नंदा देवी राजजात को लेकर एक मत नहीं कुरुड़-नौटी:राजकुंवर बोल चुके- ऊंचे इलाकों में व्यवस्था नहीं, माता बोलीं- मुझे मेरे ऊंचे कैलाश जाना है
चमोली जिले में 2026 में होने वाली नंदादेवी राजजात यात्रा को लेकर विवाद गहरा गया है। एक तरफ कुरुड़ मंदिर में देवी के पाश्वा (देवी का अवतार) ने कैलाश जाने की इच्छा जताई है, जिसके बाद गौड़ ब्राह्मणों ने यात्रा की तिथियां घोषित कर दी हैं। वहीं, दूसरी ओर नौटी में राजा के प्रतिनिधियों ने यात्रा मार्गों की अधूरी तैयारियों के चलते यात्रा को स्थगित करने का निर्णय लिया है। इस विवाद के बीच वाण गांव के लोग और यात्रा संचालन में अहम भूमिका निभाने वाले बधान पट्टी के 14 बुजुर्ग असमंजस में हैं। उनका कहना है कि जब तक राजा और राज्य सरकार औपचारिक रूप से राजजात के लिए सहमति नहीं देते, तब तक वे यात्रा में शामिल नहीं होंगे। ऐसे में बिना सरकारी सहयोग के इस विशाल धार्मिक यात्रा का संचालन एक बड़ी चुनौती बन गया है, खासकर निर्जन पड़ावों में श्रद्धालुओं की सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर। वाण गांव में हुई बैठक में ग्रामीणों ने कुरुड़ और नौटी के लोगों के बीच आपसी मध्यस्थता के बाद ही यात्रा के आयोजन की मांग की है। उनका कहना है कि नंदा देवी राजजात एक पवित्र और ऐतिहासिक यात्रा है, जिसका आयोजन आपसी समन्वय, परंपराओं के सम्मान और शासन-प्रशासन के सहयोग से ही संभव है। पहले जानिए एक पक्ष का क्या कुछ कहना है? बड़ी नंदा जात 2026 की तिथियों का ऐलान- कुरुड़ गांव में एक पक्ष ने उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा देवी की ऐतिहासिक बड़ी नंदा जात 2026 की तिथियों का ऐलान कर दिया है। वसंत पंचमी के पावन अवसर पर चमोली जिले के नंदानगर स्थित सिद्धपीठ नंदाधाम कुरुड़ में यह घोषणा विधिवत रूप से की गई। मां नंदा देवी का पार्श्व अवतरण हुआ- गौड़ पुजारियों और मंदिर समिति की उपस्थिति में 'दिन पट्टा' निकाला गया, जिसके साथ ही बड़ी नंदा जात की तिथियां सार्वजनिक की गईं। इस शुभ अवसर पर मां नंदा देवी का पार्श्व अवतरण हुआ, जिसके बाद परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ बड़ी जात के शुभारंभ की आधिकारिक घोषणा की गई। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी- मंदिर प्रांगण में आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, जो इस ऐतिहासिक यात्रा के प्रति लोगों की गहरी आस्था का प्रतीक है। पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला, जो इस यात्रा के महत्व और लोकप्रियता को दर्शाता है। 5 सितंबर 2026 को शुरू होगी यात्रा- तय कार्यक्रम के अनुसार मां नंदा देवी की डोली 5 सितंबर 2026 को नंदाधाम कुरुड़ से अपनी यात्रा शुरू करेगी। विभिन्न पड़ावों से होते हुए 16 सितंबर को डोली अपने धर्म भाई के गांव वाण पहुंचेगी। बड़ी नंदा जात 20 सितंबर को अपने अंतिम पड़ाव कैलाश (होमकुंड) पहुंचेगी, जहां विधिवत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मां नंदा देवी को कैलाश के लिए विदा किया जाएगा। इसके बाद श्रद्धालु परंपरा अनुसार जामुन डाली लौटेंगे। 