Thane में घर के नीचे खजाना निकालने के नाम पर महिला से 5.6 लाख रुपये की ठगी
महाराष्ट्र के ठाणे जिले में 40 वर्षीय एक महिला के घर के नीचे खजाना दबा होने का झांसा देकर उसे निकालने के लिए कथित तौर पर काला जादू संबंधी अनुष्ठान करने के नाम पर उससे 5.6 लाख रुपये ठगने का मामला सामने आया है। पुलिस ने शनिवार को यह जानकारी दी। एक अधिकारी ने बताया कि महिला की शिकायत पर उल्हासनगर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता और महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन कानून के तहत जबरन वसूली, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी के आरोपों में मामला दर्ज किया है।
पीड़िता रेखा सुनील भोईर ने आरोप लगाया कि इस महीने की शुरुआत में आरोपियों बब्बू गुरु, पम्मी गुरु, गणेश पवार, गीता जाधव और अन्य लोगों ने उसे विश्वास दिलाया कि उसके घर के नीचे खजाना दबा हुआ है। उसने आरोप लगाया कि खजाना निकालने के लिए तंत्र-मंत्र संबंधी अनुष्ठान करने के बहाने आरोपियों ने उससे चार लाख रुपये नकद और 1.6 लाख रुपये मूल्य का सोना ले लिया। अधिकारी ने बताया कि आरोपियों ने अनुष्ठान में इस्तेमाल होने वाली कुछ वस्तुएं भी कथित तौर पर जमीन में दबाईं और महिला के मन में डर पैदा किया।
इसके बाद वे उसका नकद और सोना लेकर फरार हो गए। उन्होंने बताया कि फरार आरोपियों का पता लगाने के लिए एक टीम भेजी गई है।
Prabhasakshi NewsRoom: NDA के भीतर नया संग्राम, Jitan Ram Manjhi बोले- SC-ST MPs को संसद में बोलने के लिए ज्यादा समय मिले
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण को लेकर सियासी खींचतान एक बार फिर तेज होती दिख रही है। एक तरफ इन समुदायों के सांसदों ने संसद में अपनी बात रखने के लिए ज्यादा समय देने की मांग की है, तो दूसरी तरफ आरक्षण में उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे के भीतर कोटा’ को लेकर गठबंधन के सहयोगी दल आमने-सामने हैं। ऐसे में आरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ सामाजिक न्याय का सवाल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की राजनीति और उसके सामाजिक समीकरणों की भी बड़ी परीक्षा बनता नजर आ रहा है।
केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी दल हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता जीतन राम मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर भारतीय जनता पार्टी के सांसद गजेंद्र सिंह पटेल की मांग का समर्थन किया है। हम आपको बता दें कि खंडवा के सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा के दौरान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सांसदों को पर्याप्त बोलने का अवसर देने की मांग उठाई थी।
इसे भी पढ़ें: Prashant Kishor की जन सुराज पार्टी को बड़ा झटका! उम्मीदवार बनने के 24 घंटे भीतर भूषण झा का इस्तीफा, अब लड़ेंगे निर्दलीय चुनाव
मांझी के मुताबिक यह मुद्दा पांच अगस्त को उनके दिल्ली स्थित आवास पर हुई राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सांसद समूह संवाद बैठक में उठा था। पटेल ने विशेष रूप से कहा था कि सदन में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े मुद्दों को रखने के लिए इन समुदायों के सांसदों को पर्याप्त समय मिलना चाहिए। मांझी ने लोकसभा अध्यक्ष से इस मांग पर आगे कार्रवाई करने और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का अनुरोध किया है।
पटेल ने भी इस मांग की पुष्टि करते हुए कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सांसदों के लिए बोलने का समय और बढ़ाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि प्रत्येक राजनीतिक दल को चर्चा के लिए मिलने वाला समय उसके सांसदों में बांट दिया जाता है। ऐसे में इन समुदायों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को विस्तार से रखने के लिए अलग से पर्याप्त अवसर मिलना जरूरी है। पटेल ने साफ किया कि ऐसा नहीं है कि इन सांसदों को बोलने का अवसर नहीं मिलता, लेकिन उनकी मांग अधिक समय और अधिक प्रभावी प्रतिनिधित्व की है।
