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पश्चिम मध्य रेलवे ने शुरू किया बड़ा अभियान, 284 स्टेशनों पर पेयजल की निगरानी, नल और पाइपलाइन की जांच कर रही टीमें

ट्रेन में सफर करने वाले यात्रियों को साफ और सुरक्षित पेयजल मिले इसके लिए पश्चिम मध्य रेलवे ने स्टेशनों पर विशेष निगरानी अभियान शुरू किया है। दरअसल इस अभियान के तहत पानी की गुणवत्ता की जांच जल स्रोत से लेकर यात्रियों तक पहुंचने वाले अंतिम नल तक की जा रही है। रेलवे की टीमें नियमित रूप से वाटर बूथ, नल और पाइपलाइन की जांच कर रही हैं ताकि किसी भी तरह की समस्या समय रहते दूर की जा सके।

वहीं पश्चिम मध्य रेलवे के मुताबिक अभियान के दौरान जबलपुर, भोपाल और कोटा मंडल के 284 स्टेशनों की सघन निगरानी की गई। इस दौरान 9850 नलों और वाटर बूथों की सफाई कराई गई और 893 पानी के नमूने जांच के लिए लिए गए। हालांकि जांच में सभी नमूने निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए गए।

पेयजल व्यवस्था की लगातार निगरानी

दरअसल रेलवे ने सिर्फ नलों की सफाई तक अभियान सीमित नहीं रखा बल्कि पूरी जल आपूर्ति व्यवस्था की भी जांच की। पिछले एक महीने में 130 स्थानों पर पाइपलाइन की मरम्मत या बदलाव कराया गया। इसके अलावा 1,086 पानी की टंकियों की सफाई भी की गई ताकि लंबे समय तक जमा रहने वाले पानी की गुणवत्ता प्रभावित न हो। रेलवे स्टेशनों के साथ-साथ रेलवे आवासीय कॉलोनियों और रेलवे अस्पतालों में भी पानी की नियमित निगरानी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जहां भी किसी तरह की तकनीकी दिक्कत सामने आती है वहां संबंधित विभाग तुरंत सुधार का काम शुरू करता है। इसी वजह से जल स्रोत से लेकर यात्रियों तक पहुंचने वाली पूरी व्यवस्था पर लगातार नजर रखी जा रही है। मुख्य जनसंपर्क अधिकारी मधुर वर्मा ने बताया कि इस अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यात्रियों तक दूषित पानी न पहुंचे। इसके लिए वाटर प्लांट, पाइपलाइन और वाटर बूथ तक हर स्तर पर जांच की जा रही है।

रेलवे में तीन स्तर पर होती है पानी की जांच

पश्चिम मध्य रेलवे भारतीय रेलवे के तय मानकों के अनुसार पेयजल की गुणवत्ता की जांच तीन अलग-अलग स्तर पर करता है। पहला चरण अवशिष्ट क्लोरीन की रोजाना जांच का होता है। कीटाणुशोधन के बाद पानी में क्लोरीन की मात्रा जल स्रोत से लेकर अंतिम आपूर्ति बिंदु तक जांची जाती है। अगर किसी स्थान पर क्लोरीन का स्तर कम मिलता है तो तुरंत दोबारा क्लोरीनीकरण कराया जाता है। दूसरे चरण में बैक्टीरियोलॉजिकल जांच की जाती है। इसमें ई. कोलाई और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी की जांच होती है। बड़े स्टेशनों, रेलवे अस्पतालों और कॉलोनियों में यह जांच हर महीने की जाती है जबकि छोटे स्टेशनों पर भी नियमित अंतराल में पानी की जांच होती रहती है। तीसरा चरण रासायनिक विश्लेषण का है। मौजूदा जल स्रोतों से हर छह महीने में नमूने लेकर उनकी रासायनिक गुणवत्ता जांची जाती है। अगर कोई नया जल स्रोत शुरू किया जाता है तो उसका उपयोग शुरू करने से पहले भी पूरी जांच कराई जाती है। रेलवे का कहना है कि इसी व्यवस्था के जरिए यात्रियों को साफ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की कोशिश लगातार जारी है।

