रेस्टोरेंट में गाने वाला वो लड़का, जिसे यूट्यूब ने दिलाई पहचान, हुनर के दम पर खड़ा किया 130 करोड़ का साम्राज्य
दिल्ली के एक मामूली रेस्टोरेंट में महज 5,000 रुपये के लिए गाना गाने वाले एक लड़के ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उसकी तकदीर बदल जाएगी. बिना किसी गॉडफादर के, सिर्फ अपने हुनर के दम पर उसने डिजिटल दुनिया में कदम रखा. देखते ही देखते वह लड़का अपनी अनोखी आवाज और किरदारों की वजह से करोड़ों दिलों की धड़कन बन गया. आज उसी मेहनत का नतीजा है कि उसने करीब 130 करोड़ रुपये का आलीशान साम्राज्य खड़ा कर लिया है.
3,300 भारतीय जाएंगे इस्राइल, जानें क्या है बनेई मेनाशे कम्युनिटी का यहूदी कनेक्शन
इस्राइल ने भारत में रहने वाली यहूदी जनजातियों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी. इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसके लिए मंजूरी दे दी है. पिछले साल एक दिसंबर से 10 दिसंबर के बीच आइजोल में कैंप लगाकर लगभग 3,300 आवेदकों को इंटरव्यू के बाद शॉर्टलिस्ट किया गया है.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, आइजोल और कोलासिब में बेनी मेनाशे समुदाय के कई घरों का दौरा किया गया था. इस दौरान, दिसंबर के इंटरव्यू में शामिल हुए तीन दर्जन से अधिक आवेदकों से मुलाकात की गई, जिस वजह से कई अहम बातों की जानकारी मिली. कहा जा रहा है कि इंटरव्यू का हालिया राउंड दो वजह से बहुत अहम था. पहली वजह ये प्रक्रिया सीधे इस्राइल की सरकार ने शुरू की थी, जिसके लिए 25 सदस्यों वाले प्रतिनिधिमंल को भेजा गया था. इस टीम का नेतृत्व इस्राइल के अलियाह और एब्जॉर्प्शन मंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर-जनरल रैंक एक अधिकारी कर रहे हैं.
2015 में प्रवासियों के आखिरी बैच का इंटरव्यू हुआ था. चयनित लोगों को शावेई इस्राइल योजना के तहत 2021 में इस्राइल भेजा गया था. ये संगठन इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पूर्व सहयोगी माइकल फ्रायंड द्वारा स्थापित किया गया था.
इस्राइल जाएंगे बनेई मेनाशे समुदाय के लोग
अलग-अलग तरह के लोगों ने इंटरव्यू में हिस्सा लिया था, जिसमें 34 साल के आसफ रेंथले भी थे, जो सेंट स्टीफेंस कॉलेज के पूर्व छात्र हैं. उन्होंने जेएनयू से एमफिल की डिग्री प्राप्त की है. इंटरव्यू देने वाले लोगों में दिहाड़ी मजदूर भी हैं और अमीर लोग भी. 65 साल के नादव और उनकी पत्नी याफा ने भी इंटरव्यू दिया है. उनके पास आइजोल के बीचों-बीच एक बड़ा चार मंजिला घर है.
जानें बनेई मेनाशे से जुड़ा हुआ इतिहास
बनेई मेनाशे समुदाय के लिए इस्रराइल का रास्ता हमेशा मुश्किलों भरा रहा है. 1950 के दशक में इस्राइल जाने की प्रक्रिया शुरू हुई. मिजो मेला चाला, थे, उन्होंने कहा कि मिजो लोग इस्राइल की खोई हुई जनजातियों में से एक के वंशज हैं. उन्होंने इस बात को हर एक व्यक्ति तक पहुंचाया. उन्होंने इतने विश्वास से ये बात कही कि लोगों ने उस पर भरोसा कर लिया. कुछ लोग उनकी बातों को सुनकर पैदल ही इस्राइल की ओर निकल गए. हालांकि, असम के सिलचर में पुलिस ने उन्हें रोककर वापस भेज दिया.
बनेई मेनाशे को 2005 में आया इस्राइल के मुख्य रब्बी ने औपचारिक रूप से "इस्राइल का बीज" बताया. उन्होंने बनेई मेनाशे को यहूदी के रूप में मान्यता दी. इसके बाद से इस्राइल वापस ले जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई.
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