रम का आयोजन देश की बढ़ती विमानन क्षमता और वैश्विक महत्व को दर्शाता है।
मंत्री ने कहा कि पिछले दो वर्षों में भारत ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय विमानन कार्यक्रमों की मेजबानी की है। इनमें आईसीएओ एशिया-प्रशांत मंत्रिस्तरीय सम्मेलन, ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और आईएटीए की 81वीं वार्षिक आम बैठक शामिल हैं। अब रूट्स एशिया 2027 का आयोजन भी भारत की वैश्विक विमानन क्षेत्र में बढ़ती भूमिका को मजबूत करेगा।
उन्होंने कहा कि एयरपोर्ट नेटवर्क के विस्तार के बाद सरकार का अगला बड़ा लक्ष्य कनेक्टिविटी को और बेहतर बनाना है, ताकि देश के अधिक से अधिक शहर और क्षेत्र राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय हवाई नेटवर्क से जुड़ सकें।
--आईएएनएस
डीबीपी
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