लेकिन संसद में बोलने के समय का यह सवाल ऐसे समय उठा है, जब आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर पहले से ही मतभेद सामने आ चुके हैं। खासतौर पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण यानी ‘कोटे के भीतर कोटा’ को लेकर सहयोगी दलों के रुख अलग-अलग हैं।
पिछले महीने यह मतभेद खुलकर सामने आया था। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष और बिहार सरकार में मंत्री संतोष कुमार सुमन ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में उप-वर्गीकरण की मांग दोहराई थी। उनका तर्क है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक वंचित समुदायों तक आरक्षण का लाभ पर्याप्त रूप से पहुंचना चाहिए।
हम आपको याद दिला दें कि इस बहस को सर्वोच्च न्यायालय के एक अगस्त 2024 के संविधान पीठ के फैसले ने भी नई दिशा दी। न्यायालय ने राज्यों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के भीतर उप-वर्ग बनाने की अनुमति दी थी। इसके बाद राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों के बीच इस व्यवस्था के प्रभाव और भविष्य को लेकर बहस तेज हुई।
लोक जनशक्ति पार्टी के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण की समीक्षा के किसी भी प्रयास का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण सामाजिक भेदभाव पर आधारित संवैधानिक व्यवस्था है, आर्थिक स्थिति पर नहीं। चिराग ने यहां तक कहा कि जो लोग आरक्षण की समीक्षा की बात करते हैं, उन्हें पहले इस्तीफा देना चाहिए। उनका कहना था कि आरक्षण कल भी था, आज भी है और आगे भी जारी रहना चाहिए।
चिराग के इस रुख पर संतोष सुमन ने भी पलटवार किया और कहा कि इस्तीफे की बात आती है तो उनका दल इसके लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि चिराग की पार्टी संख्या और राजनीतिक पीढ़ी के लिहाज से बड़ी है, इसलिए वह आगे बढ़कर इस्तीफा दें और उनका दल भी साथ इस्तीफा देने को तैयार है।
सुमन ने हालांकि स्पष्ट किया कि आरक्षण की समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना नहीं है। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा की मांग आरक्षण के भीतर उप-वर्गीकरण की है, ताकि मुसहर, भुइयां, डोम, हलखोर और नट जैसे अत्यंत वंचित समुदायों को आरक्षण का अधिक लाभ मिल सके।
वहीं जनता दल-यूनाइटेड के राष्ट्रीय महासचिव और विधायक श्याम रजक ने आरक्षण की समीक्षा पर चर्चा का ही विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी कि आरक्षण की व्यवस्था से छेड़छाड़ गंभीर सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है। उनका कहना है कि आरक्षण संवैधानिक अधिकार है, किसी की ओर से दी जाने वाली खैरात नहीं।
देखा जाये तो बिहार में यह विवाद इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां दलित समाज के भीतर सामाजिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। नीतीश कुमार सरकार ने 2007 में महादलित श्रेणी बनाई थी, जिसका उद्देश्य सबसे अधिक वंचित दलित समुदायों की पहचान करना था।
बहरहाल, अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सांसदों की आवाज को अधिक समय और प्रभावी प्रतिनिधित्व देने का सवाल है, तो दूसरी तरफ आरक्षण के भीतर हिस्सेदारी को लेकर सहयोगी दलों के बीच अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण खुलकर सामने आ रहे हैं। आने वाले समय में यह बहस केवल आरक्षण की तकनीकी व्यवस्था तक सीमित रहेगी या गठबंधन की सामाजिक राजनीति को भी प्रभावित करेगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi









