बदलती वैश्विक राजनीति में भारत के सामने बार-बार यह सवाल खड़ा होता है—क्या अमेरिका भारत के लिए अधिक महत्वपूर्ण है या फिर यूरोप? यूक्रेन युद्ध, चीन का बढ़ता दबदबा और वैश्विक अर्थव्यवस्था में आ रहे बदलावों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। लेकिन इस सवाल का जवाब किसी एक पक्ष को चुनने में नहीं, बल्कि भारत की संतुलित रणनीति को समझने में छिपा है। अमेरिका लंबे समय से भारत का एक अहम रणनीतिक साझेदार रहा है। व्यापार, निवेश और तकनीक के क्षेत्र में उसकी भूमिका निर्णायक है। भारत के आईटी और सेवा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार पर निर्भर करता है। रक्षा सहयोग, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंडो-पैसिफिक रणनीति में अमेरिका भारत को वैश्विक शक्ति संतुलन में आगे बढ़ने का अवसर देता है। चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने में भी अमेरिका भारत का सबसे मजबूत सहयोगी माना जाता है।
हालांकि, अमेरिका के साथ रिश्तों में अक्सर दबाव भी जुड़ा रहता है। रूस, ईरान या यूक्रेन जैसे मुद्दों पर अमेरिका भारत से स्पष्ट रुख की उम्मीद करता है। यह अपेक्षा कई बार भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से टकराती दिखाई देती है। साझेदारी के साथ शर्तें जुड़ जाना अमेरिका के रिश्तों की एक स्थायी चुनौती रही है। यूरोप के साथ भारत का रिश्ता अलग स्वभाव का है। यह रिश्ता ज़्यादा धैर्य, संतुलन और आपसी समझ पर टिका हुआ दिखाई देता है। यूक्रेन युद्ध पर भारत के तटस्थ रुख को यूरोप ने अमेरिका की तुलना में अधिक सहजता से स्वीकार किया। यूरोपीय देशों का मानना है कि दीर्घकालिक साझेदारी हर मुद्दे पर सहमति की माँग नहीं करती, बल्कि भरोसे पर टिकी होती है।
आर्थिक और तकनीकी मोर्चे पर भी यूरोप भारत के लिए महत्वपूर्ण बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, ग्रीन टेक्नोलॉजी, डिजिटल नियम और वैश्विक व्यापार मानकों को तय करने में यूरोपीय संघ अग्रणी भूमिका निभा रहा है। ब्रसेल्स आज उन फैसलों का केंद्र बन रहा है जो भारत जैसे उभरते देशों के भविष्य को सीधे प्रभावित करते हैं। यह भी सच है कि यूरोप की सैन्य और रणनीतिक ताकत अमेरिका जैसी नहीं है। लेकिन वैश्विक नियम-निर्माण, तकनीकी नियंत्रण और स्थिर साझेदारी के मामले में उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है।
दरअसल, भारत के लिए सही सवाल यह नहीं है कि अमेरिका बेहतर है या यूरोप। असली सवाल यह है कि भारत दोनों के साथ अपने रिश्तों का संतुलन कैसे बनाए। अमेरिका भारत को शक्ति, सुरक्षा और तेज़ विकास के अवसर देता है, जबकि यूरोप भरोसा, स्थिरता और दीर्घकालिक सहयोग प्रदान करता है। निष्कर्ष साफ है। भारत किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने वाला देश नहीं है। उसकी विदेश नीति की ताकत उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता में निहित है। आज की बहुध्रुवीय दुनिया में भारत को अमेरिका की ताकत भी चाहिए और यूरोप का संतुलन भी।
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