Jammu Kashmir में राज्य के दर्जे पर Omar Abdullah का प्रस्ताव संविधान विरोधी: Sunil Sharma
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने सोमवार को कहा कि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए पेश किया गया प्रस्ताव संविधान का ‘‘उल्लंघन’’ है और इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। शर्मा ने यह भी कहा कि जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा मिलेगा क्योंकि यह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एजेंडे में है लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) अपना एजेंडा इसमें जबरन शामिल करके इस प्रक्रिया को ‘‘बाधित’’ करना चाहती है। शर्मा ने विधानसभा की कार्यवाही शुरू होने से पहले पत्रकारों से कहा कि अनुच्छेद 370 को वापस लाने या ‘‘दो झंडे’’ और ‘‘दो संविधान’’ की बात करना देश के संविधान का अपमान है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ अपनी बैठक का जिक्र करते हुए शर्मा ने कहा कि उन दोनों ने इस बारे में चर्चा की कि ‘‘यहां सत्तारूढ़ दल जम्मू-कश्मीर को फिर से 1953 से पहले की स्थिति और अनुच्छेद 370 से जुड़े पुराने नारों की ओर ले जाने की कोशिश कैसे कर रहा है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘क्या आप अब भी जम्मू-कश्मीर को 70-80 साल पीछे धकेलना चाहते हैं? उस दौर में, जब खून-खराबा हुआ और इतने लोगों ने जान गंवाई-क्या जम्मू-कश्मीर सरकार इसे वहीं ले जाना चाहती है? जब भी स्थानीय लोग उमर अब्दुल्ला को उनके वादों की याद दिलाते हैं, वे उस पर अनुच्छेद 370 और 1953 से पहले की स्थिति की बात करके पर्दा डाल देते हैं।’’ विपक्ष के नेता ने कहा कि 2000 में जब केंद्र की भाजपा सरकार ने स्वायत्तता संबंधी प्रस्ताव को खारिज कर ‘‘कूड़ेदान में फेंक दिया था’’, तब नेकां ‘‘भाजपा की गोद में बैठी थी।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आज आपको इसकी याद क्यों आ रही है?
आज आपको इसकी याद इसलिए आ रही है क्योंकि जम्मू-कश्मीर के लोग आपसे पानी, बिजली और सड़क मांग रहे हैं।’’ शर्मा ने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री ने इस पर ‘‘गंभीर नाराजगी’’ जताई और कहा कि अनुच्छेद 370 या 1953 से पहले की स्थिति की चर्चा का ‘‘जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अब कोई स्थान नहीं है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्य का दर्जा मिलना उचित है-यह भारत सरकार की प्रतिबद्धता है। हमने यहां भी दोहराया है कि आगे आइए, इस पर बहस कीजिए। राज्य का दर्जा मिलेगा; यह हमारा एजेंडा है, आपका (नेकां का) नहीं।
आप अपना एजेंडा जबरन इसमें शामिल करके इसे बाधित करना चाहते हैं। जब आप 1953 से पहले की स्थिति या अनुच्छेद 370 की बात करते हैं तो राज्य का दर्जा बहाल करने का हमारा मौजूदा एजेंडा बाधित होता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आप यहां दो झंडों की बात कैसे कर सकते हैं? दो संविधान की बात कैसे कर सकते हैं?
किसी भी परिस्थिति में ऐसा नहीं हो सकता। यह अपमानजनक है-यह भारत के संविधान का अपमान है और उसकी मूल भावना के विपरीत है।’’ शर्मा ने कहा, ‘‘भारत का संविधान यहां क्यों लागू नहीं होना चाहिए? क्या इसलिए कि राज्य में मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है?
भारत के अन्य सभी राज्यों में संविधान लागू होगा लेकिन यहां सिर्फ मुस्लिम बहुमत होने के कारण लागू नहीं होगा? यह ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ जिन्ना का था, जिन्होंने भारत का विभाजन कराया। अब्दुल्ला सरकार चीजों को फिर उसी द्विराष्ट्र सिद्धांत की ओर ले जाना चाहती है।
इसे कभी स्वीकार नहीं किया जाएगा।’’ मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के विरोध प्रदर्शनों से जुड़े सवाल पर शर्मा ने कहा कि निर्वाचन आयोग के खिलाफ प्रदर्शन करने का कांग्रेस को कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस वही पार्टी है जिसने भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त टी. एन. शेषन को (लालकृष्ण) आडवाणी के खिलाफ अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस वही पार्टी है जिसने भारत के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एम. एस. गिल को केंद्रीय मंत्री बनाया।
उनके पास बोलने का क्या नैतिक आधार है? उन्होंने चार दशक तक भारत निर्वाचन आयोग के लिए उचित संस्थागत प्रक्रियाएं तक स्थापित नहीं कीं।
Election Commission का SIR फैसला सामूहिक था, Pema Khandu ने राहुल गांधी के आरोपों को नकारा
(फाइल फोटो के साथ जारी) ईटानगर, 28 सितंबर अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने सोमवार को कहा कि निर्वाचन आयोग के अपने रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि आयोग का सामूहिक फैसला था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से कई बार यह सवाल उठाए जाने पर कि क्या एसआईआर का फैसला एकतरफा था, खांडू ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि इस कवायद से संबंधित 24 जून 2025 का आदेश ‘‘आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी’’ से जारी किया गया था। खांडू ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘राहुल गांधी ने कई बार सवाल उठाया है कि क्या एसआईआर एकतरफा फैसला था।
निर्वाचन आयोग का स्वयं का रिकॉर्ड अब इसका स्पष्ट संस्थागत जवाब देता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आधिकारिक रिकॉर्ड स्पष्ट है। एसआईआर आयोग का फैसला था, किसी एक व्यक्ति का नहीं।’’ खांडू ने यह भी कहा कि एसआईआर से संबंधित बाद के कार्यक्रमों को भी आयोग की सर्वसम्मत मंजूरी मिली थी और आधिकारिक रिकॉर्ड से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है। मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी निर्वाचन आयोग के कामकाज और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच आई है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने निर्वाचन आयोग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और चुनावी प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाया है, जिसके बाद विवाद और बढ़ गया। निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े उसके फैसले पूरे आयोग की मंजूरी से लिए गए थे। आयोग ने यह भी कहा है कि आंतरिक विचार-विमर्श के दौरान व्यक्त अलग-अलग राय को अलग या एकतरफा फैसला नहीं माना जा सकता।
इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और सत्तारूढ़ भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। विपक्ष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है जबकि निर्वाचन आयोग इस प्रक्रिया में अपनाई गई कार्यप्रणाली का बचाव कर रहा है। खांडू ने कहा कि निर्वाचन आयोग का स्पष्टीकरण और उसके आधिकारिक रिकॉर्ड यह स्पष्ट करते हैं कि एसआईआर का फैसला किस तरह लिया गया था।
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