यूरोप ने ट्रंप के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है। यूरोप के साथ-साथ कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने जिस तरह से अमेरिका को सुनाया है, यूरोप को सुनाया है और खुद को भी वह अप्रत्याशित है। दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के कार्यक्रम में उनका भाषण इतिहास के शानदार भाषणों में गिना जा रहा है। ट्रंप की ताकत के सामने उनकी यह लाइन मशहूर होने लग गई कि जिसके पास कम शक्ति है, उसकी शक्ति ईमानदारी है। गवाने का खतरा कनाडा के पास भी है। मगर उसके प्रधानमंत्री कह रहे हैं जिसके पास कम शक्ति है, उसकी शक्ति ईमानदारी है। इसीलिए फ्रेंच भाषा में दिए गए कार्नी के भाषण को शानदार और ऐतिहासिक बताया जा रहा है। दावोस में जैसे ही कनाडा के प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हुआ, लोग खड़े होकर तालियां बजाने लगे और उनका भाषण दुनिया भर में छा गया है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि यह ट्रांजिशन का समय नहीं है। मतलब संक्रमण का समय नहीं है। इसे इस तरह से भी समझिए कि दुनिया एक कमरे से निकलकर दूसरे कमरे में नहीं जा रही। कोई नई व्यवस्था नहीं बन रही बल्कि यह रप्चर का समय है। यानी पूरा का पूरा मकान दरक गया है। व्यवस्थाओं की समाप्ति का समय है।
कार्नी ने अपने भाषण में सुपर पावर से लेकर मिडिल पावर सबको सबका इतिहास बताया और सबकी चुनौतियां गिनवा दी। मार्क कार्नी ने उस झूठ का उदाहरण दिया जिसके आगे सब अपने-अपने फायदे के लिए चुप रहे। लेकिन अब वह झूठ सबके गले की फांस बनता जा रहा है। फ्रांस, बेल्जियम, जर्मनी, डेनमार्क और कनाडा के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को सुनते हुए साफ हो रहा है कि ऐसा कुछ भी नहीं कि ट्रंप की करतूतों का विरोध नहीं किया जा सकता। कार्नी के भाषण को ऐतिहासिक इसलिए कहा जा रहा है कि उन्होंने वह सच कह दिया जो दिखाई सबको दे रहा था मगर कहना कोई नहीं चाहता था। कार्नी ने उस अमेरिकी नेतृत्व वाली व्यवस्था को बनाए रखने में कनाडा की भूमिका को स्पष्ट रूप से नजरअंदाज कर दिया, जिसकी अब वह आलोचना कर रहे थे। वाशिंगटन का समर्थन करते हुए, ओटावा ने अमेरिकी प्रभुत्व वाले बहुपक्षीय संस्थानों, सैन्य गठबंधनों और विश्व भर में कई युद्धों का निर्माण किया, जिससे द्विध्रुवीय दुनिया के गुटनिरपेक्ष राष्ट्र कमजोर हुए। इस तरह ओटावा ने उन वैश्विक मध्य शक्तियों को नुकसान पहुँचाने में मदद की, जिनका वह आज अचानक समर्थन कर रहा है। अमेरिका का सांस्कृतिक जुड़वां देश कनाडा भी इस प्रक्रिया में पैदा हुई असंतुलित दुनिया के लिए समान रूप से जिम्मेदार है।
दशकों तक, कनाडा जैसे देश उस व्यवस्था के तहत समृद्ध हुए, जिसे हम नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कहते थे। हम इसके संस्थानों में शामिल हुए, इसके सिद्धांतों की प्रशंसा की और इसका लाभ उठाया। इसी वजह से हम इसके संरक्षण में मूल्यों पर आधारित विदेश नीतियाँ अपना सके। अमेरिकी वर्चस्व ने सार्वजनिक चीज़ें उपलब्ध कराईं। जैसे खुले समुद्री मार्ग, एक स्थिर वित्तीय प्रणाली, सामूहिक सुरक्षा और विवाद सुलझाने के ढाँचों का समर्थन। इसलिए हमने खिड़की में तख्ती लगा दी। हमने अनुष्ठानों में भाग लिया और बयानबाज़ी के साथ वास्तविकता के बीच की खाइयों को ज़्यादातर नज़रअंदाज़ किया। यह समझौता अब काम नहीं करता। टैरिफ़ को दबाव के औजार के रूप में, वित्तीय ढाँचों को जबरदस्ती के साधन के रूप में और सप्लाई चेन के दोहन योग्य कमज़ोरियों के रूप में। जब एकीकरण ही आपकी अधीनता का स्रोत बन जाए, तब आप पास्परिक लाभ के झूठ के भीतर नहीं जी सकते।