2027 में यात्रा कराने पर अड़ा दूसरा पक्ष 2027 में होगा आयोजन- दूसरे पक्ष का कहना है कि यात्रा के लिए अभी प्रशासनिक तैयारियां पूरी नहीं हुई हैं। राजकुंवर डॉ. राकेश कुंवर ने बताया कि वर्ष 2027 की वसंत पंचमी को राजजात का दिनपट्टा जारी किया जाएगा। उन्होंने सरकार से एक वर्ष के भीतर आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने की मांग भी रखी है, ताकि यात्रा को सुचारू रूप से संपन्न कराया जा सके। मनौती की छंतोली का आगमन- घोषणा से पहले गुरुवार शाम को राजकुंवर कांसुवा से मनौती की छंतोली लेकर नौटी पहुंचे थे। वसंत पंचमी के मौके पर शुक्रवार सुबह से ही नंदा देवी मंदिर नौटी में विधिवत धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो गए थे। परंपरा का निर्वहन- राजजात समिति के सचिव भुवन नौटियाल ने बताया कि वर्ष 2026 में राजजात केवल प्रस्तावित थी, जबकि परंपरा के अनुसार राजजात की घोषणा मनौती के दौरान ही की जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 2024 में पहला अनुष्ठान मौडवी में संपन्न हुआ था और अब दूसरा अनुष्ठान मनौती का चल रहा है। कांसुवा में पूजा-अर्चना- इससे पूर्व राजकुंवरों के गांव कांसुवा में मनौती की छंतोली की पूजा संपन्न की गई। दोपहर बाद ढोल-दमाऊं और भंकोरों की मंगल धुनों के साथ मनौती की छंतोली पैदल नौटी के लिए रवाना हुई। मनौती पूर्ण होने के बाद की घोषणा- राजजात के अध्यक्ष डॉ. राकेश कुंवर ने बताया कि मनौती पूर्ण होने के बाद विधिवत रूप से राजजात की घोषणा की गई है और अब वर्ष 2027 में भव्य आयोजन की तैयारियां शुरू की जाएंगी। 3 प्वॉइंट्स में समझिए नौटी-कुरुड़ विवाद 12 वर्ष की परंपरा में कभी नहीं हुई यात्रा लाटू देवता के पुजारी खीम सिंह नेगी ने बताया कि यह पहली बार नहीं है जब राजजात यात्रा अपने तय समय से टली है। इससे पहले वर्ष 2012 में भी यात्रा प्रस्तावित थी, लेकिन विभिन्न कारणों से इसे स्थगित कर दिया गया था। 2014 में आयोजित नंदादेवी राजजात यात्रा में श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व भीड़ उमड़ी, जिसने इसे विश्व प्रसिद्ध बना दिया। यह यात्रा न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और पर्यटन को भी बढ़ावा देती है। 1843 से 2000 तक की यात्राओं के बीच 14 से 26 वर्षों का अंतराल रहा है। उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार 1843 में यात्रा आयोजित हुई, इसके बाद 1863, 1886, 1905, 1925, 1951, 1968, 1987 और फिर 2000 में राजजात यात्रा संपन्न हुई। इन सभी आयोजनों के बीच अंतराल 14 से 26 वर्षों तक रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि 12 वर्ष की परंपरा व्यवहार में कभी स्थापित नहीं हो पाई। अब नंदा देवी राजजात के बारे में जानिए... यह उत्तराखंड की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा है, जिसमें देवी नंदा को उनके ससुराल कैलाश भेजने के लिए लंबी पैदल यात्रा की जाती है। यात्रा करीब 280 किमी की होती है, जिसे राज्य की सबसे लंबी धार्मिक पैदल यात्रा भी कहते हैं। इसमें चौसिंगा खाडू और रिंगाल की छंतोलियां मुख्य आकर्षण होती हैं। यह देवी के मायके से कैलाश लौटने का प्रतीक मानी जाती है। यात्रा में रूपकुंड और शैल समुद्र ग्लेशियर के पास से होते हुए कैलाश (होमकुंड) तक जाया जाता है। वाण गांव के बाद चमड़े की वस्तुएं, गाजे-बाजे, महिलाएं और बच्चे आगे नहीं जाते। यह एशिया की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है, जिसमें सैकड़ों देवी-देवताओं की डोलियां और हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
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