उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2000 में हुए ऐतिहासिक लाल किला हमले के दोषी और मौत की सजा पाए लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के आतंकवादी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। बृहस्पतिवार को अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए आरिफ के पास उपलब्ध अंतिम कानूनी विकल्प पर विचार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
लाल किला मामले में आतंकवादी की मौत की सजा के खिलाफ याचिका पर दिल्ली सरकार को नोटिस
इस हमले में सेना के तीन जवान शहीद हो गए थे।
न्यायालय ने इस मामले में सजा के खिलाफ आरिफ की पुनर्विचार याचिका तीन नवंबर 2022 को खारिज कर दी थी।
आरिफ उर्फ अशफाक को अक्टूबर 2005 में निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी और दिल्ली उच्च न्यायालय ने सितंबर 2007 में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था।
इसके बाद आरिफ ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का रुख किया था। शीर्ष अदालत ने अगस्त 2011 में आरिफ को दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा था।
बृहस्पतिवार को प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी की विशेष पीठ ने वकीलों द्वारा प्रस्तुत दलीलों पर गौर किया, जिसमें शीर्ष अदालत के उन फैसलों का हवाला दिया गया था, जिनमें अपील और पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए मृत्युदंड को बरकरार रखा गया था।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘ नोटिस जारी करें।’’
उपचारात्मक याचिका वादी के पास फैसले को चुनौती देने के लिए उपलब्ध अंतिम कानूनी उपाय है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं दो बार अपील और समीक्षा याचिका को खारिज करके बरकरार रखा है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 22 दिसंबर 2000 की रात को कुछ घुसपैठिए लाल किले के अंदर उस क्षेत्र में घुस गए जहां भारतीय सेना की 7 राजपूताना राइफल्स की यूनिट तैनात थी और उन्होंने गोलीबारी शुरू कर दी। इस घटना में सेना के तीन जवान शहीद हो गए थे।
मोहम्मद आरिफ को सजा दिलाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया पिछले दो दशकों से अधिक समय से चल रही है:
अक्टूबर 2005: निचली अदालत ने आरिफ को दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई।
सितंबर 2007: दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के फैसले और फांसी की सजा को बरकरार रखा।
अगस्त 2011: उच्चतम न्यायालय ने भी निचली अदालत और हाई कोर्ट के फैसले को सही माना।
3 नवंबर 2022: सुप्रीम कोर्ट ने आरिफ की पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को खारिज कर दिया था।
क्या होती है उपचारात्मक याचिका (Curative Petition)?
उपचारात्मक याचिका किसी भी वादी के पास उपलब्ध अंतिम कानूनी उपाय है। यह तब दायर की जाती है जब मुख्य याचिका और पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दोनों खारिज हो चुकी हों। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि न्याय की प्रक्रिया में कोई बड़ी चूक न रह जाए।
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दिल्ली की एक अदालत ने आज 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े जनकपुरी और विकासपुरी के मामलों में पूर्व कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद सज्जन कुमार को बरी कर दिया। अदालत का कहना है कि अभियोजन पक्ष हिंसा में उनकी भूमिका साबित करने में नाकाम रहा। इस फैसले के साथ ही एक बार फिर वही पुराना और कड़वा सच सामने आ गया है कि 1984 के दंगों में इंसाफ आज भी फाइलों, तारीखों और तकनीकी खामियों के बीच दम तोड़ता दिख रहा है।
अदालत ने कहा कि मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि सज्जन कुमार सीधे तौर पर हिंसा में शामिल थे। हम आपको बता दें कि सुनवाई के दौरान सज्जन कुमार लगातार खुद को निर्दोष बताते रहे और कहा कि उनके खिलाफ कोई ठोस गवाही नहीं है। विशेष न्यायाधीश ने संक्षिप्त आदेश सुनाते हुए उन्हें बरी कर दिया। हम आपको यह भी बता दें कि सज्जन कुमार फिलहाल जेल में बंद हैं और उन्हें पिछले वर्ष फरवरी में सरस्वती विहार इलाके में 1984 के दंगों के दौरान दो लोगों की हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी है।
आज जिन मामलों में फैसला सुनाया गया उसमें जनकपुरी मामले की बात करें तो आपको बता दें कि नवंबर 1984 को सोहन सिंह और उनके दामाद अवतार सिंह की हत्या हुई थी। वहीं विकासपुरी में गुरचरण सिंह को जिंदा जलाए जाने का आरोप था। इन्हीं घटनाओं के आधार पर वर्ष 2015 में विशेष जांच दल ने दो प्राथमिकी दर्ज की थीं। लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया, कमजोर जांच और गवाहों की याददाश्त पर टिके मामलों ने आखिरकार अभियोजन की कमर तोड़ दी।
यहां विडंबना साफ दिखाई देती है। एक तरफ वही सज्जन कुमार अन्य मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं, दिल्ली उच्च न्यायालय उन्हें पांच लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार मान चुका है और आजीवन कारावास की सजा भी दे चुका है। दूसरी तरफ इन्हीं दंगों से जुड़े दूसरे मामलों में उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया जाता है। यह न्याय व्यवस्था की वह दरार है जिसमें सच अक्सर गिर कर खो जाता है।
नानावटी आयोग की रिपोर्ट इस पूरे अध्याय पर सबसे कठोर टिप्पणी है। दिल्ली में दंगों से जुड़ी 587 प्राथमिकी दर्ज हुईं, जिनमें से सैकड़ों या तो बंद कर दी गईं या उनमें आरोपी बरी हो गए। हजारों लोग मारे गए, लेकिन सजा गिनती के मामलों में ही हो सकी।
उधर, सज्जन कुमार के वकील अनिल कुमार शर्मा ने कहा है कि कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है क्योंकि विकासपुरी और जनकपुरी मामलों में उनके खिलाफ कोई भी आरोप साबित नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि हमने कोर्ट को बताया था कि उन्हें टारगेट किया गया था, क्योंकि उनकी मौजूदगी साबित नहीं हो सकी। अब तक किसी भी गवाह ने उनका नाम नहीं लिया था, लेकिन अब 36 साल बाद इन्होंने नाम लिया है। वहीं पीड़ित परिवारों की आवाज इससे बिल्कुल उलट है। उन्होंने कहा है कि वह हार मानने वाले नहीं हैं, उन्हें इंसाफ चाहिए और वह दोषी को फांसी की सजा दिलाने तक लड़ाई जारी रखेंगे।
देखा जाये तो यह फैसला उस सिस्टम पर एक करारा तमाचा है जो दंगों जैसे संगठित अपराधों से निपटने में बार बार फेल रहा है। 36 साल बाद भी अगर अदालतें यह कहने को मजबूर हैं कि सबूत नहीं हैं, तो सवाल उठता है कि जांच एजेंसियां आखिर क्या करती रहीं? समय पर जांच होती, गवाहों को सुरक्षा मिलती, तो क्या नतीजा यही होता? देखा जाये तो 1984 के दंगे एक संगठित हिंसा थी। इसके बावजूद दोषियों का बच निकलना यह बताता है कि सत्ता, प्रभाव और कानून की सुस्ती ने मिलकर इंसाफ का गला घोंटा। पीड़ित परिवारों का गुस्सा जायज है, उनकी निराशा स्वाभाविक है।
बहरहाल, यह वक्त है कि देश यह तय करे कि दंगों के मामलों में न्याय केवल कागजों तक सीमित रहेगा या सचमुच जमीन पर उतरेगा। वरना हर ऐसा फैसला हमें यही याद दिलाता रहेगा कि भारत में दंगों के पीड़ितों के लिए इंसाफ अब भी एक दूर का सपना है।
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