शक्तिशाली देशों के पास उनकी शक्ति है। लेकिन हमारे पास भी कुछ है: दिखावा बंद करने की क्षमता, वास्तविकताओं को नाम देने की क्षमता, अपने घर में अपनी ताक़त बनाने की क्षमता और मिलकर कार्रवाई करने की क्षमता। यही कनाडा का रास्ता है। हम इसे खुले तौर पर और आत्मविश्वास के साथ चुनते हैं और यह रास्ता हर उस देश के लिए खुला है जो हमारे साथ इसे अपनाने को तैयार हैं।
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ग्रीनलैंड का समर्थन करने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी से पीछे हटने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि ग्रीनलैंड के संबंध में भविष्य के समझौते का खाका तैयार हो गया है। स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर अपने भाषण के बाद ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया हैंडल ट्रुथ सोशल पर लिखा कि उन्होंने और नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे ने ग्रीनलैंड और वास्तव में पूरे आर्कटिक क्षेत्र के संबंध में भविष्य के समझौते का ढांचा तैयार कर लिया है। उन्होंने आगे कहा कि वे 1 फरवरी से लागू होने वाले टैरिफ नहीं लगाएंगे। ट्रम्प ने कहा कि ग्रीनलैंड से संबंधित गोल्डन डोम परियोजना पर अतिरिक्त चर्चा चल रही है और बातचीत जारी रहने पर और अधिक जानकारी सामने आएगी। उन्होंने कहा कि नाटो के महासचिव मार्क रुट्टे के साथ हुई मेरी बेहद सार्थक बैठक के आधार पर हमने ग्रीनलैंड और वास्तव में पूरे आर्कटिक क्षेत्र के संबंध में भविष्य के समझौते की रूपरेखा तैयार कर ली है। यदि यह समझौता हो जाता है, तो यह संयुक्त राज्य अमेरिका और सभी नाटो देशों के लिए बहुत फायदेमंद होगा। इसी समझ के आधार पर मैं 1 फरवरी से लागू होने वाले टैरिफ नहीं लगाऊंगा। ग्रीनलैंड से संबंधित गोल्डन डोम परियोजना पर आगे चर्चा चल रही है।
ग्रीनलैंड को बर्फ का एक टुकड़ा बताते हुए, ट्रम्प ने कहा कि हमें इसकी पूर्ण ऑनरशिप चाहिए। आप लीज पर इसकी रक्षा नहीं कर सकते। हमारे प्रस्तावों पर देश हां और ना कह सकते हैं लेकिन अमेरिका आपके रिस्पॉन्स को याद रखेगा। ट्रंप तर्क दिया कि इसके रणनीतिक महत्व के मुकाबले इस क्षेत्र पर नियंत्रण की मांग नगण्य है। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सैन्य और रसद क्षमता केवल संयुक्त राज्य अमेरिका के पास है। उन्होंने कहा कि हम अब बहुत बड़ी मिलिट्री पावर हैं। मैं मिलिट्री का इस्तेमाल नहीं करना चाहता और ना ही करन चाहूंगा। लेकिन हम फिर भी ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए मिलिट्री का इस्तेमाल कर सकते हैं। हमें हमारी सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। ट्रम्प की टिप्पणियों ने एक बार फिर ग्रीनलैंड के भू-राजनीतिक महत्व की ओर अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।
ग्रीनलैंड का महत्व उसकी लोकेशन में निहित है। ग्रीनलैंड जो है वो आर्कटिक रीजन के आठ देशों में से एक है। ऐसे तो यह डेनमार्क का हिस्सा है लेकिन ऑटोनॉमस टेरिटरी है यानी स्वायत्त क्षेत्र। इसका 80% हिस्सा बर्फ से ढका है और बर्फ की भी 4 किमी मोटी परत है। लेकिन अब यह पिघल रही है। आर्कटिक रीजन बाकी दुनिया के मुकाबले चार गुना रफ्तार से तप रहा है। करीब 26 लाख स्क्वायर किमी बर्फ गायब हो चुकी है। डाटा के मुताबिक इसी बर्फ के नीचे दुनिया की 30% अनएक्सप्लोर्ड गैस और 13% अनएक्स्लोर्ड ऑयल यह छुपे हुए हैं। इसके अलावा यहां कीमती धातुएं सोना, प्लैटिनम, जस्ता और लौ, अयस्क, तांबा, सीसा, मोलिब्डेनम और टाइटेनियम यह सब भी मौजूद बताए जाते हैं। इन सब वजहों से इस आइलैंड पर ट्रंप ही नहीं रूस और चीन की भी नजर बनी रहती है।
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