China Factory Fire: चीन की टेक्सटाइल फैक्ट्री में भीषण आग, 8 लोगों की मौत; एक घायल, रेस्क्यू जारी
चीन के फोशान शहर में एक टेक्सटाइल फैक्ट्री में भीषण आग लगने से कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई है। हादसे में एक व्यक्ति घायल हुआ है, जिसे इलाज के लिए नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना रविवार दोपहर करीब 3 बजे की बताई जा रही है। फोशान शहर चीन के ग्वांगडोंग प्रांत में स्थित है।
रेस्क्यू ऑपरेशन जारी
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने सोमवार को हादसे की जानकारी दी। रिपोर्ट के मुताबिक, आग के बाद राहत और बचाव अभियान जारी है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस की टीमें मौके पर मौजूद हैं और घटना से जुड़े हालात की जांच कर रही हैं। घायल व्यक्ति का अस्पताल में इलाज चल रहा है।
आग लगने के कारणों की जांच
फिलहाल फैक्ट्री में आग लगने की वजह स्पष्ट नहीं हो पाई है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने घटना के कारणों की जांच शुरू कर दी है। अधिकारियों की ओर से आग लगने की वजह और हादसे से जुड़े अन्य विवरणों की जांच की जा रही है। राहत-बचाव अभियान पूरा होने के बाद घटना से जुड़ी अधिक जानकारी सामने आने की उम्मीद है।
24 घंटे का लॉकडाउन : पूरी तरह सील रहा रोहतक का खरक जाटान गांव, जानिए 300 साल पुरानी परंपरा जब 1 दिन नहीं जलता चूल्हा
हरियाणा के रोहतक जिले में स्थित ऐतिहासिक महम चौबीसी का खरक जाटान गांव इन दिनों सोशल मीडिया पर एक खास वजह से चर्चा में है। आधुनिकता के इस दौर में जहां लोग अपनी पुरानी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं, वहीं इस गांव के निवासियों ने 300 साल पुरानी एक ऐसी अनूठी रीत को आज भी संभाल कर रखा है, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है।
भाद्रपद महीने के शनिवार को खरक जाटान के ग्रामीणों ने स्वेच्छा से 24 घंटे का बंद (लॉकडाउन) रखा। शुक्रवार रात 12 बजे से शुरू हुआ यह अलगाव शनिवार रात 12 बजे तक चला। इस दौरान न तो कोई ग्रामीण गांव से बाहर गया और न ही किसी बाहरी व्यक्ति को सीमा के भीतर आने दिया गया।
ये है 300 साल पुराने लोकविश्वास और अलगाव की कहानी
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि इस परंपरा के पीछे एक पुराना लोकविश्वास जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि सदियों पहले गांव में मासूम बच्चों और मवेशियों में एक जानलेवा बीमारी फैल गई थी। उस दौर में गांव में रहने वाले एक साधु ने ग्रामीणों को बीमारी रोकने और संक्रमण की कड़ी को तोड़ने के लिए एक दिन गांव को आसपास के इलाकों से पूरी तरह अलग रखने की सलाह दी थी।
ग्रामीणों ने साधु की बात मानी और बीमारी खत्म हो गई। इसी व्यावहारिक सोच के बाद से भाद्रपद महीने के शनिवार को गांव बंद रखने की यह परंपरा चली आ रही है।
सीमा पर खींची गई रेखा, रात भर युवाओं ने दिया पहरा
इस बंद को लेकर गांव में पहले ही ढोल बजवाकर मुनादी करवा दी गई थी। शहरों में रहने वाले लोग भी बंद शुरू होने से पहले गांव पहुंच गए। शुक्रवार रात को गांव की सीमा (फिरनी) के आसपास प्रतीकात्मक रेखा खींची गई और रात 12 बजे आवागमन पूरी तरह बंद कर दिया गया। गांव की गलियों से लेकर सीमाओं तक युवाओं और ग्रामीणों ने खुद पहरा दिया। आवश्यक कार्य ग्रामीणों ने एक दिन पहले ही निपटा लिए थे।
घरों में बंद रहा चूल्हा
इस दौरान किसी भी घर में भोजन नहीं बनाया गया और न ही चूल्हा जलाया गया। एक दिन पहले तैयार किए गए मीठे पकवान जैसे खीर, मीठी रोटी, सुहाली और गुलगुले ही भोजन के रूप में खाए गए। नमकीन भोजन से पूरी तरह परहेज रखा गया और यह नियम सभी के लिए अनिवार्य था।
हवन, धूनी और मवेशियों की विशेष सेवा
शनिवार सुबह सामूहिक हवन-यज्ञ (धूणा) किया गया और धूनी की आंच पर खीर तैयार कर ग्रामीणों में बांटी गई। पशुओं की सेवा भी इस परंपरा का मुख्य हिस्सा रही। बंद समाप्त होने के बाद पशुओं को आयोजन स्थल पर लाकर पवित्र जल का डाभ से झाड़ा लगाया गया। गलियों और घरों में लोबान, गुग्गल व धूप की धूनी भी दी गई।
गीत-संगीत और सांस्कृतिक विरासत का समागम
बंद के दौरान महिलाओं ने सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन किया। युवाओं और बच्चों ने कबड्डी जैसे पारंपरिक खेलों में हिस्सा लिया। जोगियों ने गांव में आल्हा और रांझा गाकर सुनाया, जो गांव की सुख-समृद्धि से जुड़ा माना जाता है।
एकजुटता और संस्कृति को सहेजा गया
वरिष्ठ भाजपा नेता शमशेर सिंह खरक और ग्रामीणों ने कहा कि खरक जाटान ने बदलते समय के बावजूद अपनी परंपरा को जीवित रखा है। यह आयोजन केवल 24 घंटे के बंद तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव की सामूहिक एकजुटता, लोकविश्वास, पशु सेवा और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है।
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