बांग्लादेश में प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बना बिजली क्षेत्र
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। बांग्लादेश का घाटे में चल रहा बिजली क्षेत्र, जो बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर है, देश में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। इसके साथ ही यह अर्थव्यवस्था पर भी भारी बोझ डाल रहा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स में यह जानकारी सामने आई है।
बांग्लादेश वर्किंग ग्रुप ऑन इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट (बीडब्ल्यूजीईडी) ने ऊर्जा क्षेत्र में “न्यायसंगत परिवर्तन” के लिए 13 सूत्री नागरिक घोषणापत्र पेश किया है। बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली संयंत्रों से बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण, खासकर कार्बन उत्सर्जन, के चलते नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण अब अनिवार्य हो गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के कुल वायु प्रदूषण में बिजली संयंत्रों का योगदान करीब 28 प्रतिशत है।
बीडब्ल्यूजीईडी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया, “जीवाश्म ईंधनों और उनके आयात पर अत्यधिक निर्भरता से पड़ने वाला भारी वित्तीय बोझ भी इस परिवर्तन की आवश्यकता को मजबूती से रेखांकित करता है। देश को क्षमता शुल्क के रूप में करीब 18.5 अरब डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जबकि बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (बीपीडीबी) को लगभग 27.23 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है।”
इसके अलावा, जीवाश्म ईंधनों के आयात पर सालाना करीब 11.72 अरब डॉलर खर्च होते हैं, जो देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर गंभीर दबाव डालते हैं।
घोषणापत्र में यह भी कहा गया है कि कोयला, गैस और ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि उद्योगों, व्यवसायों और घरों को कम लागत वाली नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। किसी भी नए कोयला, गैस या तेल आधारित बिजली संयंत्र को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए और सेवानिवृत्त संयंत्रों के कर्मचारियों के लिए वैकल्पिक आजीविका की गारंटी दी जानी चाहिए। साथ ही, किसी भी नए एलएनजी टर्मिनल को मंजूरी न देने और गैस रिसाव व अवैध कनेक्शनों को रोकने के लिए सख्त कदम उठाने की मांग की गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बदलाव के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें समयबद्ध लक्ष्य हों और उन्हें सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय योजनाओं में शामिल किया जाए। नवीकरणीय ऊर्जा के लिए पर्याप्त बजटीय आवंटन किया जाना चाहिए। सोलर पैनल और उससे जुड़े उपकरणों पर वैट और आयात शुल्क हटाने की भी सिफारिश की गई है। इसके साथ ही परिवहन क्षेत्र, जो प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है, पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई है।
बीडब्ल्यूजीईडी के नागरिक घोषणापत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों पर आयात शुल्क और करों में भारी कटौती तथा उन्नत बैटरियों पर शून्य शुल्क की मांग की गई है। इसमें सार्वजनिक बसों और परिवहन के अन्य साधनों को भी शामिल किया गया है। “न्यायसंगत परिवर्तन” की अवधारणा के तहत महिलाओं, आदिवासी समुदायों, किसानों, मछुआरों, श्रमिकों और गरीबों को विशेष रूप से शामिल करने पर जोर दिया गया है। इसके लिए हरित रोजगार सृजन, अल्पकालिक प्रशिक्षण और आसान ऋण उपलब्ध कराने की मांग की गई है, खासकर बेरोजगार युवाओं, महिलाओं और हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए।
घोषणापत्र में कृषि आजीविका की रक्षा के लिए ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण पर रोक लगाने और किसानों को नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने के लिए विशेष प्रोत्साहन देने की भी बात कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह नागरिक घोषणापत्र अगली सरकार के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की ओर सुचारु संक्रमण की स्पष्ट दिशा प्रदान करता है, जिससे देश पर वित्तीय बोझ और कार्बन फुटप्रिंट दोनों में कमी आएगी। लेख में कहा गया है कि राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि इन मांगों के प्रति प्रतिबद्धता और उन्हें लागू करना बांग्लादेश की आर्थिक और पर्यावरणीय मजबूती के लिए बेहद जरूरी है।
--आईएएनएस
डीएससी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में 25 देश हुए शामिल, इन देशों ने ठुकराया राष्ट्रपति का न्योता
नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। वैश्विक राजनीतिक गलियारे में वर्तमान समय में कई मुद्दों ने हलचल मचा रखी है। वेनेजुएला, ग्रीनलैंड, रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर गाजा सीजफायर तक, विश्व पटल पर सियासी मुद्दा बना हुआ है। विश्व में शांति स्थापित करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बोर्ड ऑफ पीस की शुरुआत की है। इसमें शामिल होने के लिए ट्रंप ने दुनिया के लगभग 60 देशों को न्योता भेजा। आइए जानते हैं कि किन देशों ने ट्रंप के इस न्योते को स्वीकार किया और किन देशों ने ठुकरा दिया।
इजरायली मीडिया के अनुसार, 60 में से दुनिया के 25 देशों ने ट्रंप के न्योते को स्वीकार कर लिया है। बता दें कि बोर्ड ऑफ पीस में अब तक इजरायल, बहरीन, मोरक्को, अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बुल्गारिया, हंगरी, इंडोनेशिया, जॉर्डन, कजाकिस्तान, कोसोवो, पाकिस्तान, पराग्वे, कतर, सऊदी अरब, तुर्किए, संयुक्त अरब अमीरात, उज्बेकिस्तान, बेलारूस, मिस्र, वियतनाम और मंगोलिया शामिल हुए।
हालांकि, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने बुधवार को कहा कि रूस काउंसिल को फंड देने के लिए पश्चिम में लगी अपनी संपत्ति से 1 बिलियन डॉलर देने को तैयार है, बशर्ते वह फिलिस्तीनी लोगों की तुरंत समस्याओं को हल करने और गाजा में गंभीर मानवीय समस्याओं को हल करने के लिए काम करे।
आठ इस्लामिक देशों ने बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने का न्योता स्वीकार किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी गाजा में इजरायल-हमास सीजफायर समझौते के दूसरे फेज के तहत घोषित बोर्ड में शामिल होने के लिए बुलाया था। हालांकि, भारत की तरफ से फिलहाल इसपर कोई फैसला सामने नहीं आया है। विदेश मंत्रालय ने कहा था कि फिलहाल इसपर विचार किया जा रहा है।
इसके अलावा, फ्रांस, ब्रिटेन, चीन, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे और कई दूसरे बड़े देशों ने इस साइनिंग सेरेमनी में हिस्सा नहीं लिया। इसके साथ ही जर्मनी, इटली, पैराग्वे, रूस, स्लोवेनिया, तुर्किए और यूक्रेन जैसे कई देशों ने इस न्योते पर कोई वादा नहीं किया है।
हालांकि, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमीर जेलेंस्की दावोस में अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप से मुलाकात करने वाले हैं। जेलेंस्की ट्रंप से मुलाकात करने के लिए दावोस पहुंच चुके हैं।
बोर्ड में शामिल सदस्य देशों का कार्यकाल तीन साल तक सीमित होगा, और स्थायी सदस्यता हासिल करने के लिए कथित तौर पर 1 बिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा।
--आईएएनएस
केके/डीकेपी
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