पाकिस्तान में महंगाई और बेरोजगारी से परेशान जेन-जेड, बढ़ रहा असंतोष: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। पाकिस्तान की करीब 60 प्रतिशत आबादी 30 वर्ष से कम ही है और यह देश एक महत्वपूर्ण परीक्षा का सामना कर रहा है जो इसके आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक भविष्य को आकार दे सकती है। यह जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई।
मेडियालाइन की रिपोर्ट में कहा गया कि देश की सबसे बड़ी और डिजिटल रूप से सबसे अधिक जुड़ी पीढ़ी, जेनरेशन जेड, में बदलाव लाने की क्षमता है। यह आबादी ऐसे समय में वयस्कता में प्रवेश कर रही है जब आशा से कहीं अधिक असुरक्षा व्याप्त है।
युवा बेरोजगारी का स्तर उच्च बना हुआ है, मुद्रास्फीति ने क्रय शक्ति को कम कर दिया है, और स्थिर नौकरियां मिलना कठिन होता जा रहा है।
कई युवा पाकिस्तानियों नागरिकों के लिए, अब जीवनयापन और स्थिरता की महत्वाकांक्षा या दीर्घकालिक सपनों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, आर्थिक कठिनाई, राजनीतिक अनिश्चितता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ती पाबंदियों के कारण कई युवा निराश हो रहे हैं और देश छोड़ रहे हैं।
प्रवासन सोच को भी बदल रहा है। जैसे-जैसे अधिक लोग, विशेषकर मध्यम वर्ग के लोग, देश छोड़ रहे हैं, यह धारणा फैल रही है कि शिक्षा और कड़ी मेहनत अब प्रगति की गारंटी नहीं हैं।
शिक्षा व्यवस्था स्वयं संघर्ष कर रही है। साक्षरता का स्तर कम बना हुआ है, लाखों बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं, और लैंगिक असमानता बनी हुई है क्योंकि कई लड़कियां कम उम्र में शादी या घरेलू जिम्मेदारियों के कारण स्कूल छोड़ देती हैं, जबकि लड़के अकसर कमाने के लिए जल्दी स्कूल छोड़ देते हैं।
इससे कौशल अंतर बढ़ गया है और कई युवा विशेष रूप से बलूचिस्तान जैसे अविकसित क्षेत्रों में आधुनिक, प्रौद्योगिकी-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए तैयार नहीं हैं।
सरकारी संस्थाओं पर भरोसा कम हो गया है, और परिणामों के डर से खुले तौर पर राजनीतिक भागीदारी कम हो गई है।
हालांकि, सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है, लेकिन कड़े नियंत्रणों ने कई युवाओं को चुप रहने या पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है।
मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां, जलवायु आपदाओं और लगातार डिजिटल संपर्क ने इन दबावों को और भी बदतर बना दिया है, जिससे युवाओं में चिंता और निराशा की भावना बढ़ गई है।
सरकारी बयानों और युवाओं के अनुभवों के बीच बढ़ता अंतर इस महीने की शुरुआत में तब सामने आया जब अमेरिका में पढ़ाई कर रहे पाकिस्तानी पीएचडी छात्र जोरैन निजामानी का एक लेख द एक्सप्रेस ट्रिब्यून से प्रकाशन के तुरंत बाद हटा दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, लेख में जेनरेशन जेड के संघर्षों पर चर्चा की गई थी और कुछ लोगों ने इसे पाकिस्तान की सत्ता संरचना की आलोचना के रूप में देखा।
हालांकि, निजामानी ने किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं किया, लेकिन अधिकारियों ने कथित तौर पर लेख को गंभीरता से लिया और अखबार ने बाद में इसे हटा दिया।
--आईएएनएस
एबीएस/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
केंद्रीय बजट 2026 से उद्योग जगत को बड़ी घोषणाओं से ज्यादा नीति स्थिरता और स्पष्टता की उम्मीद: सर्वे
नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय बजट 2026-27 पेश होने का समय करीब आते ही उद्योग जगत की सोच में एक साफ बदलाव दिखाई दे रहा है। अब कंपनियां बड़ी घोषणाओं से ज्यादा नीतियों की दिशा, निरंतरता और सही तरीके से अमल पर ध्यान दे रही हैं। यह जानकारी सोमवार को एक सर्वेक्षण में सामने आई है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत के प्री-बजट सर्वे 2026 के अनुसार, दुनिया में बढ़ती अनिश्चितता और सरकार के राजकोषीय घाटे को धीरे-धीरे कम करने की योजना के बीच बजट 2026 को भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक सोच का संकेत माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य घाटे को जीडीपी के करीब 4.4 प्रतिशत तक लाने का है।
अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था 6.5 से 7 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। केंद्र सरकार का पूंजीगत खर्च अब वित्त वर्ष 2020 की तुलना में तीन गुना से ज्यादा हो चुका है। ऐसे में कंपनियां लंबे समय के फैसलों के लिए स्थिर नीतियां, व्यावहारिक प्रोत्साहन और आसान प्रक्रिया चाहती हैं, न कि छोटे और अस्थायी उपाय।
सर्वे के मुताबिक, उद्योग जगत संतुलित रणनीति के पक्ष में है। करीब 35 प्रतिशत लोगों का मानना है कि विकास और रोजगार को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, भले ही घाटा कम करने की रफ्तार थोड़ी धीमी हो।
वहीं 28 प्रतिशत लोग घाटा नियंत्रण और विकास खर्च के बीच संतुलन चाहते हैं। इसके अलावा 26 प्रतिशत लोगों ने निवेशकों का भरोसा बनाए रखने के लिए कड़ी वित्तीय अनुशासन पर जोर दिया है।
व्यापार के मोर्चे पर सरल और भरोसेमंद निर्यात प्रोत्साहन व्यवस्था को सबसे जरूरी माना गया है। इसे 40 प्रतिशत लोगों का समर्थन मिला। इसके बाद 31 प्रतिशत ने प्रमुख देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पूरे करने पर जोर दिया।
नए आयकर कानून की ओर बदलाव के दौरान कंपनियां परेशानी कम चाहती हैं। 28 प्रतिशत लोग जुर्माने में ढील के साथ ज्यादा समय चाहते हैं। 26 प्रतिशत विशेष सहायता केंद्रों की मांग कर रहे हैं, जबकि 25 प्रतिशत उद्योग और सरकार के बीच सीधी बातचीत पर जोर दे रहे हैं।
नौकरीपेशा करदाताओं के लिए 44 प्रतिशत का मानना है कि कम टैक्स दरें या ज्यादा टैक्स स्लैब नई कर व्यवस्था को आकर्षक बना सकते हैं। वहीं 26 प्रतिशत सीमित कटौतियों की मांग कर रहे हैं।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि इनोवेशन फंड और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर टैक्स छूट को सबसे असरदार उपाय माना गया है। इससे नई तकनीक पर खर्च और जोखिम दोनों कम होते हैं। साथ ही सरकार-निजी साझेदारी को भी जरूरी बताया गया है।
लंबे समय के निवेश के लिए स्पष्टता और भरोसा सबसे जरूरी माने गए हैं। करीब 41 प्रतिशत लोगों ने इनविटेशनल इन्वेस्टमेंट्स (इनविट्स), रीइट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड के लिए स्थिर टैक्स व्यवस्था की मांग की है।
इसके बाद 23 प्रतिशत ने पीपीपी परियोजनाओं में टैक्स स्पष्टता और 19 प्रतिशत ने विदेशी फंडिंग की मंजूरी प्रक्रिया को आसान करने पर जोर दिया।
नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण को 43 प्रतिशत ने सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया। इसके बाद शहरी ढांचा (26 प्रतिशत) और परिवहन व लॉजिस्टिक्स (21 प्रतिशत) का स्थान रहा।
40 प्रतिशत उद्योगों ने लाइसेंस और नियमों को सरल बनाने को सबसे जरूरी बताया, जबकि 33 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकारी सेवाएं तय समय में पूरी हों।
सर्वे में कहा गया कि टैक्स विवादों का जल्दी समाधान जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी स्पष्ट नियम और आसान प्रक्रिया है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत की टैक्स पार्टनर रिचा साहनी ने कहा कि टैक्स, व्यापार और कस्टम्स हर क्षेत्र में कंपनियां स्पष्टता और स्थिरता चाहती हैं, ताकि काम बिना रुकावट आगे बढ़ सके।
कस्टम्स के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार नियम और जरूरी कच्चे माल पर कम शुल्क को सबसे कारगर उपाय बताया गया है। साथ ही ड्यूटी की स्पष्ट योजना की भी जरूरत बताई गई है।
--आईएएनएस
डीबीपी/वीसी
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