सिगरेट छोड़ने के बाद भी लंग कैंसर का खतरा! जानिए किसे और कब करानी चाहिए ये खास जांच
लंग कैंसर का खतरा सिर्फ मौजूदा स्मोकर्स तक सीमित नहीं माना जाता, लंबे समय तक धूम्रपान करने वाले लोगों में सिगरेट छोड़ने के बाद भी जोखिम बना रह सकता है. ऐसे में सही लोगों की समय पर स्क्रीनिंग बीमारी को शुरुआती दौर में पकड़ने में मदद कर सकती है.
लहर-लहर:क्या सुख सिर्फ रोमांच और ‘वाह!’ का पल है, या इनसे कहीं आगे का एहसास?
सुख क्या है? दुख क्या है? अंग्रेजी में दो शब्द हैं- थ्रिल और जॉय। सवाल यह है कि ये थ्रिल और जॉय क्या सुख हैं? या ज़िंदगी में जो-जो चीजें हमें चाहिए थीं, उनका मिल जाना सुख है? हमारी कुछ बुनियादी जरूरतें हैं- रोटी, सिर पर छत और तन ढकने के लिए कपड़े। इनके बिना इंसान रह नहीं सकता। ये हम सबको चाहिए, लेकिन अगर कोई कहे कि ‘मैं सांस लेता हूं और इसमें मुझे बहुत सुख मिलता है’, तो इसे सुख नहीं कह सकते। सांस लेना तो जीने की शर्त है। यह होना ही चाहिए। इसे सुख-दुख की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। तो फिर सुख-दुख क्या है? सुख-दुख बाहर से नहीं आता। वह हमारे भीतर होता है। मुझे तब दुख होता है, जब कोई मुझे निराश करता है, क्योंकि मुझे उससे उम्मीद थी। मुझे दुख तब होता है, जब कोई ऐसी बात कहता है, जिससे मुझे लगता है कि उसने मुझे नीचा दिखाया। मुझे दुख तब होता है, जब कोई मुझे धोखा दे देता है। इन सभी मामलों में मेरे दुख का फैसला कौन कर रहा है? दरअसल, दूसरे लोग तय कर रहे हैं कि मुझे कब दुखी होना है। मेरी भावनाएं उनके व्यवहार से बंधी हुई हैं। यह ठीक नहीं है। किसी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार को अपनी खुशी और अपने दुख की चाबी दे देना सही नहीं हो सकता। मैं यह भी मानता हूं कि जो लोग दूसरों को चोट पहुंचाते हैं या उनके साथ गलत व्यवहार करते हैं, कई बार उनकी अपनी समझ ठीक तरह से काम नहीं कर रही होती। अगर उनकी सोच साफ होती, अगर वे सामने वाले की भावनाओं को समझ पाते, लेकिन अगर उन्होंने बुरा किया है, तो यह उनकी कमजोरी है, उनकी कमी है। आप भी इंसान हैं, मैं भी इंसान हूं। हो सकता है, कभी गुस्सा आ जाए। ऐसी घड़ी में अपने आपको समझाइए कि जो व्यक्ति दूसरों को चोट पहुंचा रहा है, उसकी समझ विकसित नहीं है। उसे यह समझ नहीं आई है कि जीना कैसे चाहिए। अब सवाल है- सुख क्या है? मैं समझता हूं कि मैं एक गाड़ी खरीद लूंगा। बहुत बड़ी गाड़ी खरीद लूंगा, तो मुझे सुख मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है। आराम और सुख में फर्क है। हो सकता है, सुख के लिए आराम जरूरी हो, लेकिन आराम ही सुख नहीं है। सुख इंसान के भीतर है। इसी तरह चैन और सुख में भी फर्क है। जिसे हम अक्सर सुख के नाम पर ढूंढ रहे होते हैं, असल में वह चैन होता है, लेकिन हम उसे सुख कह देते हैं। चैन ही शायद उस सुख के सबसे करीब है, जिसे हम वास्तव में खोज रहे हैं। और वह चैन किसी हंगामे में नहीं मिलता। जो भी चीज इस रूप में आए कि आप कह उठें- ‘वाह! बड़ा मजा आया!’ तो यह मजा खत्म होने वाला है। इसका एक समय है। यह खत्म होगा और आप फिर अपनी सामान्य स्थिति में लौट आएंगे। मगर वह सामान्य स्थिति क्या है? वह जगह क्या है, जहां आप वापस लौटते हैं? वह शांत है। सुख एक शांत दरिया है। अगर वह आपके भीतर है, तो वह पूरे वक्त रहता है- चुपचाप, खामोशी से। सुख का मतलब यह नहीं कि ज़िंदगी में हर समय कोई खुशी की घटना होती रहे। सुख शायद उस स्थिति का नाम है, जहां दुख नहीं है। गाड़ियां खरीदना, बड़ी-बड़ी पार्टियां करना, अलग-अलग जगह घूमना- ये सब आपको थोड़ी देर के लिए थ्रिल दे सकते हैं, आनंद दे सकते हैं, लेकिन वह अनुभव खत्म हो जाएगा और आप फिर अपनी उसी सामान्य स्थिति में लौट आएंगे। इसलिए सवाल यह नहीं है कि बाहर से मुझे कितना सुख मिल रहा है। सवाल यह है कि जब बाहर का सारा शोर खत्म हो जाता है, तब मेरे भीतर क्या बचता है? अगर वहां कोई दुख नहीं है, कोई बेचैनी नहीं है, कोई ऐसी बाहरी चीज नहीं है जो मेरी भावनाओं की चाबी अपने हाथ में रखती हो- तो शायद वहीं सुख है। दुख का इलाज यह नहीं कि दुनिया मेरे हिसाब से व्यवहार करने लगे। दुख का सिर्फ यही इलाज है कि कोई बाहर वाला आपको दुख न दे सके। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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