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महाकाल लोक का फिर बदलेगा स्वरूप, पत्थर-मेटल से बनाई जा रही नई प्रतिमाएं

महाकाल महालोक उज्जैन के सबसे प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। बाबा महाकालेश्वर के दर्शन करने आने वाले भक्त महाकाल लोक का दीदार जरूर करते हैं। यहां शिव की अलग अलग लीलाओं से जुड़ी प्रतिमाएं मौजूद है। अब आने वाले श्रद्धालुओं को नई प्रतिमाएं भी देखने को मिलेगी।

दरअसल, यहां मौजूद प्रतिमाओं के स्थान पर अब श्रद्धालुओं को पत्थर और मेटल से बनी नई प्रतिमाएं देखने को मिलेगी। इसके लिए तेजी से काम किया जा रहा है। प्रशासन 92 नई मूर्तियां बनवा रहा है। इनमें से 35 पत्थर और 57 मेटल की प्रतिमाएं हैं।

मूर्तियों का चल रहा निर्माण

अलग अलग जगहों से आए कारीगर इन प्रतिमाओं के निर्माण में लगे हुए हैं। शंकर जी, गणेश जी, माता लक्ष्मी और हनुमान जी प्रतिमाओं पर काम किया जा रहा है। केवल उज्जैन स्थित कार्यशाला ही नहीं बल्कि ग्वालियर और जयपुर जैसी जगहों पर भी प्रतिमा का निर्माण किया जा रहा है।

सिंहस्थ से पहले पूरा करने का लक्ष्य

सिंहस्थ 2028 को देखते हुए उज्जैन में निर्माण कार्य तेजी से चल रहे हैं। महाकाल महलों के लिए तैयार की जा रही है इन प्रतिमाओं का काम भी सिंहस्थ से पहले पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। बारिश खत्म होने के बाद निर्माण कार्य और भी तेजी से किया जाएगा। अन्य जगह से भी कारीगर बुलाए जाएंगे ताकि काम जल्द से जल्द पूरा किया जा सके।

 

फेज के हिसाब से बदलावा

इस बारे में उज्जैन कलेक्टर रौशन कुमार सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि महाकाल लोक में 100 से ज्यादा प्रतिमाएं लगी हुई है। इन्हें फेज वाइज रिप्लेस किया जाएगा। इन्हें इस तरह से तैयार किया जा रहा है कि ये स्थायी रह सकें। जो पुरानी प्रतिमाएं हटाई जाएंगी उन्हें कहां स्थापित किया जाएगा इस पर फिलहाल निर्णय नहीं दिया गया है। प्रतिमाओं के निर्माण कार्य का निरीक्षण करने के लिए संभाग आयुक्त आशीष सिंह और कलेक्टर रौशन कुमार सिंह प्रतिमा निर्माण कार्यशाला का निरीक्षण करने पहुंचे। यहां उन्होंने काम का निरीक्षण करने के साथ कारीगरों के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए।

दूसरी बार बदल रहा स्वरूप

बता दें कि यह दूसरी बार है जो महाकाल लोक की प्रतिमाओं का स्वरूप बदला जा रहा है। 2023 में तेज आंधी तूफान की वजह से यहां मौजूद सप्त ऋषियों की प्रतिमाएं गिर गई थी। उस समय 66 लख रुपए की लागत से बनाई गई ये प्रतिमाएं अंदर से खोखली निकली थी। इसके बाद यहां नई प्रतिमा स्थापित की गई थी। अब एक बार फिर इनका स्वरूप बदलेगा। सबसे खास बात यह है कि यह प्रतिमाएं पुराणों में वर्णित स्वरूप और साक्ष्यों के आधार पर तैयार की जा रही है। पहले स्केच तैयार कर विशेषज्ञों की समिति से उसे स्वीकृत कराया जा रहा है। उसी के आधार पर प्रतिमा को आकार दिया जा रहा है।

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